<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113</id><updated>2012-02-16T13:07:05.008+05:30</updated><category term='कविता'/><category term='पाठ 1'/><category term='वर्षा'/><category term='लेख'/><category term='वार्ता'/><category term='उपन्‍यास'/><category term='आग       नाटक'/><category term='poetry'/><category term='कहानी'/><category term='डॉ. नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी'/><category term='ले़ख'/><category term='kahani'/><category term='आत्मसम्मान कैसे बढा़एॅ'/><title type='text'>दिव्य सहज जीवन</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>42</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-5517062704175051037</id><published>2011-11-19T21:21:00.000+05:30</published><updated>2011-11-19T21:21:52.810+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>आज की क ि‍वता</title><content type='html'>रात भर हवा चलती रही &lt;br /&gt;ि‍सरहाने बैठी चांदनी दुपटटा संभालती रही&lt;br /&gt;सपनो में &lt;br /&gt;अटका मन &lt;br /&gt;गली'गली भटका &lt;br /&gt;हवा ने कहा&lt;br /&gt;तेरे दुख और उसके सुख की ि‍वध नहीं ि‍मलती है&lt;br /&gt;मुहब्‍बत का ि‍लफााफा&lt;br /&gt;बैरंग ि‍भजवाया हैं&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-5517062704175051037?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/5517062704175051037/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=5517062704175051037&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/5517062704175051037'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/5517062704175051037'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2011/11/blog-post_19.html' title='आज की क ि‍वता'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-8757805395273556256</id><published>2011-11-18T11:47:00.001+05:30</published><updated>2011-11-19T19:54:03.767+05:30</updated><title type='text'>आज का ि‍वचार</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;महाभारत में एक प्रसंग आया है, जहां शब्‍द वाणी का व्‍यायाम प्रयुक्‍त हुआ हैंा&lt;br /&gt;साध्‍वी&amp;nbsp; राजा जनक से कहती है ि‍क तुम अभी भी जीवनमुक्‍त&amp;nbsp;नहीं हो&lt;br /&gt;तुम्‍हारा मन स्‍त्रीपुरूश के द्वंद्व में उलझा हैा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं आज तुम्‍हारी देह में ही ि‍नवास करूंगी, सुबह होते ही चजी जाउंगीा&lt;br /&gt;तुम्‍हारी दुर्बलता का कारण&amp;nbsp;वाणी का दुरूपयोग हैा&lt;br /&gt;जो प्रश्‍न म ि‍ह‍लाओं से नहीं करने हैं, वे तुमने मुझसे ि‍कए हैंा&lt;br /&gt;वाणी का व्‍यायम शब्‍द पहली बार प्रयुक्‍त हुआ हैं&lt;br /&gt;कम बोलना , ि‍हतकर बोलना , मन में ही वाणी को लय करने का प्रया ही साधन हैा&lt;br /&gt;नरेन्‍द्र नाथ&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-8757805395273556256?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/8757805395273556256/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=8757805395273556256&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/8757805395273556256'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/8757805395273556256'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='आज का ि‍वचार'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-5334680569913664922</id><published>2011-08-23T11:23:00.000+05:30</published><updated>2011-08-23T11:23:11.864+05:30</updated><title type='text'>गुरू:वाणी  2</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;1 मेरी बात&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुरू:वाणी&amp;nbsp; 2 &lt;br /&gt;अमरीका से आई केरोल नागले को अमरीका में डॉ. बसावड़ा ने बताया था कि अमरीका वाले भारत में जिन प्रबु( व्यक्तियों की तलाश में हैं, स्वामी जी उनमें से एक है। म्दसपहीजमक च्मतेवद यह उनका प्रयुक्त वाक्य था। वह कोटा में मेरे ही घर में ठहरी। उसका पहला सवाल था, क्या ये प्रबु( हैं? वे दक्षिण के साईं बाबा, केरल की अम्मा, आदि वर्तमान के प्रख्यात संतों से मिलकर यहाँ आई थी। स्वामी जी का नाम लोकप्रिय नहीं था, वे अपनी कुटिया से बाहर जाना बहुत पसन्द करते थे, बहुत ही कम लोगों का उनके पास आना-जाना था। बस पुरोहित रामप्रसाद जी कहा करते थे, मैंने अपने जीवन में ऐसे संत नहीं देखे, क्या है इनके पास में नहीं जानता, पर ऐसा कुछ है, मैं ही क्या मेरा पूरा परिवार खिंचा चला आता है। केरोल ने मुझसे कहा था, मैं क्या उत्तर देता। यही कहा पिछले पच्चीस साल से साथ हूूँ, पर तुम्हारा सवाल जो है, उसका उत्तर मैं नहीं दे सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम लोग कुटिया में थे। गुरुकुल में कार्यक्रम था। श्री कडवानीजी, ओझाजी आदि भी वहाँ थे। केरोल का पहला सवाल था, क्या आप जागृत पुरुष; मदसपहीजमक च्मतेवदद्ध हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वामी जी बोले-”मैं नहीं जानता, आपको जो लगता है, आप माने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका अगला सवाल था-” क्या आप मुझे भी जागृति;मदसपहीजमदमकद्ध करा सकते है?“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वामीजी चुप थे, फिर हंसे,” अभी तुम्हारा बच्चा नारायण छोटा है, पति ग्रेग है, नौकरी है, इतनी जिम्मेदारियाँ है, क्या वास्तव में चाहती हो? बहुत कुछ छोड़ना भी होगा।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह चुप रही। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह स्वाजी से उनके जीवन के बारे में सवाल पूछती रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वामी जी हंस रहे थे, कह रहे थे, ”नदी तो बह रही है, पर किनारे को हो ही पकड़े रहोगी, तो भीतर कैसे प्रवेश करोगी? यहाँ सबकी हालत यही है। नाव भी पार उतारने के लिए ही होती है, पर नाव में बैठे रहे तो...?“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह पूछ रही थी,”आपने कौन-सी साधना की है?“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वामी जी हँसे,”सब, तब पता नहीं था, जिसने जो बताया, सभी किया, फिर एक इंजीनियर साहब मिले, वे थियोसाफिस्ट थे, उन्होंने कुछ रास्ता बताया। तब नौ-दस साल की आयु थी। धीरे-धीरे बाहर का सब छूटता गया। पाया विधियां सब व्यर्थ हंै, मन ही कुंजी है, मन क्या है, किसी ने देखा नहीं है, इसके क्रिया कलाप को सब जानते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर मन को इन्द्र्रियाँ बाहर ले जाती है, उन्हें विषय भोग चाहिए। पर यही मन जब नियंत्रित होता है, इसको बाहर जाने की जगह नहीं मिलती, तब यह अंतर्मुखी होने लगता है, वहीं द्वार है।तब यह मस्तिष्क से नीचे उतरता है, तब मन और मस्तिष्क का गठबंधन टूटता है। तब पता लगता है। मन अलग है, मस्तिष्क अलग है। मन एक कागज की तरह है, ऊपर की सतह बाह्य मन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीचे की अंतर्मन, यह अंतर्मन अत्यंत शक्तिशाली है। जहाँ बाह्य मन है, वहाँ संसार है, वहाँ भटकाव है। सभी विकार वहाँ है।वही मृत्यु है, वही जन्म है। वही भव है, वहीं भटकाव है। पर बाह्य मन जब नीचे उतरता है ;यह भी सम झाने के लिए कहा गया है द्ध।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब मन दोनो भोहांे के बीच जहाँ भृकुटी है, वहीं उसकी अनुभूति होती है। फिर यह नासिका तथा कंठ से हृदय तक आता है। तभी कहा जाता है हृदय में अंगुष्ठ बराबर उसका निवास है। मन अपने मूल निवास, नाभि तक चला जाता है, पर वहाँ टिक नहीं पाता है। उसे हृदय तक आकर ठहरना हो जाता है। यह ज्ञानी की अवस्था है। वह शांत है, वह सुखी है, वह संतोषी है, वह आत्मविश्वासी है, साथ ही वह प्रसन्न है। वहाँ उसे कोई संशय नहीं है। बु(ि विवेक में परिणित हो जाती है। तुम कहो कि वह जादूगरी से चीजंे हवा में बनाए, यह संभव नहीं है। प्राकृतिक नियमों के विरु(वह कुछ भी नहीं कर सकता है। कुछ घटता भी है तो उसके होने से संभव अपने आप हो जाता है। उसके पास जो ‘औरा है, वह सकारात्मक है। वह वह प्रकृति के हाथ का एक पुर्जा मात्र रह जाता है।‘दाइ विल बी डन’ उसकी कोई इच्छा नहीं रहती है, यह उसकी पहली मृत्यु कह सकते हो। क्योंकि मन वहाँ नहीं रहा है। जन्म और मृत्यु का कारण मन ही है। बंधन औरऔर मोक्ष भी मन का ही है। पर जब मन अंतर्मन में रिलीव होता है। तब कार्य भी होंगे। पर मन शांत है। एक दर्पण की तरह , लोग आए और गए। वह भीतर अविचलित रहता हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”तो क्या उसकी मृत्यु नहींे होती? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ, देह जब तक है, उसका अपना स्वाभाविक नियम रहेगा।मृत्यु वह तो प्रकृति का नियम है। समुद्र के किनारे हवा के झौकों लकड़ियाँ आ जाती है। इक्कट्ठी हो जाती है। समय पर फिर हवा के थपेड़ों से अलग-अलग हो जाती है। यह मिलना, बिछुड़ना, प्रकृति का अपना नियम है। इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मृत्यु ज्ञानी की भी होती है, जो नहीं जानता है , उसकी भी। संसार की उपस्थिति वाह्यमन में है और संस्कार नाभि में रहता है। वहीं अंतर्मन है, जो निरन्तर विराट से होने वाले प्रवाह से जुड़ा रहने के कारण उत्प्रेरित रहता है संसार उसके धक्केां से, उन लहरों से के धक्कांेे से से स्पंदित होकर, यही मन मस्तिष्क को गति देता है। यही कारण है कि एक ही घटना की अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग प्रतिक्रियाँ होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर साधना क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ नया नहीं है। शरीर के माध्यम से की गई कोई भी विधि वहा्रँ कारगर नहीं है।यह तो मन के द्वारा मन को ही नियंत्रित करने की कला है। हाँ, शरीर की बनावट व बुनावट सबकी अलग है। इसलिए इसके लिए कोई एक रास्ता नहीं है। इसीलिए मैं किसी को भी ध्यान नहीं सिखाता। ध्यान तो सिखाने की चीज नहीं है। यह तो अपने आप हो जाता है। मन जब वर्तमान में रहने लगता है तब मन का भटकाव कम हो जाता हे। वह जहाँ है, वहीं हैं, यही ध्यान है। ध्यान तो अपने आप पाया जाता है। यह जीवन और जगत से काटकर सिखाने की चीज नहीं है। मैंने ”अंनत यात्रा“, में इस बात पर स्पष्ट लिखा है उसे लोग पढ़ते ही नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं बहुत पहले रमण महर्षि के आश्रम गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहाँ मौन सत्संग होता था। वे आते थे और शांत बैठे रहते थे। लोग आते थे और सामने कतार में पंक्तिब( बैठे रहते थे। उनके प्रश्नों के उत्तर अपने आप मिल जाते थे। वहाँ मैंने पाया था, नियांत्रित मन कितना शक्तिशाली होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या यह अन्तर्मन ही आत्मा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आत्मा भी दिया हुआ शब्द है। यह कोई स्थाई इकाई नहीं है। आत्म कहो या अन्र्तमन, वह भी निरन्तर बदलने वाला है। यहाँ सब बदल रहा है। विराट से जुड़ा रहने के कारण यह अंतर्मन जहाँ शक्तिशाली है, वही यहाँ लहरों के निरन्तर स्पंदन है। लहर भी क्या स्थाई होती है? निरन्तर बनती -बिगड़ती है? संस्कार बीज है। यही कारण है, जब मन नियांत्रित होता है, तब यह सं स्कार रूपी बीज भुनने लग जाता है। इसकी अंकुरण क्षमता समाप्त होने लगती है। जब तक संस्कार है , मन का भटकाव रहेगा। मन का नियंत्रण तथा संस्कारो की शु(ि एक साथ होती है। एक सधता है, दूसरे अपने आप सधने लग जाता है। यही जीवन का उद्देश्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साधना के नाम पर मेरा यही कहना है, यहाँ कुछ भी स्थार्ई नहीं है। सब बदल रहा है। मेरे विचार भी आपको अच्छे लगंे। स्वीकारे नहीं तो छोड़दें। हाँ, एक बात जरुर कर सकते है, जहाँ आप का शरीर है, वहाँ आपके प्राण सदा रहतेहै, पर मन वहाँ नहीं रहता। उसको वहाँ लाना ही साधना है। मन और प्राण की वास्तविक युति ही वास्तविक योग है। इसलिए यहाँ करने के लिए कुछ भी नहीं है। यह तो रहने की कला है। जहाँ आप हांे, जो भी कार्य कर रहे हो, काम &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो आज काी दुनिया में करना ही होगा। जीवन यापन भी करना हे, धन की जरुरत होती है। बस जहाँ हम हैं, वही मन रहे। उसका भटकाव कम से कम रहे। शुरु-शुरु में कठिनाई आती है। लोगों ने बहुत गलत समझा रखा है।यह तो बहुत जटिल मार्ग है। ये करो - वो करो, कर्मकांड की भूल -भुलैया है। मैंने रास्ते सभी देखे, प्रयोग किए, प्रकृति निरन्तर मार्गदर्शन करती रही । सबमें सरल और सीधा यही रास्ता है , निरंतर वत्र्तमान में रहो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो गया , वह गया, जो अभी नहीं आया पता नहीं, पर मन हमेशा भूत काल को ही वत्र्तमान में ही ढकेलता रहता है। बहुत पहले सबको एक सत्तूवाली कहानी सुनाई थी। वह हांडी लाकर तरह-तरह की कल्पनाएं करता है। अपनी शादी भी कर लेता हे। बच्चे होजाते हैं। बच्चे पर गुस्सा करता हैं। मन कल्पना में उड़ान भरता रहता हैं , अचानक वत्र्तमान में खुद की लात से ही सत्तू की हांडी टूट जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रास्ता इतना सरल और सीधा है। विश्वास ही नहीं होता। वर्तमान में रहना, वर्तमान में ही सम्भव है। गीता में कहा गया है ” क्ष्प्रिं भवति धर्मात्मा,“। यह धर्मात्मा वही है, जो वर्तमान में है। वहाँ न अतीत का दबाव है, न स्मृतियाँ है, न कोई विचारणा है, न कोई अवधारणा है, शांतमन ही शक्तिशाली होता है। जब वह किसी भी क्रिया के साथ लगता है, सफलता मिलती है, यही योग की स्थिति है। तो क्या हम इसे पाने में असमर्थ हैं? यह वर्तमान में रहने की क्षमता हमारी अपनी ही है,जिसे हमने खो दिया है।इसको पाना ही धर्म है, यही आध्यात्म है और यह अभी इसी जीवन में संभव है। जो निरन्तर वर्तमान में है, वही ध्यानी है, वही शांत सजगता है। उसी को तुम लोग जाग्रति;म्दसपहीजमकद्ध कहते हो। शरीर तो जैसा सबका है, उसका भी वैसा ही रहेगा। हाँ, शांत मन, प्रसéाता, संतोष, उसकी कुछ-कुछ पहचान बता सकते हैं। वैसे तुम लोगों ने नियम -कायदे बनाए होंगे वो तुम जानो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुरु पूर्णिमा का उत्सव पहले यहाँ नहीं होता था। शुरु-शुरु मंे बहुत कम लोग यहाँ आते थे। बाद में उनका मन हुआ साल में एक बार कार्यक्रम हो तो सब एक-दूसरे को जानते, मिलते, बस इतना ही लक्ष्य था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार तो मैं पूरे चातुर्मास कुटिया से नीचे ही नहीं उतरा। फिर लोगों का आग्रह था, स्वीकारना पड़ा। कारण यही रहा। मैं गुरु नहीं हूँ। न ही मेरी कोई इच्छा रहीं। हाँ, आप लोग मानते ह ै, यह आपका विश्वास है, मेरा तो इतना ही कहना है, जो यहाँ कहा गया है, उस पर विचार करंे, प्रयोग करे, अनुभव में लाएँ। अगर आपव को लाभ मिलता है तो आगे बढ़ें। मेरी तो कुटिया का दरवाजा सबके लिए सदा खुला रहता है। यहाँ पर किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं है, यह सबकी अपनी ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सवाल सब पूछते है कि क्या गुरु की जरुरत नहीं है? अगर मैं कहता हूँ, हाँ, तो सब खुश हो जाते हैं। अगर नहीं, तो सबके चेहरे उतर जाते हैं। इन गुरुओं ने बहुत परेशान किया है। जब बच्चा छोटा होता है, तो उसकी माँ या कोई और उसे पहली बार स्लेट पर कुछ लिखना सिखाता है। बिना शिक्षक के सामान्य शिक्षा भी सम्भव नहीं है। प्रारम्भ में अभ्यास सिखाया जाता है। यह आवश्यक है। जब मैं छोटा था, तब इंजीनियर साहब मिले थे, उन्होंने मार्गदर्शन दिया और कहा, करना तुम्हें ही पड़ेगा। जब मैने कहा, सन्यासी बनना चाहता हूँ, तब वे बोले, भोजन और वस्त्र की आवश्यकताएं कम से कम होनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात कहने की है कि मार्ग दर्शन अपेक्षित है। अनन्त यात्रा में बताया गया है कि किस प्रकार रानी चूड़ाता कुंभ को बटुक बनाकर अपने साथ ले जाती है। ब्रह्मनिष्ठ गुरु और सामान्य गुरु में भेद है। आज तो हमें हजारों गुरु मिल जायेंगे। उनकी रुचि लोकेषणा और धन कमाने में है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रह्मनिष्ठ जिनकी ब्रह्म में निष्ठा हो, जो श्रात्रि़य भी हो, जो कुछ उसने जाना है, वह दूसरों को बता भी सके। पर पर आजकल शास्त्र कथन व बु(ि का पदर्शन अधिक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चोयल, औरमेहरा, कृष्णमूर्ति को मानते थे। कृष्णमूर्ति गुरु को नहीं मानते।मानने से न मानना अच्छा है।मैं उनसे यही कहता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे कहते थे फिर आप क्या हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”आपका मित्र, सहयात्री।“ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉत्र बसावड़ा नेे चोयल को फोन किया था, कि मैं मिलना चाहता हूँ। तब मैं बम्बई गया हुआ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बम्बई में पदमा के यहाँ मिलना तय हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे आए, दरवाजे पर खडे़ होकर बहुत देर तक टकटकी लगाए मुझे देखते रहे, वे बहुत बडे़ मनोवैज्ञानिक थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा, अन्दर तो आइए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे अन्दर आए, उन्होंने हाथ बढ़ाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं मुस्कराया, उनके लिए कुर्सी लगी थी, वे वहाँ बैठ गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाने लगे, बोले, फिर दस-पन्०ह दिन में आऊंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर वो तो अगले ही दिन आ गए। कुर्सी लगी थी, पर वो नीचे बैठना चाह रहे थे। मैंने मना किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन बोले, जो आपने अर्जित किया है, मुझे दे दें। मैं यह मांगता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं हंसा, मैंने कहा, यहाँ तो नदी बह रही है, जिसका जितना पात्र हो, वह ले जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने का मतलब है, कि कही भी हमें हम क्या हैं। क्या जानते है, प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। आज जो सब दुकान लगा कर बैठ गए है। इसीलिए कृष्णमूर्तिजी सही कहते हैं, गलत जगह पर जाने से कहीं नही जाना बेहतर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”पर आप?“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”मैं यही कहता हूँ बीच का रास्ता ठीक है। एक बार मागदर्शन अवश्य लेना चाहिए। पर गुरु को ही पकड़ कर बैठ गए। उससे कुछ नहीं होगा। इस देश में यही हुआ है। गुरुवाद ने सबको निकम्मा कर दिया है। पहले तो मानसिक गुलामी आई, फिर दैहिक गुलामी आ गई। सात सौ साल से अधिक यह देश गुलाम रहा है, क्यों? जहाँ गीता का उपदेश दिया गया, वहाँ गुलामी क्यांे? कभी पूछा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवान ने तो यही कहा था-”माम अनुस्मर यु( च...“ मेरा सतत स्मरण, और कर्म कर, पर हमने काहिली को ही धर्म मान लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं इसीलिए गुरुपूजा नहीं कर वाता। मुझे कोई पांव में रोली लगाए, माला पहनाए, पसंद नहीं है। मैं भी आप की तरह साधारण इन्सान हूँ। ”आत्मवत सर्वभूतेषु, सर्वभूतेष हितैरेतः, यही सार तत्व है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर दूसरे से पूजा करवाना, यह, कहाँ का नियम है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर सब जगह भेड़ चाल है, न तो कोई समझना चाहता है, न खुद प्रयोग करना चाहता है। लोग आते है, बड़ी-बड़ी किताबें लिख देते है।जितना पुराना छप चुका है, उससे हर बार नया तैयार हो जाता है। मैं पूछता हूँ, आपका इसमें क्या है, उत्तर नहीं मिलता है। सब ब्रह्म का पता बता रहे है। भ्रम ही अधिक फैला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने पहले ही कहा है, साधक का जो जानना चाहता है,उसकी जिज्ञासा ही बड़ी चीज है। तब जिज्ञासा उसे उस व्यक्ति के पास स्वतः ले जाती है, जो जानता है।मुंडक उपनिषद में कहा गया है कि उसके शीष पर अग्नि जलती है, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बटुक छोटा बच्चा। जो अपनी माँ को ही समस्त ज्ञान का अधिकारी मानता है। उसका और उसकी माँ का जो सम्बन्ध है। देखा है, वह माँ कहकर उसके साथ चिपट जाता है। बाहर खेलता रहेगा, पर जहाँ माँ हटी ,वह तुरंत उसके साथ हो लेगा।यह गुरु और शिष्य का संबंध है। वे तब दो नहीं रह पाते है। जो जहाँ जाना गया है, वह वहाँ तुरन्त सम्प्रेषित होने लगता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर यहाँ तो लोग शार्टकट चाहते है। गुरु हैं, तो तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जायेंगे। भगवान राम ने कितने कष्ट उठाए। कृष्ण को जन्म से ही दुःख मिलेे। पर एक बात है, हम न देखते है, न समझते हैं। उस गुरु से संसार के सुख चाहते है। चाहते हैं संसार पार कर जाना, जाग्रत पुरुष होना। पर भीतर ही भीतर पूरी तरह संसार में डूबे रहते है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं किसी को सन्यासी बनने को नहीं कहता। मैं गृहस्थों के ही घर ठहरता रहा हूँ, मेरी इस बारे में आलोचना भी हुई है। पर सच बात यह है कि आज शांति और शक्ति की उनको ही जरुरत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुफ्त का भोजन पाना मुझको पसंद नहीं था। जब तक शरीर में शाक्ति रही, समाज की सेवा की। सन्यास लेने के बाद गुरुकुल चलाया। संस्था चलाई। जब शरीर से सेवा नहीं होती, तो मन से करता हूँ, न मेरे पास पैसा है, न बैंक में खाता है, न मकान है, न जमीन है, फिर भी प्रसéा हूँ। इस शरीर से समाज की सेवा हुई है। यही जीवन का उद्देश्य है। प्रकृति पर जो निर्भर है, वह उसके कामों का स्वयं संचालन करती है। मैं बहुत बार आपको बताया है, यह कोई शास्त्रों की चर्चा नहीं है, यह अनुभव है। लाभ, लोभ और भय से कोई काम नहीं होना चाहिए। यहाँ सेवा करो, मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा, यह भी लोभ ही हैं।स्वभाव ही सेवा रहे। सर्व भूतेषु हितै रतः यह भावना रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होना यही चाहिए, हम अधिक से अधिक वर्तमान में रहें।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रश्न था - प्रारम्भ में कठिनाई आती है।यह समझने में नहीं आता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”हाँ, हम हमेशा बाहर ही दुनिया में ही उलझे रहते है, संसार जितना बाहर है, उससे अधिक हमारे भीतर भी है, वह ज्यादा है। हम निरंतर सोचते रहते हैं, रात को सोने का अभिनय करते है, वहाँ भी स्वप्न में विचारधारा शुरु हो जाती है। संसार नाना रुपों में उपस्थित हो जाता है। यह सब मन ही है। वर्तमान में रहने की कला है, जहाँ शरीर है, वहाँ मन रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने यह जाना, इसका प्रारम्भ, रात से शुरु हो सकता है। जब हम अपने रोजमर्रा के काम सारे समाप्त कर बिस्तर पर जाएँ तो तब बाहर के विचारों को आने से रोकंे तथा मन को देखें, वहाँ क्या विचार आ रहे है। यहाँ कोई संकल्प नहीं, कोई आदर्श नहीं, कैसे विचार आ रहे है, उन्हें बस देखें, यही पहला कदम है। होगा क्या, भीतर सजग होते ही, दूसरा विचार आते-आते रुक जायेगा। वही सजगता रहे, यही ध्यान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो सकता है, नींद आ जाए। पर अगर सजगता रही, तो कुछ दिन बाद, एक विचार से दूसरे विचार के बीच का गेप दिखने लग जाता है। यही सार है। यह अंतराल ही बढ़ना चाहिए। यही ध्यान है। सुबह उठते समय भी यही किया करंे। जो विचार आ रहे है, उन्हें देखे। यहाँ सतर्कता पूर्वक किया गया, अवलोकन ही ध्यान बन जाता है। फिर जब दिन में कभी फुरसत मिले, हमें यह क्रिया करते रहने देना चाहिए। इससे वर्तमान में रहने में सहायता मिलतेी है। मन का भटकाव कम होने लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रश्न था-”पर यह संभव नहीं हो पाता है।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”हाँ, प्रारम्भ में कठिनाई आती है, मन का स्वभाव है। वह नियंत्रण में नहीं आना चाहता। इसीलिए यहाँ बल नहीं लगाना है। क्रिया सहज हो, इसमें कोई कठिनाई भी नही है। फिर जो भी कार्य हो, क्रिया हो, वहीं मन को रखनेे का अभ्यास बने।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रश्न था- ”फिर त्राटक, ध्यान, मंत्र जप, पूजा, का क्या प्रभाव रहेगा?“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”यह सभी मन को एकाग्र करने की विधियाँ हैं। समय-समय पर बताई गई हैं। मूर्तिपूजा का भी यही आधार बना था। पर मन जितना बाह्य में उलझता जाता है, उतना ही मन बाह्य से प्रेरित होकर दबाव बनाता चला जाता है। मंत्र भी एक बार गहराई में जाने के बाद छूटता नहीं है। ध्यान निर्विचारण को पाना है। किसी मूर्ति, चित्त पर एकाग्रता नहीं है। हम जिसके बारे में ज्यादा सोचते है, उसके गुलाम हो जाते है। क्या कारण रहा, इस्लाम में उनके महान गुरु का चित्र ही नहीं बनाया। चित्र मन ही बनाता है। गुरुजन का यही खेल है, हम गुरु के गुलाम बन कर रह जाते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एकाग्रता प्रारम्भ में सहायक है। बच्चों को सिखाते है, सूर्य की किरणें कागज को जला नहीं पाती है। पर जब आतशी शीशे से गुजरती हैं, तो कागज जल उठता है। एकाग्रता में शक्ति है। परन्तु बाद में यही एकाग्रता बाधक भी हो जाती है। निर्विचारता में रहने में यही बाधा बन जाती है।अंत में इसे भी दूर होना पड़ता है। पुरानी कहानी है।परमहंस जब भी ध्यान लगान लगाते थे, माँ काली के ध्यान में उनका मन डूब जाता था। गुरु उन्हें निर्विचारता का अभ्यास करा रहेथे। पर उनका चित्त काली में डूब जाता था। तब गुरु ने कांच निकाल कर , उनकी भृकुटि के बीच में चुभो दिया। खून निकल आया। काली की प्रतिमा चली गई, वे शांत मन से समाधि में चले गए। सार क्या है, एकाग्रता कहीं भी हो, वह भी अंत में एक बाधा बन जाती है। अनंत के सरोवर में डुबकी तभी लगती है, जब बाहर के सारे आधार खो जाते है, इसीलिए यहाँ जो अभ्यास है, वहाँ मन को प्रारम्भ से ही कही चिपटने की जरुरत नहीं रहती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साध्य तक पहुँचने की यह सरल विधि है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाह्य मन ही संसार है, वह तो रहेगा, पर जब मन अन्तर्मुखी होकर अन्तर्मन में लीन हो जाता है, तब भटकाव नहीं रहता। शांति रहती है। जो गीता के हमारे अध्याय में बताया है, प्रसाद की प्राप्ति होती है। यह प्रसाद मांगने से नहीं मिलता, न चोरी से मिलता है। यह सहज प्राप्ति है, जिसको पाकर चित को ब्राह्मी स्थिति प्राप्त होती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह संसार में ही रहेगा, उसके सभी कार्य यथावत होते रहेंगे। पर उसका व्यवहार संतुलित, स्थिति प्रज्ञ की तरह रहेगा। यह बाते पढ़ने-पढ़ाने की भी नहीं है। यह हमारा स्वभाव बनना चाहिए। ऐसा व्यक्ति सभी के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। पता करंे, अपने आप से पूछें, क्या आप यह नहीं चाहते है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;13&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”सवाल क्यों पूछते हो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या जिज्ञासा है, पूछते रहो, सवाल कभी खत्म होने वाला नहीं है। सवालों की जड़ तुम्हारे मन में है। हाँ जब इससे पार चले जाओगे। तब सवाल हमसे पत्तों की तरह अपने आप छूट जाते है। सवालों के उत्तर नहीं मिलते, पर सवाल उठने ही बंद हो जाते हंै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कारण है, सवाल मन पूछता है। मन और मस्तिष्क का गठजोड़ ,आसानी से नहीं टूटता है। जब तक एक भी सवाल बचा है, यह गठजोड़ तो रहेगा। मैंने पहले भी कहा था, यहाँ सौ टका देना होता है। शत-प्रतिशत तभी यह गठजोड़ टूटता है। मन-मस्तिष्क से नीचे खिसक हुआ हृदय पर आता है। यहाँ समाधान है। जब उत्तर स्वयं अपने आप आने लगे, यह हृदय का खुलना है। यह बायलोजिकल हार्ट नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह अनुभूति है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दर्शन शब्द बहुत अच्छा था। पर सार था। दृश्य व दृष्टा और दर्शन की जब त्रिपुटी समाप्त हो जाती है। बस एक दृष्टा ही शेष रह जाता है। तब दर्शन सहायक होता है। दर्शन मात्र जानने की विधि ही नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने पहले ही कहा था, मैं ध्यान नहीं सिखाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रमण महर्षि के यहाँ मूक सत्संग था। जाओ, चुप बैठ जाओ। चुप हो जाना ही साधन है। चुप होते ही सवाल गिर जाते है। उनसे सम्बन्ध जुड़ जाता है। वहाँ सवाल पूछने से क्या मिलेगा? तुम वहाँ इसीलिए जाते हो कि तुम्हें जो पता है, उसकी पुष्टि हो जाए। वही उत्तर नहीं मिलता तो तुम निराश हो जाते हो। दुबारा आते ही नहीं। ग्रन्थों ने बहुत उलझा रखा है। तथाकथित जो गुरु हैं, वे भी यही काम करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो वास्तविक गुरु है, वहाँ शब्द ही नहीं है। वहाँ मौन में ही समाधान हो जाता है। वास्तविक सम्बन्ध मौन में होता है। जो गुरु है, वह वहाँ स्वयं उपस्थित हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन ही लोभी है। मन विचार है और विचार ही विकार है। यह सीधी सी समझने की बात है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन चाहता है, वह अधिक से अधिक संग्रह रखे। उसे अधिक से अधिक खूंटिया चाहिए। समझाने के लिए जो कहा गया, वह भी सीढ़ी बन जाती है। क्योंकि जहाँ खाली मन आया, वहाँ मन नहीं रहता है। मन तो गति है, उर्जा है, उसका नाश तो नहीं होगा। पर वह गति अंतर्मुखी होकर अंतर्मन में विलीन हो जाती है। पर मन यह नहीं चाहता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपने घर छोड़ दिया। सन्यास ले लिया। वहाँ आश्रम बन गया। वहाँ सामान आ गया। सम्पत्ति बन गई। खूब किताबंे लिख दी। खूब विचार इकट्ठेे कर लिए, यह क्या है? यही लोभ है। वस्तु लोभ नहीं है। पर उससे चिपकाव लोभ है। यह जाता नहीं है। यह मन का स्वभाव है। जितना भीतर खालीपन होता जाता है, उतना बाहर का संग्रह भी कम होने लगता हे। पर हम यह नहीं चाहते। बाहर की हर वस्तु, हर विचार की छाप हमारे भीतर इकट्ठी होती रहती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपने मुझसे पूछा था, आप को याद होगा, ”मुझ में क्या परिवर्तन आया है?“ तब मैंने कहा था, अभी तो संग्रह बहुत जमा है, ठसा-ठस। संग्रह कम होता है, निरन्तर वर्तमान में रहने के अभ्यास से। पर यह बात समझने में नहीं आती। बाहर का दबाव निरन्तर हिलाता रहता है। कभी सोचने का समय नहीं मिलता। बस आए, कुछ सवाल पूछ लिए और प्रसन्न हो गए। यही तो अब तक किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीतर से खालीपन न हो, यह आदत हो गई है। पेट की भूख तो शांत हो जाती है। पर मन की भूख नहीं होती है। शास्त्र कहता है‘प्रजहाति यदा कामनि’ जहाँ सब कामनाओं का क्षरण हो जाता है। यह कामनाएं ही तो भीतर भरी रहती है। हम निरन्तर जो बाहर का संग्रह करते है, वह अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। वह तो यहीं रह जाता है, पर भीतर जो संग्रह जमा करते जा रहे हैं, उस पर निगाह रहे। वह कम हो। कहा जाता है, बीज भुन गया। फिर उसकी अंकुरण क्षमता समाप्त हो जाती है। होना यही है। निरन्तर यही अभ्यास होना है, पर यही नहीं होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपको दो संतों की कहानी सुनाई थी। जो सब छोड़कर हिमालय में कुटिया बना कर रह रहे थे। अपनी लंगोटी सुखाने के लिए रस्सी ले आए थे।बांध दी। फिर रस्सी पर झगड़ा हो गया। दोनों का आधा-आधा हिस्सा था। मारपीट तक हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वस्तु में मोह नहीं है, लोभ वस्तु में नहीं है। लोभ मन में है, यही जानना महत्वपूर्ण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चन्द्रधर जी ने बहुत बड़ी किताब लिखी है। भंेट करने आए थे। अद्वैत वेदान्त व बु( दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन है। मैंन देखा वे बहुत बड़े विद्वान हैं। आते है। मैंने उनकी ओर ध्यान से देखा। उनकी आंखों में झांका। वे सकपका गए। मैंने कुछ नहीं कहा। पूछा आपने क्या जाना? वे बोले, जानना क्या? किताबों का सार है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सार है, जाना क्या जाता है। सूचनाएं ज्ञान नहीं होती है। यहाँ जो भी आता है, पूरा गलेमर भरा हुआ आता है। लगातार बोलता रहता है। जब उसके होठ बंद हो जाते है, तब उसकी ओर ध्यान जाता है। सम्बन्ध सुनने का भी टूट जाता है। वह समझता है, बहुत ज्ञान की बातें कर रहा है। आत्मा परमात्मा की चर्चा ज्ञान की बात है।” अरे! ये तो किताबी सूचना है, तुम्हारा अपना अनुभव क्या है? वह चुप हो जाता है।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधिकांश के सवाल किताबों के सवाल है। मैं कहता हूँ, प्रयोग करो, अनुभव में ले आओ, वह तुम्हारा अपना होगा। मेरी बात भी मन मानो। प्रकृति ने दो पत्तियाँ कभी एक सी नहीं बनाई। हमें किसी की भी नकल नहीं करनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘ज्ञान’ शब्द का अर्थ बाहर की दुनिया की जरुररत नहीं है। ये सूचनाएं निरन्तर बदलती रहती है। एक आदमी बाहर से बहुत विद्वान हो सकता है, पर भीतर से उतना ही रीता, किताबी जानकारी ज्ञान नहीं है। कबीरदास कहीं पढ़ने नहींगए। पर उनका कथन अविश्वसनीय नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह जो आज का व्यक्ति है, यह पहले की अपेक्षा अधिक जानकार है। इसके पास सूचनाओं का विशाल भंडार है,पर यह अपने आप में उतना ही दूर है। जब हम निरन्तर वर्तमान में रहने लगते है, तब क्या होता हे। भीतर का संग्रह या तो खतम हो जाता है या भुनेे बीज की तरह अपनी अंकुरण क्षमता खो देता है। तब जो खालीपन है, वह अनुभव में आता है, वहाँ वह निरन्तर अंतर्मन जो विराट से जुड़ा हुआ है, वह अचानक उसे भर देता है,उसे अपने अस्तित्व का बोध होता है। वह जान जाता है, वह अकेला नहीं है। यह अनुभूति ही ज्ञान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”पर यहाँ तक मन नहीं आने देता है?“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”क्योंकि वह स्वयं खोना नहीं चाहता। न हम में इतना साहस होता है, हम उसके पार छलांग लगालें। मन ही लोभ है, मन ही अहंकार है। इसकी कोई अलग मूर्ति थोड़ी होती है। यह विचार रुप है। तुम यहाँ आए हो, कितने वर्षो से मेरे साथ रहे। तुम किसके साथ रहे, मेरे विचारों के साथ या मेरे साथ। तुम हर बार उलझते रहे। मेरे विचार जो आज हैं, कल बदल जाएं। यहाँ सब परिवर्तनशील है, पर मैं जो हू., जिसे गीता में ‘माम’ कहा है। उसके साथ रहना ही सत्संग है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर तुम्हारा मन, बु(ि हमेशा तुम्हें भी बाहर ढकेलती रही। कभी विश्वास तो कभी अविश्वास। मैं यही कह सकता हूँ, जब जिम्मेदारियाँ खत्म हो जायेगी, तब तुम्हें भी वह प्राप्त होगा, जो तुम चाहते हो। पाना जैसी चीज कोई नहीं है, पर जो अस्तित्व है, उसका अहसासा होगा, यही जीवन का उद्देश्य हौ। यहाँ पाना और खाने जैसी चीज कोई नहीं है। जब तक विचारों से जुड़ो़गे, सवाल पूछते रहोगे, अपने आपको विशेष मानते रहोगेे, भटकाव ही होगा।जैसे सब हैं, वैसे ही हम हैं। सब मिट्टी के भांडे है, इससे अधिक नहीं। यही अहंकार है। धन के अहंकार से भी अधिक, इन झूठी सूचनाओं के संग्रह का अहंकार होता है। दो पात्रों में पानी भर दो, नली से जोड़ दो। दोनों पात्रों में जल की ऊंचाई बराबर हो जाती है। जहाँ गुरु है, वहाँ बस रहना है। कोई तर्क नहीं हो, वहाँ सहज चेतना का प्रवाह बन जाता है, पर अहंकार यही नही होने देता। बु(िमता का अधिक होना भी हानिकारक होता है। जब यह विचार भी गिर जाता है, तब भीतर से स्वतः अपने होने का अहसास होता है। पर यह विचार नहीं है। हमेशा भाषा में अपने आपको व्यक्त करने की कोशिश मत करना। अहंकार फिर आकर दबोच लेगा।‘मैं हूँ ही नहीं’, यह सोच ज्योति की तरह बना रहे। शास्त्र ने बहुत तरह से समझाने का प्रयास किया था। पर उनकी भी कमजोरी है। अनुभव, शब्द से परे है। वहाँ तुम्हें ही अपना रास्ता तलाश करना है। वहाँ किसी की जरुरत नहीं होगी। शास्त्र, गुरु सब बाहर ही रह जाते है। उस यात्रा में तुम्हें अकेला जाना है।गुरु बस उसके भीतर इस ‘मैं नहीं हूँ’ यह बोध एक चिन्गाारी की तरह छोड़कर अलग हो जाता है। इसीलिए मैंने कहा था, मैंने किसी को शिष्य नहीं बनाया। हाँ, जो तुम मानते हो, उसके लिए स्वतंत्र हो, पर मुझे ढोना नहीं। मैं भी एक साधारण-सा इन्सान हूँ। जो मैंने जाना है, कुछ भी छिपाया नहीं है।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”आपके पांव में तकलीफ है, घाव है, आपको दर्द तो बहुत होगा?“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”हूँ , ;हंसते हैद्ध पर जब मैंने कहा आपकी तरह मैं भी हूँ, तो आपको अच्छा लगा होगा। दर्द तो होगा, होता है, पर मुझे अनुभव नहीं होता। मैं अपने आपको वहाँ से हटा लेता हूँ। डाक्टर आते है , चीरफाड़ करते है, पर मुझे पता नहीं लगता। मैं एनस्थीटिया नहीं लेता। बंबई में आंख का आपरेशन था, उनसे मना कर दिया था। पर वे नहीं माने इंजेक्शन लगा दिया। मुझे होश था। उसने सहायक से पूछा था, ‘ क्या इंजेक्शन नहीं दिया’। मैंने कहा, ”दिया था आप अपना काम करंे।“ शरीर का जो धर्म है, वह यथावत रहता है। पर विषय, इन्द्रियाँ और मन का सम्बन्ध टूट जाता है। इस अवस्था में जहाँ मन क्रियाशील नहीं है। वह रहेगा तो पर एक कौने में में पड़ा रहेगा। जरुरत होगी तो जुड़ेगा, यह बात समझ में आने वाली नहीं है। अनुभव करो। निरन्तर वर्तमान में रहने से यह सम्भव होता है। यहाँ किसी प्रकार की न तो धारणा रहती है, नहीं विचारणा। मन ही समय है। जहाँ वर्तमान है, वहाँ न भूत है, न भविष्य है। बस बूंद है, जो सागर से मिली नहीं है, वह जानती भी है, जा रही है, यही अनुभव रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”क्या यहाँ आकर भी पतन हो जाता है?“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“हाँ, शास्त्र में भी बहुत कहानियाँ है, इस जगह आकर भी संभलना रहता है। कांस्टेन्ट अवेयरनेस, जागरूकता &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;से। वह निरन्तर बनी रहे। रमण महर्षि के अंतिम दिनों में उनकी माँ वहाँ आकर रहने लग गईं थी। उनकी मृत्यु हुई। रमण ने उनके लिए समाधि बनवाई थी। वहाँ भी पूजा उनके ही सामने होने लग गई थी। ओशो भी पहुँच गये थे। फिर हीरे के मुकुट लगाने लग गए। सब चलता है, यह अंतिम अवस्था बस एक छलांग है, बहुत पास है, पर जरूरत यहाँ दुकान पूरी खाली करने की होती है। कुछ भी नहीं, मात्र अस्तित्व, वह भी मिट रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”बूंद जब समुद्र में मिल जायेगी, वहाँ क्या अनुभव होगा,“ ...... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”कौन किसको बताएगा? पूछो मत, चुप रहो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हें एकलव्य की कहानी सुनाई थी। कहानी सबने सुनी है, पर अर्थ समझाा नहीं है। जब गुरु के साथ एक लय बन जाती है, एक रसता, तब उसी की ही अनुगूंज सुनाई देती है। वही उसके भीतर प्रकट हो जाता है। पूरा अस्तित्व उसमें प्रकट हो जाता है। भीतर सब खाली कर देना। यही अभ्यास रहे। कुछ भी नहीं रहे। सुख-दुःख सब आएंगे। हिलना मत। डगमगाना मत। मुसीबतें आएंगी। छाती खोलकर सामना करना। हमें पोला नहीं होना है। प्रकृति पर भरोसा पूरा रहे। जितना भीतर खाली होता जाता है। न भूत न भविष्य, वहाँ बस वाह्यमन सिमटना चला जाएगा। फिर अंतर्मन ही सारे कार्य व्यवहार संभाल लेगा। वही विवेक है। वही गुरु है। सब जगह वही है, वही होगा, मौन में वही बोलेगा। कार्य-व्यवहार सभी सही होते वले जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे जाने के बाद मेरी बाते समझ में आयेगी। अभी व्यवहार में बहुत से काम हैं, घर है, परिवार है, नौकरी है।सब जगह रहो, बाहर की बात बाहर रहे, भीतर नहीं ले जाना है। रात को बिस्तर पर जाएँ। पर बाहर का सब छूट जाए। वर्तमान में रहने से पहली यही बात मिलती है। जीवन और जगत सें कटकर या काटकर कही नहीं जाना है। दूसरे क्या करते हैं, हमंे इससे कोई मतलब नहीं। हमें जो काम मिला है, उसे पूरा करना है। मन अधिक से अधिक वहीं रहे। स्वाभाविक रुप से मन की गति कम होती है। उसकी शक्ति बढ़ जाती हैं। हमें रहने की कला आनी चाहिए। बाहर जो घट रहा है, वह हमारे संकल्पों से कम होने वाला नहीं है। अरबों मनुष्यों के संकल्प है। जो घट रहा है, जैसा घट रहा है, वहाँ रहना है। मैंने बहुत पहले कहा था, शराब, जुआा, यह कभी बंद नहीं होगा। यह प्रकृति चाहती है। हजारों सालों से इन्हें बंद करने का प्रयास हो रहा है। जितना समाज आगे बड़ रहा है, ये प्रवृत्तियाँ भी उतनी तेजी से आगे बढ़ी हैं। समझना कठिन है। जिसने हमको बनाया है , उसी ने उनको भी भेजा है। अनावश्यक इस पचड़े में मत पड़ना। यहाँ न कुछ अच्छा है, न बुरा। चीजों को जैसे घटना है, वह घटेगीं पर हमें प्रभावित नहीं होना है। कहने का मतलब है न अतीत में झांकना है, न भविष्य में कल्पना करना है। दोनों ही मन के खेल है। यहाँ कुछ भी न अच्छा है, न बुरा है। नैतिकता हमारे ऐच्छिक कर्मो से आती है। जो माँस खाते है, वे माँस को अपने भगवान को अर्पित करते हैं, शाकाहारी फल-दूध अर्पित करते है, ये सब उनकी परम्पराएं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम इस विवाद में नहीं पड़ना है। जो जहाँ जैसा है, वहाँ वह है। हम कौन बदलने वाले होते है। हाँ, हमारा ही यह कत्र्तव्य हो तो उत्कृष्टता के साथ कत्र्तव्य निभाना चाहिए। भागवत में कहानी है , उस मांस बेचने वाले कोभी वही स्थिति प्राप्त होगई थी , जो उस संत को दुर्लभ थी। जो सवाल पूछने उस के पास गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने आपको बहुत पहले कंवरलाल की लड़की की शादी की घटना बताई। उसकी मदद के लिए धन जमा किया। प्रकृति ने मना किया। कुतिया काट लेगी पता लगा। उसने काट भी लिया। धन उस तक पहुँच भी गया। पर उसके काम नहीं आया। कोई ले गया। प्रकृति के खेल में हम सहयोगी तो बन सकते है, पर उसकी इच्छा के विरु( कार्य नहीं करना है, यह ध्यान रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम जब अंतर्मुखी बनेंगे,ें भीतर से अंतः प्रेरणा अपने आप बतायेगी, क्या करना है, क्या नहीं करना है। मैंने दीनदयाल जी को बताया था। मुझसे भी एक कार्य हो गया, जो नहीं होना था। मेरे मुँह से निकल गया, हो जाएगा। काम तो हो गया, पर प्रकृति के विरु( था, उसका परिणाम भी मिला। यह अटूट सि(ान्त है, याद रखना। शक्ति जरा सी आते ही बाहर का प्रलोभन बहुत जोर से आता है। मैंने भोग लिया, मेरा योग था। हाँ, अब दुकान खाली है। कुछ नहीं बचा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बात हमेशा याद रहे, जो अंतःप्रेरणा उठे, वह कार्य करते रहना है। पर कोई अपना चयन नहीं हो, अपनी निजी मान्यता नहीं हो। जहाँ कामना है, वही मन है। मन का जाला, मकड़ी के जाले से भी महीन है। इससे निकलना कठिन है। शास्त्र ने इसी का माया कहा है, ‘मन माया दुरत्या, यह मेरी माया है’ मेरी, भगवान कृष्ण की नहीं, तुम्हारी है। निरन्तर वर्तमान में रहने से ही इससे पार जाया जा सकता है। वर्तमान में क्या होगा, क्रिया होगी, पर विचारणा का दबाव नहीं होगा। लोग पूछते है, क्या मन नहीं होगा। अरे! मन तो भूत और भविष्य में रहता है। वहाँ जो है, बहुत शक्तिशाली है, पता करो, वहाँ सजगता तो होगी। पर वहाँ मन का दबाव नहीं हैं, वहाँ स्वतः ही कामना नहीं है। यह कोई निठल्ले की अवस्था नहीं है। आज भी इस नब्बे साल की उम्र में शरीर थक गया है, फिर भी में निरन्तर क्रियारत हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;14&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”मुझे याद है, आज सत्ताईस वर्ष पूर्व आपसे मिला था, तब लगता था, बहुत कुछ पाया है, बचपन से ही संस्कार थे। साधना जैसी भी मिली, करता गया। पर अब इतने वर्षो बाद लगता है, कुछ नहीं पाया है। मैं वैसा का वैसा ही रह गया हूँ। मात्र कुछ भावनाएं साथ रही, वे यहाँ आकर पूरी हो सकती है, यही उम्मीद बची रही। शुरु के वर्षो में जिज्ञासा थी, पर धीरे-धीरे लगा, मैं कही का नहीं रहा। आपने ‘अनंत यात्रा’ के पृष्ठ भेजे थे, मैंने छपा दिए। पर लगता है , उस उपन्यास के नायक ‘शिखिध्वज’, से भी गई गुजरी मेरी हालत रही, मैं न तो पूरी तरह अपने आप जुड़ पाया, न पूरी तरह संसार में ही पूरा उतरा। क्या कारण रहा?“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”जाना कहाँ था, मैंने तो कभी कोई आश्वासन नहीं दिया। जब में ही हिमालय से उतरकर बकानी के इस गांव में आ गया, तो जाना कहाँ है? हम आशाएं लेकर ही कहीं जाते है। वो कहते है, जब तक हम है, आप यहाँ है, चिन्ता न करे, ये सब पाखंड है। प्रकृति का अपना एक नियम है, उससे हम सब बंधे है। उम्मीद किससे? यहाँ तुम्हारी या किसी की आशाओं को पूरा क्यों करना है? जो यह वादा करते है, वे अपने आपसे झूठ बोलते है। मैं तो कुछ नहीं करता, जानता भी नहीं, बाहर क्या हो जाता है। कुटिया में गांव वाले आते है, बस नहाये-धोये बाहर चबूतरे पर सो गए। जाते समय मिलने आते है, कहते हैं, अच्छी नींद आई। उनकी तो कोई आशा नहीं है। न ही वे कुछ पाना चाहते हैं। जो पाने के लिए आता है, उसकी कभी कोई तृप्ति नहीं होती है। जो जानता है, वह कुछ करना नहीं चाहता। आप इतने वर्षों से यहाँ है? मैंने तो कोई सवाल आपसे नहीं पूछा। आपसे यही कहा है, सवाल नहीं, उत्तर देना सीखो। सवाल मन करता है, उत्तर हृदय देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर अभी जो कहा गया है, उस पर विश्वास नहीं हुआ। विश्वास तो अंधा होता है। जो माना गया है, वहाँ विश्वास तो पूरा करो। कमी यही रही। मैंने आपको पत्र में लिखा था, अभी आप में आत्मविश्वास की कमी है। मुझे उम्मीद है, भविष्य में आपका हर कदम सही ही होगा। मुझे तो उम्मीद है, पूरा विश्वास है। जो कहा है, उसे सुनो, उसे समझो, प्रयोग में लाओ। उम्मीद नहीं, आशा तो परम दुःख का कारण है। यहाँ तो बस एक सीरियल चल रहा है, इससे अधिक नहीं, जो काम प्रकृति ने सौपा है, उसे पूरा कर दो, बस ज्यादा उलझना बेकार है।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”आपने अंतत यात्रा में कुंभ के द्वारा नीलकंठ को कहलाया है। मेरा कार्र्य तुम्हारा विवेक जाग्रत करना था। हो सकता है, इसके बाद मेरा शरीर भी न रहे...यह क्यों?“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”क्यों, बस एक कहानी है, बस। प्रकृति हर एक को अपना कार्य करने भेजती है। यह भी कि एक ड्रामा चल रहा है। इसका कोई कारण नहीं है। किसी ने कहा है,‘एब्सर्ड ड्रामा’, आपने ही बताया था। इसका कोई कारण नहीं है। बु(िमता और विवेक में फर्क है। जब बु(ि शत-प्रतिशत शु० हो जाती है, तब विवेक जाग्रत होता हे। नीलकंठ और कुंभ एक ही सिक्के के दो पहलू है। जो मन संसार में भटकता है, वही मन अंतर्मुखी हो जाता है, तब वह अपने अस्तित्व को पाता है, पर मार्ग विवेक के द्वारा ही मिलता है। संसार में सफलता बु(ि के द्वारा मिलती है। शक्ति एक ही है। बु(िमता जहाँ दुनिया में वैभवशाली बनाती है, वहीं विवेक भीतर की सम्पदा को सौपता है। पर जो विवेकी है, उसे इस बात की कोई चिन्ता नहीं है कि उसे लोग किस तरह देखते है। वह बाहर के दबाव में विचलित नहीं होता है। पवित्रता उसकी अपनी निजी होती है, वह बाहर के दबाव के आगे अपने आपको बदलता भी नहीं है। मैंने बकानी की घटना बताई थी, जब गुरुकुल शुरु हुआ, तब मेरे विरु( बहुत ही गलत व्यवहार होता था। यहाँ तक कि मुझे मारने के &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिएभी लोग आए थे। यहाँ तक कि जो गुरुकुल का सेवक था, वह भी यह ंजानता था, पर उसने भी मुझे नहीं बताया। वे लोग लाठिया लेकर आए, मैं कुए पर एक लंगोटी में नहा रहा था। वे लोग सामने आए और लाठी मारकर नमस्कार करके चले गए। बाद में मैंने पूछा क्या बात थी। तब मुझे बताया गया था कि मुझे पीटकर भगाने के लिए कोई षडयंत्र था। बात बताने की है कि मुझे पता हो जाता तो क्या होता? मैं भी कुछ सोचता? पर नहीं, प्रकृति ने हमें साधारण मनुष्य बनाकर ही भेजा है।हमें, हम कुछ विशिष्ट हैं, ज्यादा जानते है, इस भ्रम से दूर रहना होगा। जो वास्तविक ब्रह्मनिष्ठ गुरु होते है, वे अपनी किसी भी विशिष्टता से अवगत भी नहीं होते। जो कुछ बाहर अप्रत्याशित घट जाता है, वह स्वतः हो जाता है, वे इस बारे में किसी भी प्रकार की कामना भी नहीं करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ बहुत से लोग आए। आए और चले गए, साधारण सी कुटिया में उन्हें कुछ नहीं मिला। वे कुछ पाने आए थें, चले गए, कुछ रुक गए कुछ ठहर गए। कई लोग हैं, क्यों रुक गए उन्हें पता नहीं, डॉ. बसावड़ा आए थें। शिकागो में अपना क्लिनिक चलाते थे। दरवाजे से मुझे एकटक देखते रहे, फिर पास आकर बोले, जो आपने पाया, मुझे दे दें। मैंने कहा मुझे पता नहीं, क्या है। यहाँ तो नदी बह रही है, वह सभी की है।आपका पात्र जितना बड़ा है , ले जाएँ मुझे कुछ पता नहीं है। यह जल सबका है, किसी एक का नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप अपने सवाल का उत्तर खुद पता करें, उत्तर मिलेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;15&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप ही क्या, यहाँ जो भी आता है,शार्टकट चाहता है। यह दुनिया का कायदा है, दुनिया मेंसफलता पाने के लिए शार्टकट चल पड़ा है। परयहाँ का नियम दूसरा है।यहाँ कोई शार्टकट नहीं है। मुझे साठ साल से अधिक का समय लग गया था। बचपन में एक बार बैठा था। तब अचानक विचारों की श्रृंखला रुक गई थी। कुछ समझ नहीं पाया। फिर इंजीनियर साहब से पूछा, उन्होंने सब समझाया, पर फिर मैं भी परम्परागत साधनाओं में चला गया। धीरे-धीरे सब छूटता गया, आपने ‘अनाम यात्री’ भी लिखा है। जब मुझे इतने वर्ष लग गए। आप चाहते है, कुछ दिनों में कुछ घंटों में हो जाए। आप जाग्रत हो जाएं। ‘अनन्त यात्रा’ में कहा है, लगन महत्वपूर्ण है, एक दिन लक्ष्य तक ले जाती है। शस्त्रों ने इसीलिए इसे साधना माना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने बहुत बार समझाया है, शरीर और उसके द्वारा की गई साधनाओं से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यह मानसिक क्रिया है। गीता में दो शब्द आए है। ‘मन‘ और ‘माम,’ एक व्यक्तिगत मन है, दूसरा अंतर्मन है। मैंने कभी आत्मा शब्द का प्रयोग नहीं किया। यह रुढ़ हो गया है। फिर इसकी व्याख्या करो। ईश्वर शब्द भी रुढ़ हो गया है। सबके अपने-अपने ईश्वर है। जैसे कागज की दो परते होती है, उसी तरह इस मन की दो परत है। एक बाहर की ओर है, एक भीतर की ओर है। बाहर की ओर जो जाता है, वह आपका बाहरी मन है, जो भीतर की ओर हो रहा है, वह आपका अंतर्मन है। है वह शक्ति एक ही। एक की पहचान बु(िमता से होती है, दूसरी की पहचान विवेक से होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे कठिन होता है मन और मस्तिष्क का गठजोड़ टूटना। मन का यह अस्वाभाविक निवास स्थान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन का मूल स्थान नाभि में है। इसे आप ”कॉस्मिक माइन्ड“ या ”नो माइन्ड“, भी कह सकते है। मैंने इसे अंतर्मन कहा है। यह विराट से जुड़ा रहने कारण अत्यधिक शक्तिशाली है। पर यह जो कुछ कहा है, यह बु(िगत विवेचन नहीं है। यह उससे परे है, यह अनुभव है। पहले आपको अपने मन को नियंत्रण में ले जाना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने बार-बार कहा, मन की मृत्यु नहीं होगी। मन का नाश नहीं होगा। पंतजलिजी ने निरोध शब्द को सही तरह से समझाया होगा। चित्त की वृत्तियाँ जो तरंगों की तरह है, जब शांत हो जाती है, तब क्या होता है। योग मन और प्राण दोनों शक्तियों का एक हो जाना है। यह स्वाभाविक अवस्था है। अनन्त यात्रा में ‘रानी चूड़ाला’ राजा शिखिध्वज को यही समझाती है, आसन, प्रणायाम आदि बहिर्मुखी निरर्थक साधनाओं सेकोई लाभ होने वाला नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाह्य मन जब नीचे उतरता है, तब इसकी अनुभूति स्वयं को होती है। विचारों की संख्या कम होने लगती है। कुछ दिव्य अनुभव भी होते है। अनवरत नाद सुनाई पड़ता है। पूर्वभास सा होने लगता है। फिर मन धीरे-धीरे कंठ पर होता हुआ हृदय तक आता है। यहाँ पर आकर प्रेमानुभूति उठती है। रविन्०नाथ टेगोर का संस्मरण पढ़ा था।अचानक उन्हें तालाब में, रास्ते के पोखर में, छोटे डबरेमें एक ही प्रकाश दिखाई पड़ा था, यह बात गीतांजलि लिखने के बहुत बाद की है। मन जब हृदय पर आता है, तब बाहर का बहुत कुछ छूट जाता है। यहाँ पर आकर बूंद निर्मल तो हो जाती है, पर तभी भीतर का भी अनुभव होता है और बाहर भी आना-जाना बना रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर हमारा मन अहंकारी है, वह बाहर अपनी पहचान चाहता है। संत लोग कितनी मालाएं पहनते है, भभूत लगाते है, इससे क्या होगा? जो नहीं है, क्या वह प्रकट हो जाएगा। वह तो तभी प्रकट होगा। जब मन, अंर्तमन में लय होगा। तब अंतर्मन सारे कार्य व्यवहार संभाल लेता है। बु(ि विवेक में डूब जाती है। यहाँ पर आकर राग-द्वेष विलीन होने लगते है। हम कहते है, दर्पण हो जाओ। वह यहाँ घटता है, पर यहाँ आओगे कैसे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत पहले जब आप मिले थे। मूलचंद जी आते थे। डाह्याभाई आते थे। पोस्टमास्टर कन्हैयालाल जी थे। वे लोग आते गुरुकुल में थे। पर इनका अधिक समय आसन, प्रणायाम, शास्त्र अध्ययन तथा बातों मे बीतता था।मैंने एक-दो बार इशारा भी किया पर समझ नहीं पाए। वे बहुत भले सेवा भावी थे।निर्मल चरित्र के थे। पर मन जो एक बार परम्परागत विचारों में बंध जाता है, वह छूट नहीं पाता है। मन तो किसी न किसी एक खूंटे में बंधा रहना चाहता है। कन्हैयालाल जी विपश्यना सीखकर आए थे। वे वहाँ कुछ बन भी गए थे। चोयल साहब कहते थे, ध्यान सिखाओ, वे कृष्णमूर्ति के अनुयायी है, वे अवेयरनेस की बात करते है। जब कृष्णमूर्ति आते वे और उनके मित्र उनके लैक्चर सुनने पहुंच जाते।फिर मुझे सुनाने आते। मुझे उस आधार पर परखते। अगर मैं उन जैसी बात कर रहा हूॅं, तो ठीक है, नहीं तो, क्या कहा जाए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चहे मंत्र जपो, किसी मूर्ति का ध्यान लगाओ, विपश्यना में जाओ, सब बाहर ही भटकाते रहेंगे। यह बात ध्यान रखना। जब स्वाभाविक साधन उपलब्ध है, तब बाह्य साधनों में जाकर मन को भटकाने की क्या जरुरत है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने ‘अनंत यात्रा’ में कहा है, आपको समझाया है, जो भी कार्य प्रकृति ने सौपा है, मन को पूरी तरह उस में लगा दो। किसी भी हालत में उसे विपरित जाने से रोकना होगा, मन की यह स्वाभाविक अवस्था हो जायेगी। वह हर जगह एकाग्र होने लगेगा। किसी एक ही मुकाम पर एकाग्र करने से उसकी दासता शुरु हो जाती है। ये सारेे, पंथ मत, मनुष्य को गुलाम बनाए रखने की परम्परा में ही है। ये सब व्यर्थ हैं। जो भी साधन है, उसमें मन लगाए रखना ही सार है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी महत्वपूर्ण बात है, मन जब क्रिया में न हो, तब उसे बलपूर्वक क्रिया में लगाना बेकार है। यह सब सम्भव होता है, खाली समय मिलते ही अपने मन को विचार रहित लाने का प्रयास करना। यह सामान्य विधि है। इसे अवलोकन कहदो। धीरे-धीरे दो विचारों का गैप अनुभवन में आता है, इसे आप वत्र्तमाव कह सकते है, यह समय नहीं है। विचार ही भूत और भविष्य में रहता है। जहाँ विचार नहीं है, वही वर्तमान घटता है। भले ही यह क्षण भर का हो, साधना यही है। यह अन्तराल धीरे-धीरे बढ़ता जावे। वर्तमान में विचार अपने आप गिर जाता है। वर्तमान ही, इस अनंत का दरवाजा है। ‘अनंत यात्रा’ में इसी बात को स्पष्ट किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात होती भी है, लोग आते है, पूछते है। मैं कहता हूँ, वर्तमान में रहो। वो कहते है, यह कैसे सम्भव है। मैं कहता हूँ, आप यहाँ आए है, अकेले आए है या और भी साथ है? वे हँसते है, कहते है, अकेले है, फिर मैं चुप हो जाता हूँ। कैसे समझााऊँ, कि वे अकेले नहीं आए,अपने साथ बहुत बड़ी भीड़ साथ लेकर आए है। रात को सपने आते है, कितने लोग दिखाई पड़ते है। ये शाम तक तो साथ नहीं थे, रात को कहाँ से आ गए। सुबह उठते ही कहाँ चले गए? इन सभी की विदाई हो, तब जागृति, विचारण और स्वप्न में चेतना की एक धारा का अनुभव होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”आपने आत्मकृपा की बात कही थी?“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“हाँ आपने किताब भी लिखी, पर आत्मकृपा आपसे ही गायब हो गई। ”मैं“ और ”आत्म“, में भेद है, मैं और माम में भेद है। ”माम“, की कृपा, जब मैं इस ‘माम’ में विलीन हो जाता हूँ, तब ‘माम’ ही सारे कार्य व्यवहार को संभाल लेता। जब यह पता लगता है कि यह मेरी ही माया है। यह बाहर और भी भीतरका जगत मैंने ही बनाया है। बाह्य जगत से अधिक कष्टकारी मनोजगत होता है। बाह्य का जगत तो निरन्तर परिवर्तनशील है, पर भीतर का जगत तो संस्कार में ढलता जाता है। खली न हो तो संग्रह ही कारण बनता चला जाता है।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”यह कैसे कम हो?“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”फिर वही बात, बाह्य में किया गया कोई भी प्रयास अन्तर्मुखी बनने में सहायक नहीं होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके लिए एक ही उपाय है, निरन्तर वर्तमान में रहा जाए। वर्तमान का यह क्षण समय की सबसे छोटी इकाई मानलो। जहाँ समय है, वहाँ मन है, वही भूत है, वही भविष्य है। भूत का कोई अस्तित्व नहीं है। वह तो गया, हम उसे स्मृति के द्वारा वर्तमान में लाते है। भविष्य है वह एक सम्भावना है। जहाँ वर्तमान है, वहाँ निरन्तर सजग रहो तो पता लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम वर्तमान में हैं, वहाँ विचार नहीं है। यह निर्विचारता ही हमारा लक्ष्य है, जो हमें सदा से उपलब्ध है, पर हमें इसका ध्यान नहीं है। यहाँ जानना कुछ भी नहीं है, मात्र जिसे हम भूल गए थे, उसकी याद है। गीता में कहा गया ह, ै‘माम अनुस्मर यु( च’ मेरा निरन्तर स्मरण। यह स्मरण जप करना नहीं है। सुमिरन शब्द यहीं से बना है। काम तो करना ही होगा। मैंने यहाँ कुटिया पर लिख दिया था, ‘आलसी मत बनो,कार्यरत रहो।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसीलिए मैंने ध्यान शब्द का भी प्रयोग नहीं किया। ध्यान शब्द एकाग्रता के साधनों के लिए रुढ़ हो गया है। जितना हम वर्तमान में रहेंगे, एकाग्रता सहज ही प्राप्त होती जाएगा। मन स्वतः नियंत्रण में रहना सीखता जाएगा। मन बहुत चतुर है, याद रखना। ज्यांे ही तुम भीतर उतारोगे,यह तुम्हारे अनुभव को शब्द देने लगेगा। तुम अपने आप को असाधरण मानने लगोगे। गुरु बनना चाहोगे, बचना। यह काम तो तुमने पहले ही बहुत किया है। इसीलिए बार-बार यहाँ आते हो, बचना, बाहर के दुश्मन इतने बुरे नहीं है, जितने भीतर के होते है। यह मन बहुत चतुर है। अनुभूति बु(ि से परे है। जहाँ तक बु(ि है, वहाँ तक सब मन की कपोल कल्पनाएँ है, हम सत्य को कल्पनाओं से ढक देते हैं। वहाँ निरन्तर सजगता ही उपाय है। मन ज्यांे ही कल्पना लोक में ले जाना चाहे, तब सजग हो जाना। सजगता आग की तरह है, घास-फूस को तुरन्त जला देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”गीता में कहा गया है,‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’, इसका क्या आशय रहा होगा?“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”आशय क्या, वह धर्मात्मा तुरन्त हो जाता है। कहानियाँ हंै। इसके पहले श्लोक में आया है, ‘कोई कितना भी बुरा क्यों न हो। स्त्री, पाप योनी, शु० सभी धर्मात्मा हो सकते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें क्या गलत है, धार्मिकता, कर्मकांड से परे है। इसे अध्यात्म भी कहा जाता है। यह जीवन जीने की शैली है। एक वाक्य में कहा जा सकता है, वत्र्तमान में रहो। ज्योंही हम यह सीख जाते हैं,यह हमारे जीवन जीने की शैली बन जाती है।हम धर्मात्मा हो जाते हैं। जहाँ तक मन है , वहीं तक समय है। वहीँ तक अतीत है और भविष्य है, वहीं तक पाप और पुण्य है। स्वर्ग और नर्क है। सब मन ही तो है, मन के खेल हैं। जब मन ही नहीं रहा तब क्या,...... क्षिप्रं, रस्सी जब कुएं में बाल्टी उतारती है, तब निरन्तर वह कार्य करती है, पर धीरे-धीरे वह घिसती जाती है, फिर अचानक टूट जाती है। परन्तु इस अचानक तक आते-आते उसे समय तो लगा था। यह हम क्यों भूल जाते है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब पहली बार आप मिले थे, आप व्रत, उपवास करते थे। मुझे देखकर आप चैके थे। मैंने कभी व्रत के लिए नहीं कहा। स्वयं मेरा भोजन इतना अल्प रहा है कि लोग आश्चर्य करते हैं। व्रत-उपवास से जाग्रत पुरुष का कोई सम्बन्ध नहीं है। यह परम्परागत रुढ़ी है। हाँ, भोजन स्वास्थ्य के लिए अनुकूल हो। आहार-विहार में संतुलन है। आपको दो कहानियाँ थीं। पहली ब्राह्मण बालक मूर्ति बनाता है और सिर काट देता है। पिता जाकर वणिक जिसने अनुष्ठान करवाया था ,उससेे पूछता है, धन वहाँ से आया था। वह बताता है कि उसका संकल्प था जो धन कमाई के यहाँ डूब गया है, मिल जाएगा तो कथा कराएगा। वह जाकर वणिक को उसका धन दे आता है। दूसरी कहानी थी कि संत जो भोजन करने गए थे, वे सेठानी का हार चुरा लाते है। फिर सोचते है, यह क्यों हुआ। वापिस लौटते है, पूछते है, तब पता लगता है कि जिस सेविका ने भोजन बनाया था, उसकी हार चुराने की भावना ढ्ढ़ हो चुकी थी। वही भावना अन्न ग्रहण के सरथ उन्हें पराजित कर गई। संत हार वहाँ रख कर लौटते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहानी, कहानी होती है। सार जानना चाहिए। अéा से मन बनता है। मन का पोषण होता है। अéा की शु(ि अपरिहार्य है। इससे मन की गति कम होती है। पर यह छोड़कर अनीति से धन कमाओ, व्रत-उपवास करो, सब व्यर्थ है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर कितना समझाओ, कोई मानने वाला नहीं है। सबके पास अपने- अपने तर्क हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी आसन सबके लिए नहीं है। हठ योग का जाग्रति से कोई सम्बन्ध नहीं है। आध्यात्म के नाम पर बजार में सभी कुछ परोसा जाता है। रास्ता मन से ही है। मन से ही उसके पार जाया जा सकता है। मन को देखना है। गहरी सतर्कता के साथ, हर पल साथ रहता है। मन एक साथ दो कार्य कर सकता है। वह देखता भी है और दिखता भी है। वही दृष्टा है, वही दृश्य है। देखते-देखते दृश्य सिमटने लग जाता है। बातें सुनने के लिए नहीं है, प्रयो में लाओ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”तुमने पूछा था, पच्चीस सालों से मेरे साथ रहे, क्या पाया?“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”पूछा, अपने आप से पूछो, अगर कुछ पाने के लिए ही आए थे, तो समय व्यर्थ गया। पानी में पड़ा पत्थर भी सौ साल तक भी वैसा ही रहता है, परिवर्तन वहीं आता है, जहाँ उसके लिए जगह हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गीता में जो कहा गया है, वह प्रवचन के लिए नहीं है। तुरन्त, और यह भी कहा गया है, मन पर नियन्त्रण पाना कठिन है। अगर तुम यह समझ गए कि मन ही समय है। वे पच्चीस साल तुम्हारे मन पर अंकित छाप की तरह हैं,तो और वर्ष लग जाऐगेे। समझ गए कि मन ही समय है। मन जिन्दा रहता है, अतीत में या भविष्य में। जहाँ दोनों नहीं है, वही मन भी नहीं है। वहाँ समय कहाँ होगा? मात्र वर्तमान है, वर्तमान का द्वार ही भीतर का दरवाजा खोल देता है। जहाँ उस जगह जाना सम्भव है। परिवर्तन बाहर कुछ नहीं होगा, पर भीतर कुछ गुछ बदलनेे लगता है। विचारों के कम होते ही , विकार भी कम होने लगते है। पर जो लोग एक बाहर की ओर लक्ष्य बनाकर कुछ पाने के लिए निकलते है, वे वैसे के वैसे ही रह जाते है। बाहर जो आज सही दिख रहा है, वह कल गलत भी हो सकता है। बाहर कहाँ तक जाना है, परम्परागत साधनाएं प(तियाँ बाहर ही भटकाती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ समय महत्वपूर्ण नहीं है। समझो, यह भटकाने वाली बातें हैं। हमारे ग्रन्थ यही करते आ रहे हैं। वे बाहर कोई लक्ष्य बनाते है। हम जब तक उस तक आते है, दूसरा हमारे सामनेे आ जाता है। मन को जरा सी छूट मिलती है, सतर्कता हटती है, वह पचासों सपने ले आता है, वह तुरन्त भविष्य में दौड़ जाता हैं। समझ यही है कि रास्ता भी यही है। इसलिए कृष्णमूर्ति कहते थे पाथ लैस लैंड , पर उनके अनुयायी समाज से कटकर रास्ता तलाश कर रहे थे। मेरी बातें उन लोगों के समझने में नही आतीं थीं। जाना मन से ही है। व्रत, उपवास, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, तंत्र- मंत्र , ये सब परम्परागत उपाय हैं। जड़ तो मन मे ंहै, वहीं से शुरुआत हो। सही आहार और व्यायाम शरीर के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। बस इतना ही इनका महत्व है। मन से हटकर क्रियाएं करो तथा वर्षो बाद मन पर आओ। यह सब व्यर्थ के उपाय है। दूसरे जो अपने ऊपर किसी नाम पर, किसी चित्र पर, एकाग्रता करना बताते है, वे भी धोखा ही देते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन ही तुम्हें नियंत्रित कर रहा है, अभी तक तुम मन से ही नियंजित हो रहे हो। मन तुम्हारे भीतर कोई एक लक्ष्य बना देता है। तुम उनके पीछे चल देते हो। बार-बार कहा है, मन से ही मन के पार तुम्हें जाना है। दूसरा कोई उपाय नहीं है। मन ही कल्पनाओं से तुम्हें अनुभव भी दिखा देता है। जो भावतीत ध्यान की बात करते हैं, वह भी एक प्रकार की कल्पना ही है। यह हमारा मन ही हमें मुक्ति दिलाता है। यह बंधन में बांधता जाता है। जब जो चाहते है, वही दिखना शुरु हो जाता है। मन की शक्ति अपरम्पार है। पर उसके परे जो है, जो अतर्मन है, वह विराट से जुड़ा होने के कारण अत्यधिक शक्तिशाली है। जो समझतदार हंै, वे इसी मन को एक उपाय देकर तुम्हें उलझा देते है। उस दिन तांत्रिक आए थे। वे भूत-प्रेतों की, सी(ियों की चर्चा कर रहे थे। उनकां भैरव दिखाई पड़ते हैं। मुझ से भी कहलाना चाह रहे थे, यह भी मन का ही प्रोजेक्शन है। मन जैसा चाहता है, बाहर वैसा ही दिखना शुरु हो जाता है। हम जो भी कल्पनाएं करते है, वे हमें सच दिखाई देती है। क्योंकि उन्हें हम ही ताकत देते है। देवी-देवताओं के दर्शन के पीछे यही धारणा है। हमारी ही शक्ति उन्हें प्रकट कर देती है। वे भी यही कहते है। शक्ति तुम्हारी ही है,जिसने मुझे प्रकट किया है। स्वर्गा और नर्क हमने ही बनाए हैं । हमारा लोभ और भय इन्हंे बना देता है।आपने सवाल किया था, हम लोग वृन्दावन गए थे। स्वामी शरणानन्दजी के आश्रम में ठहरे थे। वहाँ के लगभग सभी मंदिरों में आप गए थे। मैं बाहर ही गााड़ी में रहा। आप बार-बार पूछते थे, मैं भीतर क्यों नहीं जा रहा हूँ? गुरुकुल मंे मुकेश भाई अखण्ड रामायण कराते थे, यज्ञ होता था, मैं उधर नहीं गया। वे भी पूछते थे, क्यों? क्या उत्तर होगा, आपने मुझे अपने साथ जैसा आप चाहते हैं, करने को क्यों कहते हैं? हम ही तो मूर्तिया बना रहे है, और हम ही पूजा कर रहे है, उनसे मांगते भी है, यह सब मन का ही प्रपंच है, इससे अधिक कुछ भी नहीं है। एक दिन मेरी बातें समझ में आएंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं क्या साथ लेकर आया था। एक झोला था, यह शरीर, गुरुकुल कभी का छोड़ दिया। जिस दिन सरकार को सोंपा ,सब छोड़ दिया। शरीर को भी अब जाना है, यह प्रकृति का नियम है। पर यह याद रखना है कि यह कभी हमारा रहा ही नहीं। यह सम्पत्ति भी हमारी नहीं है शास्त्र की पहली पंक्ति थी-तेन त्यक्तेन भुंजीथा, त्याग करते हुए भोग कर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर जो हम चाहते है, जो पाना चाहते है, वह हमारी पूंजी निरन्तर हमारे साथ है, पर हमें उसका ध्यान नहीं है। यह ध्यान ही सजगता है। अवेयरनेस है। उसका स्मरण निरन्तर रहे, यही ध्यान है। पर जो हमारा नहीं है, वह हमेशा हमारा बना रहे। यही संसार है। यही हमारी मृग-मरीचिका है, जो हमारा हमेशा है, उसकी कोई खोज-खबर नहीं है।जो हमारा है, उसे क्या पाना है, उसे जो भूल गए है, उसकी स्मृति ही साधना है। यही सुमिरन है।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”आपका सि(ान्ता तो बहुत छोटा सा है?“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”पर आपने पूछ-पूछ कर इतना बड़ा कर दिया है। मौन ही सत्संग है। वही साधन है, वही साधना है। वहाँ मन अपने स्वाभाविक रुप को पाने लगता है। पर जहाँ शब्द आए, वही बु(ि आ जाती है। विचार-बु(ि की पहचान है। हस पथ पर चलने के लिए दो ही बाते मैंने बताई है, स्वाद पर नियंत्रण रखना और बोलने पर। यही एक इंद्रिय दो-दो काम एक साथ करती है। इस पर नियंत्रण सबसे कठिन होता है।जितना नियंत्रण होता जाए, उतना बेहतर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिरी बात, शांत बैठ जाना और कुछ न करना, चोयल और मेहरा ने पूछाथा, पैसिव अवेयरनैस, चॉइस लैस अवेयर नैस, यह मेरी मान्यता नहीं है। ध्यान यानि निरंतर अवेयरनैस, निरन्तर वर्तमान में रहना, जीवन की शैली है। प्रकृति ने हमें एक निश्चित कार्य से यहाँ भेजा है। उसका पता तभी लगता है, जब हम अन्तर्मुखी होते हैं। और अन्तर्मुखता में प्रवेश तभी होता है, जब हम वर्तमान में रहने लगते हैं। यहाँ जो भी घटता है, जो भी होता है, वहाँ न लोभ है, न भय है। न स्वर्ग की चाह है, न नरक का भय है। जो कृत्य होता है, वह स्वतः सेवा में ढल जाता है। ध्यान इसीलिए नहीं सिखाया जा सकता। जो ध्यान सिखाने की बात करते है वे समाज से भागकर कहीं ओर ले जाने की बात करते है। प्रकृति ने शांत होकर जड़ हो जाने के लिए नहीं भेजा है। हम शांत रहें , निरन्तर सजग रहें और कर्मरत रहेंं। सब प्रकृति का है, वह निरन्तर दे रही है, तेरा तुझको सौपत, क्या लागे मेरा, यही भावना बनी रहे। मेरे जाने के बाद यह शरीर भी किसी के काम आए तो अच्छा होगा। इसे किसी अस्पताल में दे देना, वैसे बहुत कृश हो गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-5334680569913664922?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/5334680569913664922/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=5334680569913664922&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/5334680569913664922'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/5334680569913664922'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2011/08/2.html' title='गुरू:वाणी  2'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-8712558125246030976</id><published>2010-07-24T21:10:00.000+05:30</published><updated>2010-07-24T21:10:01.095+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपन्‍यास'/><title type='text'>मैत्रेयी</title><content type='html'>मैत्रेयी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चप्पो चील ने आकर सूचना दी थी कि उसने नीलू के शरीर को नाले के पास जहाँं हरी घास का मैदान है, मरा देखा है। वह किसी आदमी की गोली का शिकार हुआ है। उसने आदमी को उसकी तलाश में घूमते देखा था। &lt;br /&gt;सभी जानवर इस सूचना को पाकर हताश हो गए।&lt;br /&gt;‘क्या किया जाय? यह आदमी तो हमारा जीवन ही हराम कर रहा है।“&lt;br /&gt;‘क्या इससे लड़ाई शुरू कर दी जाए?“&lt;br /&gt;‘अब हम अकेले तो हैं नहीं, हमारी सामूहिक शक्ति का क्या आदमी की ताकत से कम है?“&lt;br /&gt;कालू चुप था। सब उसको ही घेरकर बैठ गए थे।&lt;br /&gt;तभी गिलहरी ने सवाल किया, ”तुम तो ज्ञानी हो? क्या ईश्वर को यही पसंद है, यह ईश्वर है भी या नहीं, या यह भी आदमी की मनगढं़त खोज है? कहते हैं, भगवान राम ने मेरी देह पर अंगुलियां रखीं थीं, तब से मेरे शरीर पर ये धारियां बन गई है? मैं तो नहीं मानती, यह सब कहानियां हैं।’&lt;br /&gt;कालू फिर भी चुप था।&lt;br /&gt;क्या कहता, सामने नीलू का शव अब आने को ही था, जो जानवर हिंसा कर छोटे जानवर को शिकार कर उसका मांस खाते थे, वे ही उसके शरीर को लेेने गए थे, ऊपर आकाश में चिड़ियों की आती कतारें, बता रही थीं कि नीलू का शरीर अब आने ही वाला है।&lt;br /&gt;नीलू के शरीर के आते ही अचानक कोहराम मच गया। उसकी माँं दहाड़ मारकर रो रही थी। उसकी आँखों के आंसू थम ही नहीं पा रहे थे। वही एक मात्र उसका सहारा था, जो उसकी देखभाल कर रहा था। इस आई हुई विपत्ति में संगी-साथी एक-एक कर विदा हो रहे थे।&lt;br /&gt;तब कालू ने गर्दन ऊंँची की, गंभीर आवाज में बोला।&lt;br /&gt;”यह दुख की घड़ी है, पर मैं आपको एक छोटी सी कहानी सुनाता हूंँ। यह कहानी मेरे ही साथ जुड़ी है, शायद आप सबके प्रश्नों का उत्तर उसमें आ जाए।’’&lt;br /&gt;‘बात तब की है, जब मैं नया-नया, बाबा के पास आया था।&lt;br /&gt;एक दिन बाबा को दूसरे नगर में अपने मित्र&amp;nbsp; के पास जो एक सन्यासी&amp;nbsp; थे, उनके पास जाना था, हम लोग पैदल ही चल पड़े थे। दो दिन के विश्राम तथा लगातार यात्रा के बाद जब हम उस नगर के समीप पहुंँचे तो पाया नगर पर तो किसी शत्रु विद्रोही का हमला होने वाला है।&lt;br /&gt;नगर का द्वार बंद था, उसके परकोटों पर सेना आ चुकी थी। बाहर जो मार्ग था, वहाँं शत्रु सेना का पड़ाव था।&lt;br /&gt;हमें शत्रु का जासूस समझकर पकड़ लिया गया था। मैं तो पशु था, मुझे क्या पकड़ना, पर मैं बाबा के साथ था, इसीलिए मुझे तो उनके ही साथ रहना था।&lt;br /&gt;हमें पकड़कर, वहाँं एक तंबू के पास ले जाया गया। वहाँं एक बूढ़ने आदमी के साथ एक सुदर्शन युवक बैठा था। उसके पास बड़ी सी तलवार रखी थी, वह बाबा को देखकर चौंका, बोला, ‘आप जासूस तो नहीं हैं?’&lt;br /&gt;‘नहीं, हम तो .बावई गांव से आ रहे हैं, यहांँ पर हमारे गुरु भाई स्वामी सोमगिरी आए हुए हैं, उनसे मिलना था, बस।’&lt;br /&gt;‘तो आप भी साधु हैं।’&lt;br /&gt;‘नहीं गृहस्थ हैं?“&lt;br /&gt;‘पर आपके चेहरे से तो लगता है, आप योगी हैं!“&lt;br /&gt;‘जैसा आप समझंे।’&lt;br /&gt;‘तो बताइए, मुझे विजय मिलेगी?“&lt;br /&gt;‘बाबा ने उसका चेहरा देखा, बोले, प्रयास करें, सब ठीक है।’&lt;br /&gt;‘वह जो बूढ़ा वहां बैठा था, खिलखिलाकर हंसा, क्या ठीक है?“&lt;br /&gt;”बाबा!, उनसे लड़ना कठिन है, राजा की सेना बहुत बड़ी है, राजा भी ताकतवर है, उससे लड़कर जीतना कठिन है।’&lt;br /&gt;बाबा हंसे, बोले ‘प्रयास करें।&lt;br /&gt;‘तब रुकिए, मैं भी आपके साथ चलता हूं।’&lt;br /&gt;‘कहाँं?&lt;br /&gt;‘उसी बगीची में जहाँं आपके गुरु भाई रुके हैं, आपके साथ मुझे कोई नहीं रोक पाएगा।’&lt;br /&gt;हम धर्म संकट में थे, मैंने बाबा की तरफ देखा, वे शांत थे। उनके चेहरे पर मुस्कराहट थी। वह युवक अपने दो-तीन साथियों के साथ हमारे साथ हो गया था।&lt;br /&gt;हम राज्य के दरवाजे पर आए, तब द्वारपाल सेे जब बाबा ने स्वामी सोमगिरी का नाम लिया, तो उन्हें वहीं से बगीची की ओर जाने को कह दिया गया, परकोटे का द्वार खुल गया था।&lt;br /&gt;वह युवक भी अपने साथियों के साथ हमारे साथ आ गया था।&lt;br /&gt;हम जब बगीची में पहुंचे, तब वहांँ पता लगा, वहांँ के राजा भी उधर आने वाले हैं, वह युवक अपने साथियों के साथ जाकर भक्तों में बैठ गया।&lt;br /&gt;मैं तो कुत्ता था, मुझे कहाँं जगह मिलती, मैं दूर जाकर पेड़ के नीचे बैठ गया था। &lt;br /&gt;तब तक राजा भी अपने सिपाहियों के साथ उधर निकल आया था। वह सीधा जहाँं बाबा बैठे थे, उधर ही गया। स्वामी सोमगिरी को प्रणाम कर वह वहांँ बैठ गया।&lt;br /&gt;राजा का चेहरा उदास था, पर उसके चेहरे पर दुश्मन के होने वाले हमले से कोई भय वहांँ नहीं था।&lt;br /&gt;‘बाबा, क्या सोचा आपने,“ राजा बोला, “मुझे मृत्यु से भय नहीं, मेरे जीवन की एक ही इच्छा है, मैं अपने पुत्र का मुख देखकर प्राण त्यागँूं।“&lt;br /&gt;”आप ही बीस वर्ष पूर्व यहाँं पधारे थे। आपने कहा था, ‘एक दिन अवश्य पुत्र का चेहरा आप देखेंगे, मैं वर्षों से उसकी खोज में भटकता रहा हूं। वह दस्यु उसे पता नहीं कहा ले गया, मैंने कहांँ नहीं ढूंँढ़ा, उसकी मांँ, आपकी ही आज्ञा से अब तक जीवित है।’&lt;br /&gt;‘राजन, सब होनहार है,“ स्वामी&amp;nbsp; जी बोले।&lt;br /&gt;‘हां।’&lt;br /&gt;‘सुबह तुम मंदिर जाते हो?’&lt;br /&gt;‘हाँं,’&lt;br /&gt;‘माँं से क्या मांगते हो, बस पुत्र...?’&lt;br /&gt;राजा अवाक थे।&lt;br /&gt;‘वह जो जननी है, पांच भूतों से यह शरीर बना है। पृथ्वी माँं है, आकाश पिता है, तीनों तत्व मिलकर, मन-प्राण की पूर्ति करते हैं। पर मांँ, जो है, वह पंचभूतों में है, उससे अलग भी है, तुम वर्षों से उसके पास जा रहे हो, एक बार उस को ही&amp;nbsp; तो&amp;nbsp; मांँगा होता। मनुष्य वही माँंगता है, जो वह है, जो उसके पास है। मात्र जो शरीर&amp;nbsp; के लिए है, जो शरीर की आवश्यकता की पूर्ति करता है।’’&lt;br /&gt;राजा देवी भक्त था, वह सुबह-सुबह मंदिर अवश्य जाता था। पर स्वामीजी&amp;nbsp; जो कह रहे थे, वह उसके रोज-रोज&amp;nbsp; के जाने से अलग था।&lt;br /&gt;‘‘कल सुबह भोर की पहली किरण के साथ जाओ, वहांँ कोई संगी साथ न हो, अकेले, जैसे माँं के पेट में बच्चा रहता है, कोई बाहर का सहारा नहीं, माँं ही उसे आश्रय देती है। वही गर्भ में रक्षा करती है। तभी मंदिर में जहाँं प्राण-प्रतिष्ठा होती है। उसे गर्भ स्थान कहा जाता है। वहांँ पाषाण शिला नहीं होती। ‘चैतन्य’ का आगमन होता है। जाओ, कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं, बस तुम हो, और मांँ हो, जाओ, सब भूल जाओ, बस मांँ को पुकारो, जाओ।’’&lt;br /&gt;मैंने बाबा की तरफ देखा, वे शांत थे, तथा मुस्करा रहे थे।&lt;br /&gt;रात को ही बाबा के पास जब मैं उसके पाँंव छूने गया, तब वे धीरे से बोले, ‘तुम भी इसके साथ रहना।’&lt;br /&gt;मैं चौंक गया।&lt;br /&gt;मुझे याद आया, मैं भी पहले घंटों देवी की पूजा किया करता था। ‘दुर्गा सप्तशती’ मेरी जिह्ना पर थी। पर मैंने कभी ‘‘माँं’’ का दर्शन नहीं पाया था। क्या वास्तव में कोई शक्ति भी होती है या नहीं? मेरा अपना अनुभव नहीं था। मैं था शास्त्री, दुनिया भर की कहानियाँं, दृष्टांत मुझे याद थे। दुनिया तो पागल है जो पढ़ा-लिखा है, उसके पास मधुर कंठ है, वह आसानी से दूसरों को भी बेवकूफ बना सकता है। मुझे याद आया, जब मैं एक बार किसी कस्बे में भागवत-कथा करने गया था, तब मेरा रथ एक जुलूस&amp;nbsp; में निकला था। उस शोभायात्रा में हर घर पर महाजनों ने पुष्पों से भरे टोकरे भिजवाए थे कि जब मेरा रथ उसके घर के सामने से निकले, वे पुष्प वर्षा करें। मैं बहुत खुश हुआ था, पर मेरी जिह्ना पर ही भागवत थी, भीतर तो मुद्रा संग्रह जमा होता गया था। तो क्या बाबा सब जानते हैं?‘मैं कौन हूंँ, मात्र एक श्वान या इससे कुछ अधिक, बाबा ने मुझ पर यह कृपा क्यों की है? क्या मैं उनका शिष्य हूं, बाबा कहा करते थे। जो गुरु-चेले बनाते हैं, वो गुरु नहीं होते। गुरु तो वह है जो चुपचाप कब शिष्य के भीतर उतर जाता है। उतनी सरलता से उसके चित्त की सीढ़ियां उतरता है कि उसे उसके आने की आहट भी नहीं मिलती। मैं मनुष्य होता तो कुछ कह पाता। पर मैं तो श्वान था।’&lt;br /&gt;रातभर मैं सो नहीं पाया था।&lt;br /&gt;अर्ध रात्रि को ही नींद खुली, पाया, बाबा मेरे ही पास खड़े हैं। उन्होंने मेरे माथे पर हाथ फिराया, वह प्रेम मेरे भीतर तक उतर गया। मैं चुपचाप उठा। और मंदिर की तरफ चल दिया।&lt;br /&gt;मंदिर के चारों तरफ सैनिक थे, पर दूरी पर थे। मैं अंधेरे में पेड़ों के पास से निकलता हुआ, मंदिर की डोली तक गया, वहांँ से कूदकर सीधा अंदर चला गया। वहाँं कोई नहीं था। मैं दूर कोने में जहां प्रकाश कम था जाकर बैठ गया।&lt;br /&gt;तभी राजा वहांँ आए। उनके साथ कोई नहीं था। पुजारी भी बाहर जा चुका था। चारों ओर दीपकों का प्रकाश था। राजा ने अपने अंगवस्त्र उतार दिए। शस्त्र कोई वहाँं नहीं था। एक हल्के से अधोवस्त्र के साथ वह देवी की प्रतिमा के सामने बैठा था। शांत, उसके होटों पर न जाने कितनी प्रार्थनाएंँ निकल रही थीं। वह आर्त्त-धीमी श्वास के साथ, मांँ, माँं, माँं पुकार रहा था। लग रहा था मानो उसकी देह एक रुई कातने वाले धुनिए की तरह हो गई हो, शब्द व प्राण मानो एक गति में डूब गए हो। राजा अचानक शांत, होता, होता मूर्छित हो गया हो। &lt;br /&gt;वहाँं देखा,&lt;br /&gt;देवी प्रतिमा अदृश्य हो चुकी थी, एक तीव्र प्रकाश, स्व- प्रकाशित होकर पूरे गर्भ कक्ष में फैल गया था, चारों ओर प्रकाश था, मुझे याद है मैं जब शास्त्री था, हृदय में प्रकाश की कल्पना कर ध्यान लगाता था, लोगों को ध्यान सिखाता था। मेरी बड़ी पूजा होती थी। मैं ध्यान-गुरु था। पर जानता था, भीतर अंधकार है, गहन अंधकार।&lt;br /&gt;... वहां सचमुच प्रकाश था। इन्हीं आंखों ने देखा था, स्वप्न नहीं था, मैं आंखे बंद करके भी देखता था, आंँखे खोलकर भी, अचानक एक तेजी ध्वनि सुनाई पड़ी। नाद.. ब्रह्मनाद। प्रकृति, आद्या शक्ति का स्वरूप, मात्र गति है। उसकी गति से ही हम पैदा होते है। नाश होते हैं। कुम्हार के चाक की तरह बर्तन बनते हैं, टूटते हैं। मिट्टी वही रहती है, जहांँ गति है, वहाँं प्रकाश है, जहांँ प्रकाश है, वहीं नाद है।&lt;br /&gt;तभी अचानक लगा कोई कूदा है।&lt;br /&gt;एक आहट भी हुई।&lt;br /&gt;वही युवक सामने था, उसके हाथ में नंगी तलवार थी।&lt;br /&gt;वह ”विजन“ जा चुका था।&lt;br /&gt;राजा अभी भी मूर्छित अवस्था में था।&lt;br /&gt;‘राजा, आंँखे खोल, तेरा काल तेरे सामने है?“तेज आवाज गूँज गई।&lt;br /&gt;राजा ने चेहरा ऊपर उठाया, सामने वह युवक नंगी तलवार लिए सामने था।&lt;br /&gt;‘मैं निद्रा में किसी का वध नहीं करता, वह बोला।सम्हाल सकता है, तो अपने को संभाल।“&lt;br /&gt;‘क्या चाहिए तुझे, राज्य लेले, मेरा शरीर लेले,“ राजा ने कहा।&lt;br /&gt;वह युवक ठिठका।&lt;br /&gt;राजा की निगाह अचानक उसकी दोनों भुजाओं पर गई।&lt;br /&gt;‘ला, मार मुझे बेटे, बाबा ने सही कहा था, प्राण जाने से पहले पुत्र का मुख देख लेगा, मार बेटे मार।“&lt;br /&gt;‘बेटा!“ वह चौंका।&lt;br /&gt;‘हाँं, यह ले, राजा ने अपने उत्तरीय को हटाया।“ उसकी दोनों भुजाओं पर वही निशान गुदे थे, जो उस युवक की भुजाओं पर थे। यह हमारी राज मुद्रा है। परंपरागत है। जब तेरी पहली वर्षगांठ थी, तब यह मुद्रा लगाई गई थी। पर दूसरी वर्षगांठ के समारोह पर वह दस्यु तुझे उठाकर ले गया। तब से ये आंँखे, तुझे देखने को पथरा गई हैं। आ, एक बार गले से लगजा, बस, यह ले, उसने उसकी तलवार की धार पर अपनी बांँयी हथेली को रखा तथा खून की धार से दायंे हाथ के अंगूठे से उसके माथे पर तिलक कर दिया। जा घर जा, यह तलवार फैंक दे, वह राजा की तलवार है, उठा, जा तेरी मांँ भी तेरी प्रतीक्षा में है।’&lt;br /&gt;वह युवक अवाक था। संशय अभी भी उसके चेहरे पर था। तो जिस बूढ़े ने उसे पाला पोसा वह दस्यु है। वह उसे ही उसके पिता की हत्या के लिए तैयार कर अपना बदला ले रहा था, अचानक विचारणा का तेज प्रवाह उसके भीतर उठने लगा था।&lt;br /&gt;‘‘क्या सोच रहा बेटा, बाबा ने कहा था- कभी अतीत में झांकने का तथा भविष्य को जानने का प्रयास मत करना, सब भूल जा।“&lt;br /&gt;‘पर आप कहांँ जा रहे हैं?“&lt;br /&gt;‘वहीं संत सोमगिरी के पास, जो मिला है, वह बहुमूल्य है, अब वही मेरा रास्ता है। मेरे जीवन का एक अध्याय तो आज पूरा हो चुका है।“&lt;br /&gt;तब तक मैंने भी अपने पाँंवों को सीधा किया, उस आहट से दोनों चौंके।&lt;br /&gt;मैं तेजी से बाहर दौड़ा।&lt;br /&gt;‘यह कुत्ता, यहांँ ,“ एक साथ दोनों की आवाज मैंने सुनी थी। पर मैं पीछे नहीं मुड़ा। मैं बाबा के पास जाने को दौड़ रहा था...&lt;br /&gt;बस एक ही बात मेरे भीतर तेजी से घूम रही थी कि क्या यहांँ हर चीज तयशुदा है पूर्व निर्धारित है, बस हमें एक मुसाफिर की तरह एक जगह से दूसरी जगह पर जाना होता है, हमारा रंग, रूप, शरीर सब गौण है, हम अपनी जिस योग्यता को लेकर पुलकित होते हैं, अपना ढिंढोरा पीटते हैं, उसकी कोई कीमत नहीं है।&amp;nbsp; क्या यहांँ यात्रा ही महत्वपूर्ण है?&lt;br /&gt;याद आया, अर्थी उठते समय मैंने सुना था, ‘सत्य ही गति है।’ गति ही परमात्मा की सूचना है। वही उसका शरीर है।&lt;br /&gt;अचानक रास्ते में जाते हुए किसी यात्री से टकराया, उसने डंडा उठाकर मारा। दर्द तो हुआ, पर विचार शृंखला ने उधर देखने ही नहीं दिया।&lt;br /&gt;क्या बाबा को पता था, आज वे मुझे वह दिखा देंगे, जो मेरेे भीतर संस्कार में पड़ा था।&lt;br /&gt;क्या बाबा और संत सोमगिरी को इसका पूर्वाभास था?&lt;br /&gt;मुझे मेरे सवाल का उत्तर मिल गया था। मनुष्य जिस सवाल का उत्तर धरती पर अपने आने के साथ तलाश कर रहा है, उसका हल उसे स्वयं ही ढूंढ़ना है। न तो कोई गुरु, न कोई ग्रन्थ, न कोई पंथ उसकी शंका का, संशय का समाधान कर सकता है। न वह दूसरे के उत्तर से संतुष्ट हो सकता है।&lt;br /&gt;मुझे उत्तर मिल गया था, उत्तर यही था, कि मनुष्य को अपनी खोज निरंतर जारी रखनी है, यही उसके जीवन का उद्देश्य है।&lt;br /&gt;‘फिर?’ अचानक गिलहरी ने पूछा।&lt;br /&gt;‘फिर क्या, तुम कहोगे ईश्वर नहीं है, मैं कहूंगा, ‘है,’ विवाद का अंत नहीं है। मैं कहूंँ वह है, मैं नहीं कह सकता, मैं कहँूं वह नहीं है, यह भी मैं नहीं कह सकता। मैं अपनी बु(ि से अपनी भाषा में, ग्रन्थों के सहयोग से, उसके होने न होने के सत्य को स्थापित नहीं कर सकता।’&lt;br /&gt;‘‘मेरा उत्तर&amp;nbsp; यही है, यह मेरा अनुभव नहीं है, मैं नहीं जानता।’’&lt;br /&gt;‘तुम कहना चाहो, वह नहीं है, यह मैं कैसे कह सकता हूं, मैं असत्य नहीं बोलता।सत्य और असत्य के बीच का निर्धारण कैसे हो? कहना कठिन है। संत सोमगिरी ने कहा था, बस मौन, वे कहते हैं, सवाल ही व्यर्थ है। इसका उत्तर तुम पता करो। यह पूछे जाना वाला सवाल ही नहीं है। यह तो तुम्हारी खोज है।’&lt;br /&gt;‘पर जो तुमने अभी कहा है, वह सत्य है?“ गिलहरी ने टोका।&lt;br /&gt;‘सच, जो भाषा में कहा गया है, वह उतना ही सच है, जितने शब्द हैं, पर जहाँं अनुभव है, ‘सच’ का प्रवेश नहीं होता है, पर वहांँ शब्दों को प्रवेश नहीं मिलता,&amp;nbsp; वह शब्दों की सीमा से परे है, बहिन, यही दुःख है।“&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-8712558125246030976?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/8712558125246030976/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=8712558125246030976&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/8712558125246030976'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/8712558125246030976'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2010/07/blog-post_24.html' title='मैत्रेयी'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-8889525820788047226</id><published>2010-07-19T20:41:00.000+05:30</published><updated>2010-07-19T20:41:50.088+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपन्‍यास'/><title type='text'>मैृेयी</title><content type='html'>यह कहानी उस गाँंव की है, जहाँं नदी धीरे-धीरे सूखती चली गई थी। गांँव के लोग धीरे-धीरे शहर की ओर जाना चाह रहे थे। नदी ही तो उनका जीवन था।&lt;br /&gt;रात मामू गधे ने हरी घास की जगह सूखी घास पर मुंह को बार-बाहर हटाते सोचा,... यही रहा तो फिर मौत ही साथ देगी,... &lt;br /&gt;...मीरा गाय चुप थी,... जानती थी,... उसका मालिक रमेश रोजाना यही सोचता है कि उसको जंगल में छोड़कर चुपचाप शहर चला जाए। पेड़ भी उदास थे,... लोगों के धीरे धीरे जाने से रसोई से उठता धँुंआ कम होता जा रहा था,... हरजू कौआ जो पहले अच्छे स्वास्थ्य का धनी था, वह भी धीरे धीरे कमजोर होता जा रहा था,... सूखती नदी का दर्द सबका अपना था।&lt;br /&gt;पर बाहर कालूू कुत्ता चुपचाप धूप में लेटा हुआ था।&lt;br /&gt;हल्की सी गर्मी आ गई थी। फागुन कभी का जा चुका था। चैत्र के आने के साथ ही मौसम बदलने लगता है, पर कालू को पता नहीं क्यों, और कुत्तों की अपेक्षा हल्की गर्मी ही अधिक अच्छी लगती थी।&lt;br /&gt;‘यहांँ से जब सब चले जाएंगे ,हम कहाँं रहेंगे’, लंबू बगुले ने पूछा।&lt;br /&gt;‘यहीं।“&lt;br /&gt;‘पर करेंगे क्या?“&lt;br /&gt;‘जो अब तक करते रहे हैं।“&lt;br /&gt;‘अभी तो हम दूसरों के सहारे&amp;nbsp; रह रहे हैं। बंगाली के यहांँ मछली बनती थी, ..... वह पोखर में मछली पालते हैं, ..... वहीं से मैं भी कुछ ले आता था, ..... पर अब!“&lt;br /&gt;‘हॉं, क्या मछली के बिना तुम नहीं रह सकते?“&lt;br /&gt;बगुला चुप था। फिर बोला,...” तुम भी तो हड्डी के बिना नहीं रह सकते।“&lt;br /&gt;‘मैं यही सोच रहा हूं। इसीलिए धूप खा रहा हूंँ।“&lt;br /&gt;‘धूप’&lt;br /&gt;‘हाँं, ..... परेशानी हो, ..... तब दिमाग चलता है, ..... जाना भागना कहांँ तक भागोगे,“ वह बोला।&lt;br /&gt;‘हाँ, तुम भी तो उस साधु के साथ यहांँ आए थे।“&lt;br /&gt;‘हाँं, वह भी घर से भागा था,... उसकी पत्नी थी,... बेटा था,...बोला संसार में दुख है। उसका मकान था,... बड़ा घर था। पिता ने पूछा- ‘बेटा यहांँ क्या कष्ट है।“&lt;br /&gt;बोला,” दुख है,... जीवन दुखमय है,... मृत्यु द्वार है, बुढ़ापा दुख है, सारा संसार दुख की खोज में भटक रहा है,... सुख तो दुख से मुक्ति में है, वह है, त्याग,... संसार की तृष्णा ही दुख है। ... भागो,“... वह घर छोड़ गया था, मैं भी उसके साथ चल पड़ा।“&lt;br /&gt;‘फिर?“&lt;br /&gt;‘हम यहाँं तक साथ आए।’&lt;br /&gt;रास्ते में यह बरगद मिला था,पहले यह भी युवा था, अब बूढ़ा हो चला है।इसकी जटाएँ नीचे आने लगी हैं,&amp;nbsp; वह बोला,” तुम इनके साथ कहाँं तक जाओगे?“&lt;br /&gt;‘पता है, महाभारत के बाद, तुम ही तो युधिष्टिर के साथ स्वर्ग जाने को गए थे, उसके सारे परिजन एक के बाद हिमालय की वादियों में गिरते चले गए,... पर तुम साथ रहे,... तुम तो सशरीर साथ गए थे,... फिर तुम क्यों भटक रहे हो?“&lt;br /&gt;मैंने उसकी बात को सुना, ... उस साधु की ओर देखा, ... उसके साथ फिर हजारों लोगों की भीड़ लग गई थी, ... वह सभी को इस संसार के दुख से दूर जाने की सलाह दे रहा था। कहता था तृष्णा ही दुःख है, यह संसार मात्र दुःख है।“&lt;br /&gt;उस दिन वह अकेला था। उसके शिष्य दूर नदी किनारे पर रुक गए थे।&lt;br /&gt;यहीं इस नदी के किनारे वह रुका था।&lt;br /&gt;मैंने पूछा था- ‘हम कब तक भटकते रहेंगे?“&lt;br /&gt;वह चाैंक गया था- उसने इधर उधर देखा, वहाँं कोई इन्सान नहीं था।&lt;br /&gt;तब मैंने फिर सिर ऊपर उठाया, बोला- ‘यह मैं हूं,मैं, तुम्हारे साथ हिमालय पर भी गया था।तुम्हारे साथ सदियों से चल रहा हूंँ। हम कब तक चलते रहेंगे?“&lt;br /&gt;... क्या कभी कोई मुकाम आएगा? जब रुकेंगे, ...हम चलते हैं, चल रहे हैं, पर पीछे मुड़कर नहीं देखते, जिस गांँव को छोड़कर आते हैं वह पहले से बदतर तो नहीं होगया।हम सोचकर चलते हैं,हम दुनिया ठीक करने आए हैं,&amp;nbsp; वह हमारे आने के बाद पुनः वैसी ही हो जाती है, हांँ जो काम करने वाले थे, ... युवा थे, वे हमारे साथ चले आते हैं।हम उन्हें उनके काम से भी हटा देते हैं। हम उन्हें एक नया सपना सोंपते हैं,पर कभी सोचा है,यह पहले से भी अधिक घटिया है हम उन्हें कहांँ ले जा रहे हैं, ... क्या यह दुनिया बस एक सपना हैै?’’ उसने बहुत प्यार से मुझे देखा।&lt;br /&gt;‘तुम तभी सदियों से मेरे साथ चल रहे हो।’&lt;br /&gt;हाँ, मेरे सवाल कभी खत्म होने वाले नहीं हैं,,लगता है मेरे माथे पर आग सी जल उठी है।पर मैं केश मुंँड़ाने वाला नहीं हूँ।“मेंने कहा था।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;”मेरा काम बस चलना ही है, ... तुम्हें तुम्हारा काम तलाश करना होगा। तुम्हारा रास्ता अब मुझसे अलग है, यहांँ तक मेरे साथ चले, अब शुक्रिया।“,&lt;br /&gt;”तुम्हारा रास्ता तुम खुद तलाश करो, क्या चाहते हो?..’ वह वहाँं से उठते हुए बोला था।&lt;br /&gt;‘पर मेरे सवाल का उत्तर?“&lt;br /&gt;‘एक दिन यह नदी भी सूख जाएगी, ... तो इन्सान यहाँ से भी भागेंगे।, ... तब तुम्हे खुद पता लगेगा, ... तुम्हारा उत्तर क्या है?“&lt;br /&gt;‘और तुम?“&lt;br /&gt;‘ जब तक नदियाँं हैं, पानी है, ... तब तक जीवन है, जब तक जीवन है, तभी तक सुख-दुख का संघर्ष है, जिसके&amp;nbsp; पास नहीं है,&amp;nbsp; वह दुखी है, उसके पास वह सब क्योंनहीं है, जो सबके पास है, वह भी दुखी है, जिसके पास है, कोई लूट न ले जाए, ... वह भी दुखी है।जब तक दुख है, नदी है, जल है, जीवन है, मैं भी रहूंगा।“&lt;br /&gt;“हाँं, जब नदी सूखेगी, ... तब तुम सुनोगे, धरती की आवाज, सूखी सीपियों का गान, तप्त घाटी, गरम रेत, हवा जब सन्नाटे को तोड़कर हंँसेगी, ...उस विवशता&amp;nbsp; में, ... तब तुम जगोगे,“ ... वह बोला। &lt;br /&gt;‘और तुम!“&lt;br /&gt;‘मैं&amp;nbsp; तुमसे मिलने अवश्य आऊॅगा,“ वह बोला।”शायद मुझे भी मेरे सवालों का उत्तर मिल जाए।“&lt;br /&gt;कालू कुत्ता, धूप के कतरे की तरफ जो अब पेड़ के सहारे से उधर जमीन पर उतर गया था, उधर जाकर लेट गया।&lt;br /&gt;‘तुम्हारी उमर तो इतनी नहीं है, “लंबू बगुले से बोले रहा नहीं गया।&lt;br /&gt;‘हाँं, भाई, वो देखो,... उधर बंगाली के मकान के पास सूखी मछली पड़ी है, शायद तुम्हारा अच्छा लंच हो जाए।“&lt;br /&gt;‘ओह!“ लंबू उधर लपका।&lt;br /&gt;कालूू की आंँखे भर आई ंथीं। सब भाग रहे हैं, जहांँ पानी है, वे भी भाग रहे हैं, जहाँं सूखा है, वे भी भाग रहे हैं, उसे याद आया,... जब स्वर्ग का विमान आया था,... सब चढ़ने लगे, तब वह चुपचाप नीचे उतर आया।&lt;br /&gt;‘क्यों? तुम नहीं जाओगे,“ पूछा गया था।&lt;br /&gt;‘हाँं,में&amp;nbsp; इन्सान के साथ में जन्मा हँूं, उसे छोड़कर मैं कहीं नहीं&amp;nbsp; जा सकता ,वही तो मेरे साथ धरती पर आया है।...&lt;br /&gt;‘तुम तो महान हो गए हो,“चालक बोला था।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;”पर जो लोग यहीं रहेंगे, जिनको न स्वर्ग चाहिए न नर्क.... उनके साथ कौन रहेगा?“ वह बोला था।&lt;br /&gt;”तुम्हारे साथ यहाँ कौन रहेगा&lt;br /&gt;”धरती ,जल, आग,वायु और आकाश,“वह नीचे उतर आया था।&lt;br /&gt;उस साधु के साथ भी वह नहीं चल पाया,... कहांँ तक दौड़ता, यह कैसी दौड़ है,यहाँ दौड़ना ही धर्म है। जो रुक गया वहीं मौत की आहट सुनाई देती है। क्या मौत ही जीवन का अन्तिम लक्ष्य है, वह दार्शनिक होने लग गया था। याद आई वह गिलहरी उसका बच्चा चल नहीं पा रहा था,उसकी टाँंग में तकलीफ थी,कुछ बदसूरत भी था। पर उसकी माँ की आँंखें उसे जिस सुंदरता से निहार रहीं थीं ,&amp;nbsp;&amp;nbsp; वही तो धरती का रस है, जो जन्म देता है,ठहराता है, सुबह से शाम, शाम से सुबह गति देता है,... शायद यही तो जीवन है।याद आया घर से निकलते समय पिता ने कहा था ,अपनी धरती कैसी भी हो, रहना तो यहीं है, अपनी गली में चाहे दुम हिलाओ, या भोंको, जो आजादी यहां है, वह और कहाँं है? वह आंखें मूंँदे चुपचाप लेटा था,... मौन ,कोई विचार वहांँ नहीं था,... दूर बगुले की सूखी मछली को उलटने-पुलटने की आवाजंे आ रहीं थीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-8889525820788047226?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/8889525820788047226/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=8889525820788047226&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/8889525820788047226'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/8889525820788047226'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='मैृेयी'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-2263014819811921326</id><published>2010-05-26T08:35:00.002+05:30</published><updated>2010-05-26T08:35:41.115+05:30</updated><title type='text'>सब्जियों का राजा</title><content type='html'>&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; सब्जियों का राजा&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; नरेन्द्र नाथ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृषि विभाग की बैठक में&amp;nbsp; दिन यह तय होगया था कि आलू ही सब्जियों का राजा है।जनाब मुसद्दीपा.1च साल पहले भी शासन के चहेते थे।वे ही मुख्य सदर के सलाहकार रहे थे।वे गए , नया शासन आया।जनाब मुसद्दी उनके भी खासमखस हो गए।पाँच साल खास सिपहसालार रहे।उनका भी तक्ष्त पलट गया। ऊपर वाले की महर या जाने वालों की अकड़&amp;nbsp; जो कल चले गए थे ,वे वापिस लौट आए।जनाब मुसद्दी का रुतबा फिर उनके खासमखस होकर लौट आए।&lt;br /&gt;इसी बात पर चर्चा थी , चर्चा क्या सेमीनार ही होगई।&lt;br /&gt;कृषि विभाग के आला अफसर मौजूद थे।&lt;br /&gt;एक बोले”, भिंडी लोकप्रिय है ,पर वह अकेली- अकेली ही चलती है। कभी- कभी प्याज भिंउी भी बन जाती है। परन्तु स्वाद दोनों का रहता है। उसके साथ कोई दूसरा नहीं चल सकता है।“&lt;br /&gt;”जैसे आप!“कौने से सक्सेना जी चहके।&lt;br /&gt;” हाँ, यह आप ही कह सकते हैं।साल में तीन तबादले आपके ही हुए हैं।मीणाजी ने तो आपको आते ही लपका दिया था।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”और आपको!“&lt;br /&gt;”आप मेरी बात छोड़िए,“शर्मा जी बोले।हाँ ,आप टिंडे की बात कर सकते हैं।&lt;br /&gt;”टिंडा!“सब हँसे।&lt;br /&gt;परन्तु उधर चंपावत का चेहरा तन गया था।&lt;br /&gt;”क्यों जले पर नमक छिड़कते हो?“वर्मा जी ने टोका।”पर यह सचहै, टिंडे के साथ कोई चल नहीं सकता, टिंडा,...टिंडा&lt;br /&gt;&amp;nbsp;ही रहता है।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”पर हमारे चंपावत जी टिंडे नहीं हैं।उनकी अपनी पहचान है। सब उनसे जलते हैं।वे तो मंत्री जी के चहेते हैं।“&lt;br /&gt;”फिर अरबी ने आपका क्या बिगाड़ा है? सक्सेना जी ने टोका।&lt;br /&gt;तभी छाया जी उठकर कक्ष से बाहर चलदीं।&lt;br /&gt;”अरे! मेडम आप काँ चलीं?“&lt;br /&gt;”मुझे जरूरी काम है , “वे बोलीं।वे जानती थीं बात उन पर ही आकर रुकने वाली है।&lt;br /&gt;”पर ये तो पहले अरबी थीं , अब तो भर गई हैं,“पीछे से कोई फुसफुसाया।&lt;br /&gt;”देखिए आप विषयान्तर नहीं करें।यहाँ आज चर्चा आलू पर ही हेंआप विषय तक ही अपने आपको सीमित रखें,“शर्मा जी ने छाया जी की ओर देखते हुए कहा।&lt;br /&gt;वे बैठ गईं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चर्चा शुरु हो गई थी।&lt;br /&gt;”सर! आलू ,पत्ता गोभी के साथ&amp;nbsp; भी चलता हैंउससे स्वाद में भी बढ़ोतरी आ जाती है।“&lt;br /&gt;”फूल गोभी के साथ, वाह क्या स्वाद देता है।“&lt;br /&gt;”अजी, बैंगन के साथ!“&lt;br /&gt;”और टमाटर के साथ!“&lt;br /&gt;”और पालक के साथ!“&lt;br /&gt;”अजी, मैथी के साथ भी।“&lt;br /&gt;आलू का अपना स्वाद भी है।भरवाँ आलू, छोटे आलू, दम आलू,रसे के आलू, सूखे आलू,दही के आलू,आलू का अचार, आलू का हलुआ,वाह!वाह!&lt;br /&gt;सेमीनार में आलू छा गया था। &lt;br /&gt;”तो हमारा बॉस कैसा हो!“&lt;br /&gt;”लाल मिर्च जैसा हो“, पीछे से आवाज आई।&lt;br /&gt;”पानी मांगते फिरोगे “, पीछे से कोई बोला।&lt;br /&gt;”तो हमारा बॉस कैसा हो!“&lt;br /&gt;”बड़े मुसद्दी जैसा हो।“&lt;br /&gt;”जैसा हो ,कैसा हो , पर पूरा आलू जैसा हो।“&lt;br /&gt;शर्माजी ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा,” आलू का अपना स्वाद भी है, वह जिसके साथ रहता है,उसका स्वाद भी बढ़ा देता है।“&lt;br /&gt;”जैसे हमारे बड़े मुसद्दी हैं, बाबुओं के राजा, अफसरों के राजा, सबकी पसन्द:राजा पसन्द, आलू राजा।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;” पर मेडम तो&amp;nbsp; हम सबसे नाराज हैं,&amp;nbsp; नागौर की पंचायत में कह गईं, विकास कार्यक्रम में अफसर शाही रोड़ा है। इस पर विचार करें।“&lt;br /&gt;” ”पर यह भी सही है, कि रोड़ा कटहल है,..बैंगन है, कद्दू है,&amp;nbsp; तोरई है, बहुत लोग हैं, जो अपने स्वाद को लेकर अहंकारी बने रहते हैं।“&lt;br /&gt;”आलू नहीं, आलू कभी भी नहीं।“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;”आज हमारा नारा है,&lt;br /&gt;आलू जनतंत्र को प्यारा है।&lt;br /&gt;”&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-2263014819811921326?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/2263014819811921326/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=2263014819811921326&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/2263014819811921326'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/2263014819811921326'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='सब्जियों का राजा'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-3630645993492979188</id><published>2009-12-27T20:58:00.000+05:30</published><updated>2009-12-27T20:58:53.956+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>1&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; प्याज़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्याज,&lt;br /&gt;छिलके उतरने की सहती व्यथा, रोज-रोज&lt;br /&gt;उतरते-उतरते &lt;br /&gt;रहता है क्या&lt;br /&gt;ब्रह्म ज्ञानी कहता, ‘वह महाशून्य था’।&lt;br /&gt;... बस एक खाली सा&lt;br /&gt;वर्ण, जाति, संप्रदाय की नीली काली परतें&lt;br /&gt;रोज़-रोज़ उतरती&lt;br /&gt;आहत बु(िजीवी बाहर की कालिमा&lt;br /&gt;लीक-लीक उकेरता&lt;br /&gt;परत दर परत, उतारता, छीलता&lt;br /&gt;हंसता, बतियाता,&lt;br /&gt;पूछता जाता,&lt;br /&gt;इतिहास है कहां, यह तो बस जोड़ है...&lt;br /&gt;मात्र खाली परतों का,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास बस उनका &lt;br /&gt;जो जमीन, औरत और धन लिप्सा में &lt;br /&gt;मरगए&lt;br /&gt;मारे गए &lt;br /&gt;उनका पुजारी लिखता अमर काव्य&lt;br /&gt;&amp;nbsp;इतिहास बस&amp;nbsp; उनका &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्याज का कहाँ&lt;br /&gt;जंगली भी होती है&lt;br /&gt;गरीब की थाली में ताकत बन रहती हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देती गुलाबीपन&lt;br /&gt;स्वाद भी कसैला&lt;br /&gt;बेहद सस्ती यह&lt;br /&gt;पड़ी रहती सड़क पर&lt;br /&gt;देश की जनता सी,&lt;br /&gt;रोज-रोज छिलने को&lt;br /&gt;परत- दर- परत छिल, &lt;br /&gt;यूं ही मर मिटने को,&lt;br /&gt;क्योंकि वह&amp;nbsp; है आम,&lt;br /&gt;इतिहास&amp;nbsp; वह नहीें है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जबकि रस इसका ही&lt;br /&gt;मीठे शहद से मिल&lt;br /&gt;होता&lt;br /&gt;जनतंत्र का खजाना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी बाजारी ने &lt;br /&gt;उसके तरफदारों ने &lt;br /&gt;शहद को उठाकर दूर&lt;br /&gt;&amp;nbsp;प्याज से रख छोड़ा है,&lt;br /&gt;चर्चाकर प्याज की&lt;br /&gt;न जाने क्यों&amp;nbsp; वह दूर रहता&amp;nbsp; प्याज से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस एक बार, &lt;br /&gt;दोनो अलग मिल सकें&lt;br /&gt;आकर पास बतियाएं&lt;br /&gt;कुछ- कुछ कह पाएं&lt;br /&gt;कुछ-कुछ सुन पाएँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रास्ता जो छूटा है&lt;br /&gt;फिर मिल सकता हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने को बहुत था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने को बहुत था&lt;br /&gt;बहुत कुछ कहा गया&lt;br /&gt;पर सुना कहां किसने&lt;br /&gt;कान पर&lt;br /&gt;न ठक्कन था&lt;br /&gt;न आंख पर&lt;br /&gt;पर्दा था,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर भीतर का सुआ&lt;br /&gt;अपनी ही धुन पर&lt;br /&gt;मंत्र-मुग्ध नचता&lt;br /&gt;खुद को ही सुनता&lt;br /&gt;देखता भी खुद को,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर का कोलाहल&lt;br /&gt;चीख, आहत, आत्र्तनाद&lt;br /&gt;माया, पाषाण वत&lt;br /&gt;संवेदना मरी-मरी&lt;br /&gt;रस लोलुप जीभ &lt;br /&gt;हड्डी चूसते श्वान- सी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी ही आत्मा&lt;br /&gt;&amp;nbsp;शिला सी अहल्या रख&lt;br /&gt;स्वार्थ रस चाटती&lt;br /&gt;आनंदोत्सव झूमती&lt;br /&gt;सुनने से दूर वह&lt;br /&gt;न देखने की चाह लिए&lt;br /&gt;अपनी ही ढपली पर अपना ही राग।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंधेरा इतना &lt;br /&gt;सूझता नहीं था कुछ&lt;br /&gt;कभी-कभी खुद की ही &lt;br /&gt;&amp;nbsp;उठती चीख भी&lt;br /&gt;सुन नही पाता&lt;br /&gt;खेत से खलिहान से&lt;br /&gt;झोंपड़ पट्टी से&lt;br /&gt;मैले, कुचले पशुवत जीवित मनु संतान की,&lt;br /&gt;कविता ,कहानी में रचना तलाशता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर, चुप-चुप&lt;br /&gt;स्वार्थ, नाभि- नालि युक्त&lt;br /&gt;न सुनता&lt;br /&gt;न देखता&lt;br /&gt;जो भी सुन रहा था&lt;br /&gt;उसके कानों में सीसा ढोलता&lt;br /&gt;फोड़ता आंख&lt;br /&gt;शब्दों को छीनता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो न सुनता&lt;br /&gt;न देखता,न कुछ करता&lt;br /&gt;बड़बोला, अपनी ही त्वचा पर,&lt;br /&gt;चिपटा परजीवी, वह।&lt;br /&gt;”देख-देख सही तो देख &lt;br /&gt;कह-कह सही तो कह,“&lt;br /&gt;सबको समझाता&lt;br /&gt;उसकी पहचान.....&lt;br /&gt;‘हवा दरख्तों को बताती है&lt;br /&gt;फिर भी न जाने क्यों&lt;br /&gt;..वक्त भी . खामोश है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो न कुछ करता है,बस सुनकर चुप रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; कविता वह-3&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता न खाद होती है, न बीज&lt;br /&gt;न दवा&lt;br /&gt;जो बीमारी को मार देती है,&lt;br /&gt;वह, वह जमीन है&lt;br /&gt;ताप, नमी पाकर&lt;br /&gt;बीज,&lt;br /&gt;दरख्त में बदल देती है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरख्त का दरख्त होना जरूरी है&lt;br /&gt;वह फलदार हो या नहीं&lt;br /&gt;चाहे वह श्मशान में लकड़ी बन जले&lt;br /&gt;या अंगीठी में कोयला बन दहके&lt;br /&gt;या किंवाड़ में लग जाए&lt;br /&gt;या किसी खूबसूरत मेज के पांवों में ठहर जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता दरख्त जनती है&lt;br /&gt;कभी मशाल बन दहकती है&lt;br /&gt;लपट उसका शृंगार है&lt;br /&gt;उसके जिस्म पर फलती है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वक्त बार-बार कहता है&lt;br /&gt;लिखो, और और लिखो&lt;br /&gt;दरख्त मशाल बन जल जाएं&lt;br /&gt;अंधेरा यह नियाॅन लाइट से कम होगा नहीं&lt;br /&gt;‘पावर कट’ का जमाना है&lt;br /&gt;दहकना मशालों को है&lt;br /&gt;अंधेरा उन्हें, दहक, खिसकता जरूर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; उन सबके लिए-4&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन सबके लिए &lt;br /&gt;जो ट्रेन के डिब्बे में जलकर राख हो गए&lt;br /&gt;या बेकरी में बिस्कुट बन सिक गए&lt;br /&gt;कहता वकील था-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आग अपने आप लगी&lt;br /&gt;उन्हें मरने का शौक था&lt;br /&gt;‘सती प्रथा प्रशंसक वे&lt;br /&gt;साथ ‘राम’ सता हुए&lt;br /&gt;या सुपुर्दे खाक हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे थे खामोश&lt;br /&gt;घर की रोजी-रोटी की फिक्र में लगे थे&lt;br /&gt;जो बेकरी में&lt;br /&gt;या खेत या खलिहान में&lt;br /&gt;जिन्दा रहने का मंत्र पूछते थे&lt;br /&gt;अनायास यूं ही&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौत जो मुंडेर पर बैठी, चील की तरह आई थी&lt;br /&gt;राम की यादों में&lt;br /&gt;अभिशप्त सीता सी&lt;br /&gt;चुपचाप धरती समा गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका क्या कफन की दुकान पर डेरा जो डाले हैं&lt;br /&gt;कहीं सीढ़ी&lt;br /&gt;कहीं पंडित&lt;br /&gt;कहीं काॅफीन&lt;br /&gt;कहीं काजी&lt;br /&gt;सब मुहैया करा देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोते हैं, हंसते हैं&lt;br /&gt;साथ-साथ रहते हैं&lt;br /&gt;लड़ते हैं जैसे हड्डी पर कभी-कभी&lt;br /&gt;दतात्रेय सहचर&lt;br /&gt;शांति पाठ पढ़ते हों&lt;br /&gt;सभा या संसद हो&lt;br /&gt;आंसू कहां आँख में&lt;br /&gt;टेंकर में जल ‘साबरमती छोड़ आए हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे जो मरते हैं&lt;br /&gt;तिल-तिल कर जलते हैं&lt;br /&gt;भूख, गरीबी, जलालत की आग में&lt;br /&gt;नम होती आँखों का&lt;br /&gt;काश अनकहा सुन जाएं&lt;br /&gt;हाथों में खंजर नहीं&lt;br /&gt;बंदूक तलवार नहीं&lt;br /&gt;खुशबू सी रेखाएं साथ लिए हथेली पर&lt;br /&gt;दूसरी हथेली रख&lt;br /&gt;एक गीत प्यार भरा&lt;br /&gt;यहां-वहां छोड़ आएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; कभी-कभी वे-5&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी-कभी वे दिख जाते थे&lt;br /&gt;आते-जाते&lt;br /&gt;पत्नी संग कभी न चलते&lt;br /&gt;आगे वे &lt;br /&gt;पीछे वे&lt;br /&gt;चलते जाते, .. खोये-खोये से,&lt;br /&gt;अपने से ही बतियाते,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी पार्क में घूमा करते&lt;br /&gt;‘रामदेव’ के गोल घेर में&lt;br /&gt;कुंजी स्वास्थ्य की पकड़े-पकड़े&lt;br /&gt;कभी क्वार की धूप लजाते&lt;br /&gt;सख्त-तप्त फौलाद बने से,&lt;br /&gt;नहीं बोलते&lt;br /&gt;नहीं देखते&lt;br /&gt;खोये-खाये, अपने ही से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं दिखे वे &lt;br /&gt;कई दिनों से&lt;br /&gt;बूढ़ा माली सोचा करता&lt;br /&gt;बच्चों ने शायद रोक लिया हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़ी कार है&lt;br /&gt;बड़ा सा बंगला&lt;br /&gt;उल्टा-पुल्टा नया है धंधा&lt;br /&gt;पर उनसे सहा न जाता,&lt;br /&gt;पग-पग रौनक&lt;br /&gt;रोज मना करती दीवाली&lt;br /&gt;नहीं-नहीं उनका मन ,&lt;br /&gt;वहां क्या लग सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी जो बंगले में नहीं जाते,&lt;br /&gt;अपने घर की चारदीवारी, टूटा छप्पर&lt;br /&gt;सबसे अच्छा कहते रहते,&lt;br /&gt;बड़ी कार में ठंडी पाकर&lt;br /&gt;जिनकी नस-नस खिंच जाती है&lt;br /&gt;क्या वे वहां टिक भी पाते..।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही सोचकर पेड़ उदास था&lt;br /&gt;जो कल तक उनकी बातों को चुपचाप सुना करता था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोला-&lt;br /&gt;पत्थर की तू बैंच सही है&lt;br /&gt;‘पर उनके भीतर&lt;br /&gt;कुछ-कुछ, हरा-नया मैंने पाया है&lt;br /&gt;जिनकी मुट्ठी बंद रही है&lt;br /&gt;नहीं हथेली कभी खुली थी&lt;br /&gt;कभी सामने&lt;br /&gt;जाकर स्वर्ण मुद्रा की ललचायी मिक्षा पर,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह दाता है&lt;br /&gt;नहीं झुकेगा, नहीं गिरेगा, नहीं मरेगा&lt;br /&gt;इस लुभावनी&lt;br /&gt;इन्द्रजाल की मायावी कुत्सित इच्छा पर,“&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी अचानक उसी बैंच पर &lt;br /&gt;पाया उनको&lt;br /&gt;बतियाते, हरी दूब से, और हवा से&lt;br /&gt;जीवन भर जो पाया सच है&lt;br /&gt;वह अमूल्य है&lt;br /&gt;देह नहीं शाश्वत यह सच है&lt;br /&gt;पर उसके भीतर जो जागा&lt;br /&gt;नहीं झुका जो&lt;br /&gt;अपने ही रस में डूबा वह&lt;br /&gt;&amp;nbsp;गर्वीला, ... ‘स्व’ से अभिमंडित, ... वह जीवित है,&lt;br /&gt;पिता, बरसों की टूटी इकलौती,&lt;br /&gt;बड़े पार्क की पथरायी बैन्च सा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखा उनको&lt;br /&gt;मायावी दुनिया की चकाचैंध से दूर&lt;br /&gt;मुंदी आँखों से&lt;br /&gt;नन्हें शिशु की पुनः कल्पना साथ लिए&lt;br /&gt;फिर बतियाते&lt;br /&gt;साथ वृक्षसे कभी खड़े,कभी ठिठकते, अपनी छाया से भय खाते,&lt;br /&gt;धूप, और यह घास और यह धूल सचमुच उनकी है&lt;br /&gt;तभी बैंच&lt;br /&gt;जो टूटी कब से, ... बहुतों के हाथों की चोट सम्हाले&lt;br /&gt;इंतजार में लेटी रहती, उन जैसी वह..,.&lt;br /&gt;रोज सुबह, ... और धूप कुनकुनी, ... उसकी अपनी&amp;nbsp; है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;क्यों हम....? - 6&lt;br /&gt;क्यों हम चर्चाओं में ही रहते हैं व्यस्त&lt;br /&gt;नहीं देख पाते&lt;br /&gt;अभी-अभी वह जो साथ रहा था&lt;br /&gt;चुपचाप उठा, चला गया,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बार- बार यह कहता &lt;br /&gt;कहां जाना है&lt;br /&gt;पता नहीं यह&lt;br /&gt;पर लौटेगा नहीं&lt;br /&gt;इस चादर पर ,इसी तरह फिर आकर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;‘घास’ इसी तरह &lt;br /&gt;&amp;nbsp;दबती ,कुचली यहां रहेगी&lt;br /&gt;और तुम बस&amp;nbsp; बतियाते &lt;br /&gt;बार- बार दोहराते&lt;br /&gt;सार हीन चर्चा में&lt;br /&gt;&amp;nbsp;तत्व ढूंढ़ते, ... बिना कुछ किए-धरे&amp;nbsp; सबको उलझाते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुढ़ियाती लड़की, विवाह&amp;nbsp; की सीमा रेखा लांघ,&lt;br /&gt;थर - थर मोबाइल&lt;br /&gt;रही&amp;nbsp; घूमती छत पर&lt;br /&gt;भाई उसका &lt;br /&gt;पड़ा ठूंठ बीड़ी का&lt;br /&gt;खांसता, खुडखुड़ाता&lt;br /&gt;ताश के पत्ते अंधेरे में समेटता&lt;br /&gt;‘पन्नी’ पर उठता धुंवां सोखता&lt;br /&gt;कब हुआ युवा, ... उसे पता नहीं,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर और अंधेरा&lt;br /&gt;पसरा&amp;nbsp; बैंच पर&lt;br /&gt;पुलसिए की प्रतीक्षामें&lt;br /&gt;मिट जाए भूख, ... थाने या जेल में,&lt;br /&gt;.&lt;br /&gt;... चर्चाएं गंभीर सागर सी&lt;br /&gt;पर सारा जल खारा&lt;br /&gt;बूंद- बूंद&lt;br /&gt;चाहत एक घूंट जीवन की&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी थमेगी&lt;br /&gt;शब्दों की जुगाली कभी&lt;br /&gt;कविता जब बिना सहारे पढ़ने में आ जाए&lt;br /&gt;शब्द&amp;nbsp; उगल पाएं आग&lt;br /&gt;अनकहा जो छुपा है अंधेरे में&lt;br /&gt;भभक उठे स्फुर्लिंग, ... जलते अनार सा&lt;br /&gt;कह पाए तेज रोशनी वह सब कुछ&lt;br /&gt;रंगीन इबारत के पीछे छिपा जो कबसे है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत फर्क पड़ता है-7&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे होने न होने से&lt;br /&gt;क्या फर्क पड़ता है&lt;br /&gt;वह ग़ज़ल कहा करता था&lt;br /&gt;दुकान उठ गयी&lt;br /&gt;खामोश चित्रशाला है&lt;br /&gt;कितना कहा उसने, ... पर सुना किसने पता नहीं....&lt;br /&gt;वह भी नहीं सुन पाया &lt;br /&gt;नई सदी के&lt;br /&gt;का़ि़फये की जुम्बिश को।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वक़त की ‘हाॅपनी’ चढ़ी हुयी मुद्दत से,&lt;br /&gt;न बुखार न ताप&lt;br /&gt;चुप-चुप रात के अंधेरे में&lt;br /&gt;टपकती नल की बूंद सा&lt;br /&gt;रीता जाता है जल&lt;br /&gt;अंतस के पात्र का&lt;br /&gt;खाली है, खाली है&lt;br /&gt;सदियों से खाली है&lt;br /&gt;सभी कहा करते हैं&lt;br /&gt;पंडे पुजारी&lt;br /&gt;विश्वविद्यालयी तक्षक सब...।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पढ़ता है वही सब&lt;br /&gt;सुनता है वही सब...&lt;br /&gt;जो लिखा करता है...&lt;br /&gt;... नहीं पढ़ता कभी वह&lt;br /&gt;जो ज्ञानी है, ध्यानी है&lt;br /&gt;कुंजी उपासक वह&lt;br /&gt;सुविधा की सीढ़ी चढ़&lt;br /&gt;लंबी कुल्हाड़ी लिए...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर हरी शाख पर&lt;br /&gt;पहले वार करता है।&lt;br /&gt;... कविता का सच!&lt;br /&gt;सुनो कवि जी&lt;br /&gt;हमारे तुम्हारे होने से बहुत फर्क पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जो नंगे पांव चलता है-8&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंचांग में फलित कभी झूठा नहीं होता&lt;br /&gt;सच,&lt;br /&gt;हमारी तुम्हारी मौत का दिन तय शुदा है&lt;br /&gt;न तुम बदल सकते हो&lt;br /&gt;न कोई और&lt;br /&gt;जाना कहां, कैसे जाना है, ... तय हो चुका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर बिस्तर पर पड़े-पड़े&lt;br /&gt;करवट क्यों बदलते हो&lt;br /&gt;किसकी प्रतीक्षा है&lt;br /&gt;न किसी को आना है&lt;br /&gt;न तुम्हारी बदसूरती पर उसे अफसोस करना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी की चादर है&lt;br /&gt;हमने ही बुनी थी&lt;br /&gt;हम ही उतार सकते हैं&lt;br /&gt;दुनिया का सच यही है&lt;br /&gt;इसी पर टिकी है,&lt;br /&gt;निकलना है हमको&lt;br /&gt;हम ही आ सकते हैं&lt;br /&gt;थोड़ी सी धूप &lt;br /&gt;थोड़ी सी चांदनी&lt;br /&gt;हथेली पर रखकर&lt;br /&gt;जहां भी जो रीता है&lt;br /&gt;सपनों को जोहता है&lt;br /&gt;वहां छोड़ सकते हैं,&lt;br /&gt;वह देख पाए&lt;br /&gt;अंधेरा जान पाए&lt;br /&gt;उससे पार जाने की हिम्मत जुटा सके&lt;br /&gt;यही तो करना है&lt;br /&gt;कविता शब्दों की जुगाली नहीं&lt;br /&gt;इबादत है उसकी&lt;br /&gt;शब्दों के अलाव पर जो&amp;nbsp; नंगे पांव चलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारे लिए-9&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोड़ो भी यार! बहुत काम है&lt;br /&gt;इस वक्त करने के लिए,&lt;br /&gt;गंदे मटमैले कब से न धुले&lt;br /&gt;ये प्याले, ... ये गिलास&lt;br /&gt;इस मेज पर रखे हैं,&lt;br /&gt;मेज या कूड़ा घर&lt;br /&gt;न जाने कबका अटाला&lt;br /&gt;सभी यहां रखा है&lt;br /&gt;जाले ही जाले&lt;br /&gt;क्राक्रोच टहलते हैं&lt;br /&gt;छिपकली के अंडे, तस्वीर के पीछे कब से रखे हैं,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फर्श भी गंदा है&lt;br /&gt;न जाने कब कौन&lt;br /&gt;यहां ‘पीक’ कर गया है&lt;br /&gt;इसका या उसका, जो भी यहां आया था&lt;br /&gt;सराय को अपनी समझ&lt;br /&gt;शंका समाधान कक्ष समझ, वह भी गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तुम कहते हो&lt;br /&gt;यह तुम्हारी है&lt;br /&gt;तुम्हारे बाबा के बाबा, उनके परदादा&lt;br /&gt;फिर उनके बाबा&lt;br /&gt;पट्टा यहां पाए थे&lt;br /&gt;यहां सफाई तुम्हे करनी है&lt;br /&gt;क्योंकि यह तुम्हारी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां, साफ हो जाए&lt;br /&gt;सब करीने से सज जाए&lt;br /&gt;नल का, बिजली का, और दवाइयों का खर्च &lt;br /&gt;ज्यादा इतना&lt;br /&gt;सम्हलता ही नहीं,&lt;br /&gt;हाथ-पांव हरि कीर्तन&lt;br /&gt;&amp;nbsp;सत्संग की तलाश में घूम रहे कब से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सराय, ... यह कभी लावारिस रहती नहीं&lt;br /&gt;... किसी ओर को ही यहां आना है&lt;br /&gt;... वह पसरेगा बैंच पर&lt;br /&gt;नए कुशन, नया फर्श, और रंगीन दीवारें उसकी&lt;br /&gt;और तुम्हे बस&lt;br /&gt;फिर&lt;br /&gt;प्याले-प्लेट धोना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जिन्हें नींद बहुत आती है-10&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्हें नींद बहुत आती है&lt;br /&gt;वे ही हकदार हैं&lt;br /&gt;समय के सही दस्तावेज हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी वाणी में आग सचमुच पिघलती है&lt;br /&gt;बदलाव की चाहत&lt;br /&gt;कपड़ों में झलकती है&lt;br /&gt;दाढ़ी में उलझे हुए बाल&lt;br /&gt;नए खिजाब का देते अहसास&lt;br /&gt;अनकहा, ... बता जाते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के सवाल&lt;br /&gt;आज की दुनिया&lt;br /&gt;दोनों की टकराहट&lt;br /&gt;इतनी उबाऊ और थकानदार&lt;br /&gt;समय, असमय&lt;br /&gt;जात-कुजात&lt;br /&gt;ये सभा, ये मीटिंग&lt;br /&gt;कहना और कहना&lt;br /&gt;किसी का न सुनना&lt;br /&gt;इससे मिल, उससे मिल&lt;br /&gt;जो न मिल सके&lt;br /&gt;उसे हरकाना&lt;br /&gt;कितना कष्टकारी है&lt;br /&gt;तभी,&lt;br /&gt;कुछ करने की बात सुन&lt;br /&gt;उन्हें नींद बहुत आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता का पहला छन्द-11&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो नहीं सुनता है कविता&lt;br /&gt;न आता है&lt;br /&gt;न आना चाहता है&lt;br /&gt;तुम्हारे बीच&lt;br /&gt;डरता है,&lt;br /&gt;तुम उसे बेच न आओ बाजार में&lt;br /&gt;मुहावरा, कथन का&lt;br /&gt;छन्द और बिम्ब का&lt;br /&gt;प्रतीक अलंकार का&lt;br /&gt;बदल सा गया है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता का आलोचक&lt;br /&gt;उसकी तलाश म,ें&lt;br /&gt;वह बार-बार आता&lt;br /&gt;चाय की प्यालियां, लाता-ले जाता&lt;br /&gt;कमरे की झाडू&lt;br /&gt;या बाहर नाली की सफ़ाई&lt;br /&gt;कहां तक भागे&lt;br /&gt;सब उसको ही करना है,&lt;br /&gt;वही गीत का पहला छन्द है&lt;br /&gt;जानकर वह &lt;br /&gt;चुपचाप खिसत जाता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी ही खोज&lt;br /&gt;सबको है भारी&lt;br /&gt;सम्मुख है वह बैठा&lt;br /&gt;नज़र नहीं आता&lt;br /&gt;कवि की बढ़ती लाचारी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अस्पताल में झगड़ा&lt;br /&gt;डाॅक्टर की पिटाई&lt;br /&gt;मरीजकी पिटाई&lt;br /&gt;जो न मर पाए&lt;br /&gt;मरने की कोशिश में&lt;br /&gt;सब करते हाथापाई&lt;br /&gt;वह खड़ा-खड़ा देखता,&lt;br /&gt;दृष्टा वही&lt;br /&gt;दृश्य वही&lt;br /&gt;दर्शक वही&lt;br /&gt;पर कवि की आँख में सुरमा नहीं&lt;br /&gt;जो वह चुरा पाए,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खड़ा-खड़ा देखता&lt;br /&gt;हर गली, चैराहे पर&lt;br /&gt;उसकी कटती थी जेब&lt;br /&gt;सिपाही वही, वकील वही, कवि वही&lt;br /&gt;जाते जुलूस में&lt;br /&gt;चीखते, चिल्लाते, कल के शासक&lt;br /&gt;कल की प्रजा के सुधी क्रु( चिंतक&lt;br /&gt;एकमत सब,&lt;br /&gt;जब तक वह नहीं है&lt;br /&gt;हमें काम करना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी हजामत का&lt;br /&gt;नया-नया उस्तरा इजाद करना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चुपचाप खड़ा-खड़ा&lt;br /&gt;सोचता सिर घुनता&lt;br /&gt;अपने ही आप पर हंसता, बतियाता&lt;br /&gt;ढूंढता ‘विक्रम’ को&lt;br /&gt;कभी साथ लाया ‘बैताल’ सिर पर&lt;br /&gt;बिठाकर&lt;br /&gt;पर यहां कोई नहीं&lt;br /&gt;मत-पेटी के वंशज&lt;br /&gt;मत से निकले हैं&lt;br /&gt;मत में गिरेंगे&lt;br /&gt;गली, पोखर, कहीं भी जल नहीं&lt;br /&gt;लोहे की पेटी में&lt;br /&gt;या बिजली की मशीन में&lt;br /&gt;तिलचट्टे रहेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ढूँढ़ते सब उसको&lt;br /&gt;कवि भी हैरान है&lt;br /&gt;कविता से कब वह &lt;br /&gt;चुपचाप निकल भागा है&lt;br /&gt;बड़े-बड़े छंद, अलंकार छोड़&lt;br /&gt;बिम्ब, प्रतीकों के सात घेरे-छोड़-तोड़&lt;br /&gt;पास में खड़ा वह&lt;br /&gt;कविता में आकर&lt;br /&gt;गैर हाजिर रहता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; बहुत बड़े हो-12&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यार! तुम बहुत बड़े हो&lt;br /&gt;बड़े भारी-भरकम शब्द&lt;br /&gt;बिना बरसात के बरसाती ओढ़े वृ( के सामने जाते &lt;br /&gt;खिलखिलाकर हंसते&lt;br /&gt;शाला से लौटते बच्चे,&lt;br /&gt;जीभ-दिखार दौड़ पड़ते,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पीछे.....&amp;nbsp; ,खजलाया, ... कुड़कुड़ाता बूढ़ा&lt;br /&gt;अतीत की टूटी नौका के पाल सम्हाले&lt;br /&gt;बरसाती थामे, दौड़ता-हांपता&lt;br /&gt;नई कौंपल को रौंदने को दुस्साहस लिए&lt;br /&gt;चींखता,&lt;br /&gt;बूढी, जीर्ण-शीर्ण पुस्तक के पन्ने तलाशता&lt;br /&gt;झुंझलाया&lt;br /&gt;तीर्थ यात्रा का टिकिट खरीदता&lt;br /&gt;रात को ‘नेट’ पर रंगीन चित्र देखने की कोशिश में&lt;br /&gt;बार-बार कटने पर चीखता&lt;br /&gt;दुनिया को कोसता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम बहुत पहले-बहुत पहले&lt;br /&gt;पैदा क्यों हुए&lt;br /&gt;जब कलियुग में वापसी सतयुग की है&lt;br /&gt;रंभा-मेनकाएं&lt;br /&gt;गली-गली नाचतीं&lt;br /&gt;थिरक-थिरक उत्सव मनातीं,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बूढे़ होने का दुख&lt;br /&gt;कयामत की कल्पना से भी त्रासदी&lt;br /&gt;क्या सचमुच नहीं है,&lt;br /&gt;जबकि ‘दाउद’ की बेटी की शादी में&lt;br /&gt;सैकड़ों व्यंजनों पर लपलपाती जीभ&lt;br /&gt;अपने ही होठांे पर&lt;br /&gt;दांतों की आजमाइश से बचती, नुच जाती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े होने का दुख&lt;br /&gt;छोटे-छोटे सुखों को छू नहीं पाता है&lt;br /&gt;कम हो सके बड़ा पन&lt;br /&gt;सचमुच बड़ा कर जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; क्योंकि-13&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक रेल के डिब्बे में &lt;br /&gt;भारी भीड़ में तुम्हारा पहचाना सा चेहरा&lt;br /&gt;यह तुम, यह वह,&lt;br /&gt;स्मृतियां पर पड़ा पत्थर&lt;br /&gt;हटाए नहीं हटता,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मांगीलाल हो या पन्ना, या भूरा या गोपी&lt;br /&gt;चेहरे उनके जो साथ रहे&lt;br /&gt;पहचान नहीं दे पाए&lt;br /&gt;हंसते-गाते, बोलते-चलते,&lt;br /&gt;कुछ मर गए&lt;br /&gt;कुछ खप गए&lt;br /&gt;रात-दिन की दौड़ में,&lt;br /&gt;”सर!“ अनुगूंज में&lt;br /&gt;पहचान उठती है&lt;br /&gt;पहचान गिरती है&lt;br /&gt;जिसे पहचानता है, जो पहचानता है&lt;br /&gt;उससे वह छोटा है&lt;br /&gt;जिसे पहचाना, वही बड़ा होता है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहचानकर, अजनबीपन&lt;br /&gt;न जाना, न पहचाना, बुत को अपनाना&lt;br /&gt;सचमुच सुखद होता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जबकि बात उसकी है&lt;br /&gt;उसके लिए आए हैं&lt;br /&gt;सामने उसी का पोस्टर टंगाहै&lt;br /&gt;उसी की कोशिश में यह ‘रत जगा’ है&lt;br /&gt;पर हमने पहचाना तो&lt;br /&gt;वह सर चढ़ेगा&lt;br /&gt;सर पर कदम रख, कदम ताल करेगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चुप रहो,&lt;br /&gt;चुप रहो,&lt;br /&gt;उनको&amp;nbsp; ही पहचानने दो&lt;br /&gt;हम इस पहचान के मात्र साक्षी है&lt;br /&gt;साक्षी रहना, वक्त की जरूरत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; वह-14&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह शाम वह बीनती है प्लास्टिक की काम आई थैलियां&lt;br /&gt;इसमें अचरज नहीं&lt;br /&gt;वह सिगरेट की पन्नी की माफिक चमक रखती है&lt;br /&gt;काले बोरे&lt;br /&gt;मैले व गर्द में डूबे हुए हैं, ... कांधे पर रखे&lt;br /&gt;टूटी प्लास्टिक की चप्पल पहने&lt;br /&gt;नाले के बीच उतरी है&lt;br /&gt;बोरे में रखती-जाती&lt;br /&gt;गंदी, मटमैली, मुट्ठी में थैलियां&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाय!&lt;br /&gt;उबकाई की हद तक उठती है हिचकी&lt;br /&gt;डबलरोटी पर लिपटी&lt;br /&gt;फिर चढ़ी आती है&lt;br /&gt;नई थैली, प्लास्टिक की&lt;br /&gt;... तब अचानक पड़ौस में -सूरज’ उग जाता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुराने को नया&lt;br /&gt;नये को पुराना&lt;br /&gt;इंसान जो कल गुजरा था&lt;br /&gt;उसके जाने की प्रतीक्षा में, ... कितना खोया गया सब कुछ&lt;br /&gt;पुरानी थैली सा&lt;br /&gt;कीचड़ में रखा वही चेहरा था&lt;br /&gt;बस आना&lt;br /&gt;और जाना&lt;br /&gt;बीच में कहां रहना,&lt;br /&gt;मशीन पुराने को साफ कर नया बना देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर सरकार कहती है&lt;br /&gt;थैली पर्यावरण विरोधी है&lt;br /&gt;उसका बन्द होना, ...&lt;br /&gt;आज की जरूरत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब ये थैलियाँ&lt;br /&gt;गली-गली-शहर-शहर&lt;br /&gt;बेतरतीब पड़ी है&lt;br /&gt;जिनका अपना खुद कुछ नहीं&lt;br /&gt;जो भी कोई भर दे&lt;br /&gt;चाहे नेता, या कोई बाबा&lt;br /&gt;या‘मीडिया’ हो&lt;br /&gt;सम्हाले फिरती हंै&lt;br /&gt;चहकती हंै, फुदकती हंै, कभी-कभी चीखती हैं,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनका क्या होगा&lt;br /&gt;अब सुना है, कागज की होंगी&lt;br /&gt;हवा-पानी स्पर्श से टूटकर-बिखरकर&lt;br /&gt;सब सह लेंगी&lt;br /&gt;जैसे पहले हुआ करती थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी-कभी-15&lt;br /&gt;कभी-कभी चोरों के घर भी आ जाते हैं चोर&lt;br /&gt;हमने थाना लुटता देखा&lt;br /&gt;हमने थाना बिकता देखा&lt;br /&gt;थाने के भीतर&lt;br /&gt;थाने को सोते देखा,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी-कभी&lt;br /&gt;पहनकर काला कोट चलता बगुला पोखर की ओर&lt;br /&gt;धरा पांव पानी में नीचे&lt;br /&gt;&amp;nbsp;दूर उछलते दादुर&lt;br /&gt;मछली दौड़ उछाला करती&lt;br /&gt;... दूर फिसलता वह चैखट पर,&lt;br /&gt;... माया की छाया है&lt;br /&gt;मरे कफ़न का सौदा होता&lt;br /&gt;मरने के पहले ही जाकर&lt;br /&gt;अपनी कब्र झांककर आता...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब तक नोट दिखे नहीं उसको&lt;br /&gt;पंडित लकड़ी जलने नहीं देता&lt;br /&gt;पहले पैसा&lt;br /&gt;पहले पैसा&lt;br /&gt;बूढ़े तोतों को बुलवाकर&lt;br /&gt;माया ब्रह्मज्ञान समझाती&lt;br /&gt;यहां पत्थर की आंखें पुजतीं&lt;br /&gt;हंसकर कहतीं&lt;br /&gt;जिसकी झांकी सजती उसको रोज चढ़ावा आता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लुटा पिटा&lt;br /&gt;गोबर का बेटा&lt;br /&gt;रहा ढूंढ़ता प्रेमचन्द को&lt;br /&gt;क्योंकि होरी का लाकर जन्मा उसका वंश चलाकर छोड़ा&lt;br /&gt;तब से पीट रहे&lt;br /&gt;सुधि जन, हट लकीर उसके परिजन की&lt;br /&gt;‘हँसते-गाते अपनी चमड़ी को और अधिक मुटियाते जाते&lt;br /&gt;पर वह थाने पर बैठा&lt;br /&gt;नहीं कोई जमानत आई,&lt;br /&gt;उसकी दफ़ा सोचता नाजिम&lt;br /&gt;‘मुंशी धीरे से यह कहता&lt;br /&gt;चोरों के घर ढूंढ़ रहा था, यह भूखा रोटी का कौर!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; सड़क पर-16&lt;br /&gt;सड़के चैड़ी हो रही है&lt;br /&gt;और गहरी और काली&lt;br /&gt;कोलतार सजी, पिटती, कुटती और गहराती&lt;br /&gt;पास की थड़ियां&lt;br /&gt;न जाने कब की हट गईं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूछता पप्पू&lt;br /&gt;नहीं गुब्बारे वला&lt;br /&gt;नहीं साइकिल के पंचर ठीक करता, हरजू का बेटा&lt;br /&gt;संतरी चैकस&lt;br /&gt;सीढ़ी पर सीढ़ी, ठहरना मुश्किल&lt;br /&gt;हवा कह रही थी।&lt;br /&gt;बड़ी कार को रुकने ठहरने की जरूरत है&lt;br /&gt;रास्ता तंग &lt;br /&gt;इतना, छोटा और पतला&lt;br /&gt;अब दिखा, चैड़ा, और खुला, ... अमरीका सा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना तुमने!&lt;br /&gt;यहां आदमी की जात ने&lt;br /&gt;भूख को किनारे पर सजा&lt;br /&gt;गंदगी ही रास्ते को सौंप दी&lt;br /&gt;नहीं था किसी को पता&lt;br /&gt;कभी यहां सड़क भी थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब तरफ आदमी, थड़ियां, ... ठेले ...&lt;br /&gt;यही था शेष इस सड़क का।&lt;br /&gt;ढूंढ़ती आंख उन सभी को&lt;br /&gt;हंसी, ... ‘पद्मावती’ के सरोवर स्नान सी,&lt;br /&gt;या वह पुलक&lt;br /&gt;थिरकी भी कभी दो जून रोटी को,&lt;br /&gt;नहीं था गीत,&lt;br /&gt;संगीत जो इंसान की जुबान पर था कभी&lt;br /&gt;इस चैड़ी सड़क पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘माॅल’ आने को सुना है पास में&lt;br /&gt;‘छोटे लोग, छोटी दुकान, ये तंग गलियां&lt;br /&gt;जा सके कहीं दूर...&lt;br /&gt;‘आज&amp;nbsp; का सोच यही है’&lt;br /&gt;नेता कहता फिरता था’’,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देसी भाषा कसमसाई&lt;br /&gt;देसी की आंख भर आई&lt;br /&gt;अखबार के पन्ने हंसे, ... और खिलखिलाए&lt;br /&gt;...उनके भीतर सजा , रंगीन नक्शा&lt;br /&gt;घ्र-घर हंसा,चहका ,गुदगुदाया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच! उनका देसीपन छुड़ा़&lt;br /&gt;फिरंगी&amp;nbsp; रंग में रंगा &lt;br /&gt;रेवड़ में बदलाव ,&lt;br /&gt;आज-तक की यही थी ख़बर,&lt;br /&gt;...&lt;br /&gt;वे बतियाते रहे&lt;br /&gt;इसी सड़क पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; हस्तरेखा-17&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कीचड़ में सने हाथ की रेखाएं&lt;br /&gt;पढ़ नहीं पाता पंडित&lt;br /&gt;नहर में पानी मुद्दत बाद जो आया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूर खड़ा अभियंता&lt;br /&gt;हथेली खोले हुए बार-बार देखता&lt;br /&gt;खुजलाहट हथेली की सुबह से&lt;br /&gt;इस बार का बजट अब पूरा भी होना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बादल महीने भर से गायब हैं&lt;br /&gt;शुक्र है समय अच्छा है&lt;br /&gt;गुरुजी ने कहा था-&lt;br /&gt;शनी उतर गया है&lt;br /&gt;दूर खेतों में, फटे हाल किसानों पर&lt;br /&gt;चढ़ा ही नहीं&lt;br /&gt;चिपक भी गया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाजन भी खुश&lt;br /&gt;कल ही सुबह-सुबह पहली बार गया था&lt;br /&gt;तृष्णा की रेत पर...&lt;br /&gt;भारतमाता को याद कर &lt;br /&gt;कदमताल कर आया था&lt;br /&gt;उधारी बढ़ेगी&lt;br /&gt;ब्याज सवा से दो पाई सैकड़ा बढ़ेगा&lt;br /&gt;गिरवी जमीन, बर्तन-भांडे भी होंगे&lt;br /&gt;तब वसूली तब होगी...&lt;br /&gt;तब, भविष्य वह में सुरक्षित रह सकेगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्कृति का गवाक्ष खाली&lt;br /&gt;नहीं कोई आता इधर&lt;br /&gt;रानी, परनानी, दादी अब वहां कहां&lt;br /&gt;कभी बैठा था ललमुंहा बंदर वहां&lt;br /&gt;उठकर जबसे गया है&lt;br /&gt;नचता ‘बराह’ का वंशज&lt;br /&gt;महाजनी मंत्र पर&lt;br /&gt;चढ़ता-उतरता&lt;br /&gt;महिमा मंडित&lt;br /&gt;समाचार पत्रों में छपा है विज्ञापन&lt;br /&gt;भागवत कथा का वही आयोजक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीलंे व्यस्त है&lt;br /&gt;गि(ों को जाकर नौत आयी है तेरहवीं का भोज है&lt;br /&gt;कागा उड़ते ही नहीं&lt;br /&gt;बैठे हैं मुंडेरों पर कल से जमा&lt;br /&gt;बहस ही बहस&lt;br /&gt;राशि अकाल पर,&lt;br /&gt;या बाढ़ पर खर्च हो होनी है&lt;br /&gt;दिनभर में, ... कितनी कहां&lt;br /&gt;लार रूकती नहीं&lt;br /&gt;मरण पर्व आयोजित जो होना है।&lt;br /&gt;उनकी हथेली पर&lt;br /&gt;रेखाएं मिटसी गई है&lt;br /&gt;कीचड़ में सनी, धूल में बंधी&lt;br /&gt;सूरज की रोशनी में&lt;br /&gt;किरण सी चमकती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी रेखाएं&lt;br /&gt;पंडित हंस-हंसकर बांचता&lt;br /&gt;ग्रह अब उतरने को है&lt;br /&gt;खुजली रूकती नहीं&lt;br /&gt;जिस्म खुलाने चली है&lt;br /&gt;नस-नस में हवस सुरसा सी जगी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; समिति के सभागार में-18&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी चिंतित थे&lt;br /&gt;ज्ञानी, ध्यानी, चिंतक सुधी समीक्षक&lt;br /&gt;कुकुरमुत्ते की तनी छतरी पर&lt;br /&gt;जगत का बोझ थामे,&lt;br /&gt;अगर जरा भी हिले आकाश नीचे आ जाए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्कृति, अपसंस्कृति, बड़ी-बड़ी नौकाएं&lt;br /&gt;सूखती सरिता के सभी घाटों को तोड़ते&lt;br /&gt;वो चले आए&lt;br /&gt;दूर खड़े सौदागर&lt;br /&gt;तेज रोशनी में दमकता सुर्खानी चेहरा&lt;br /&gt;खुला वक्ष और ऊँची तिकोनी मंे कन्या&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेकारी भूख गरीबी, दूध-पानी, और सब&lt;br /&gt;नहीं मिला अब तक&lt;br /&gt;चाहत में जिसकी&lt;br /&gt;हजार साल से दम तोड़ता&lt;br /&gt;समिति दरवाजे पर, पगलाया ‘गोबर वह’&lt;br /&gt;वो फिर नाचेगा,&lt;br /&gt;खरीदेगी, वही कुछ जो उसे मिलता है&lt;br /&gt;धनिया को बस मुस्कराना है,&lt;br /&gt;होरी की&amp;nbsp; जरूरत नहीं &lt;br /&gt;उसकी मुस्कराहट पर, उसका ही माल&lt;br /&gt;गली कूचे बिकता है&lt;br /&gt;हवा, पानी, धूप और उजाला&lt;br /&gt;वह अपने पास रखता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी कभी का यूंही उतर गया&lt;br /&gt;जो था नया&lt;br /&gt;‘पाउच’ में चला गया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिंतक उदास&lt;br /&gt;क्रीतदास&lt;br /&gt;दूसरों को जुलूस में देख आंखे विस्फारित&lt;br /&gt;वाह! वाह!&lt;br /&gt;भीतर ही भीतर, सोच-सोच उदास&lt;br /&gt;हाय! हम न जा पाए&lt;br /&gt;वहां बटती भभूत थी&lt;br /&gt;यश की प्रेय की&lt;br /&gt;ले गया पड़ौसी जो कल तक यहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं-नहीं&lt;br /&gt;हमें लानी है क्रांति, आग यहां बुलानी है&lt;br /&gt;हो जाए भस्म सब&lt;br /&gt;जो भी कर्दम है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर चुप!&lt;br /&gt;मैं और मेरा तन भी तो यहीं है, ... उसे है बचाना&lt;br /&gt;चुप! चुप!&lt;br /&gt;फायर बिग्रेड को तुरंत यहां लाना है&lt;br /&gt;कुछ जले&lt;br /&gt;कुछ बुझे&lt;br /&gt;यहां बस ऐसा ही होना है&lt;br /&gt;हमको समिति के इसी हाल में&lt;br /&gt;इसी हाल में चिंतित चर्चा में सक्रिय होना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; सपने &lt;br /&gt;वह बचपन में सपने देखता है, &lt;br /&gt;सपने उसका&lt;br /&gt;बचपन चुरा लेते हैं,&lt;br /&gt;खबर न उसे है&lt;br /&gt;न मां-बाप को होती है&lt;br /&gt;वे सपनों को छीनकर बस्ता थमा देते हैं।&lt;br /&gt;वाह!&lt;br /&gt;वर्दी जो बचपन में चढ़ती है जिस्म पर&lt;br /&gt;उतरती तभी है&lt;br /&gt;जब चील काली पास आ,&lt;br /&gt;उस पर झपटती है,&lt;br /&gt;वह पूछता है, जगह-जगह&lt;br /&gt;इन सपनों का क्या अर्थ, जो रात को ही नहीं,&lt;br /&gt;दिन में तंग करते हैं&lt;br /&gt;न घर पर आराम है&lt;br /&gt;न दफ्तर में,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर बैठा बाबा कहता है&lt;br /&gt;जिन्दगी एक सपना है&lt;br /&gt;रात का छोटा और दिन का जरा बड़ा होता है&lt;br /&gt;पर उसका&amp;nbsp; ही सपना &lt;br /&gt;इतना बुरा क्यों है&lt;br /&gt;बाबा तो दस आसन सिखा &lt;br /&gt;हवाई जहाज में उड़ता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अखबार जब भी पढ़ता है&lt;br /&gt;कल से आज गरीब होता है&lt;br /&gt;गरीबी की रेखा, कहां से कहां तक &lt;br /&gt;भूख का रोटी से, रोटी का कैलोरी से जो&lt;br /&gt;रिश्ता बना है&lt;br /&gt;वही भूखे पेट का हिसाब भी रखता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस का भाड़ा&lt;br /&gt;स्कूल की फीस&lt;br /&gt;अनाज, सब्जी, दूध&lt;br /&gt;दवा की दुकान&lt;br /&gt;सितारों की तरह पास आकर &lt;br /&gt;जीभ दिखा देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भूख का सपनो से रिश्ता कभी सम्भव है&lt;br /&gt;सचमुच ही नहीं&lt;br /&gt;सपने में ही सही मशाल कोई जल जाए&lt;br /&gt;कर दे वह राख &lt;br /&gt;लोकतंत्री चादर पर जमा जो कचरा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कामकर- कामकर &lt;br /&gt;हर कोई कहता है&lt;br /&gt;ेमुट्ठी में कमाया कागज&lt;br /&gt;कुछ भी नहीं देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार कितनी रहमदिल&lt;br /&gt;कहीं भी, कभी-भी&lt;br /&gt;दारू की दुकान रोज नई खुल जाती है&lt;br /&gt;बढ़ते हैं ग्राहक...&lt;br /&gt;हाकिम की चाँदी और चमक जाती है।&lt;br /&gt;बाहर पोस्टर में &lt;br /&gt;लड़की साइकिल चलाती है&lt;br /&gt;पर भीतर चुपचुप&lt;br /&gt;अब सपने भी नहीं देख पाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव गाँव नन्दीग्राम&lt;br /&gt;पुलसिया कहता है&lt;br /&gt;कुछ भी करलो, यहाँ&lt;br /&gt;&amp;nbsp;रुपया आकाश से टपकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोड़ा कोई एक नहीं&lt;br /&gt;गाँव गाँव कोड़ा है&lt;br /&gt;कोड़ा को ही गिरवी रखा&lt;br /&gt;हँसिया और हथोड़ा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घन नहीं उठता अब&lt;br /&gt;दोनो हाथ रम-राम&lt;br /&gt;संसद में परसादी&lt;br /&gt;चहुृ ओर काँव -काँव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मत देख सपने अब&lt;br /&gt;नींद तोड़,आँख खोल&lt;br /&gt;तूही मंत्र&lt;br /&gt;तूही तंत्र&lt;br /&gt;थोड़ी सी वरजिश कर &lt;br /&gt;झुके अब कहीं नहीं&lt;br /&gt;उठा फेंक कंधे से&lt;br /&gt;अपनी ही जमीन यह अपना ही आकाश है&lt;br /&gt;स्वप्न छोड़ आँख खोल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&amp;nbsp;20हम&lt;br /&gt;अचानक ही वह पत्थर पेड़ पर आ गिरा था&lt;br /&gt;ठहरे हुए पक्षी&lt;br /&gt;जगे, फड़फड़ाए, उठे, उड़ गए,&lt;br /&gt;कहां, ... यह पता किसको था!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;याद रहा इतना&lt;br /&gt;आकाश है, जगह देगा, लौटकर फिर&lt;br /&gt;इसी पेड़ पर आना है&lt;br /&gt;पर न जाने क्यों&lt;br /&gt;कितने पत्थर रोज आ गिरते हैं।&lt;br /&gt;सड़क पर फटेहाल लड़की को, न जाने कितने गि(&lt;br /&gt;कांधे पर उठाए&lt;br /&gt;रोज तीर से मिलते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल तक भूख की &lt;br /&gt;तेरी मेरी उसकी&lt;br /&gt;बात वह करता था&lt;br /&gt;नुक्कड नाटक में शहीद बन बिखरता था&lt;br /&gt;कुरते और पजामे का रख नहीं पाता हिसाब था&lt;br /&gt;अचानक कल मिला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करोड़ों की बात लिए&lt;br /&gt;हंसता मुस्कराया&lt;br /&gt;देश, धरती, जन अचानक सैकड़ों शब्द लिए&lt;br /&gt;भारी से भारी&lt;br /&gt;शब्द शोर में बदल&lt;br /&gt;शोर, नोट में बदल&lt;br /&gt;वह जेब भरता,&lt;br /&gt;यही कहता फिरता था&lt;br /&gt;लोकतंत्र का सच &lt;br /&gt;राम का नाम है&lt;br /&gt;यहाँ नाम की लूट है&lt;br /&gt;लूट ही सच है&lt;br /&gt;जिसने यह जाना है&lt;br /&gt;सुख उसी को पाना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;हर कोई दूसरा..&lt;br /&gt;हाथ में पत्थरलिए&lt;br /&gt;सोचता सुबह शाम &lt;br /&gt;वह क्यों न कर पाया सह सब&lt;br /&gt;उसका भी कुरता उतना ही मैला और था काला...।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहता शनीचर&lt;br /&gt;राहू-केतू साथ तेरे साथ &lt;br /&gt;जन्म से लगे हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह धरती&lt;br /&gt;लुटने को बनी है&lt;br /&gt;&amp;nbsp;जो भी यहां आया, लूटता चला गया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भय चमड़ी से चिपटा&lt;br /&gt;और क्या छिन पाता&lt;br /&gt;सब छोड़, ले लंगोटी&lt;br /&gt;तभी हिमालय पर गया है&lt;br /&gt;कहता रहा वह&lt;br /&gt;है नहीं अब पास कुछ &lt;br /&gt;क्या कोई लेगा&lt;br /&gt;पर लंगोटी में भी कोई आकर&lt;br /&gt;यहां&amp;nbsp; भी लूट सकता&lt;br /&gt;यही छिपा सच यहां सबसे बड़ा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गिरते हैं पत्थर अब &lt;br /&gt;और धूमकेतु उल्का भी&lt;br /&gt;उनसे भी तेज, और तेज&lt;br /&gt;टी.वी. के चैनल&lt;br /&gt;नहीं कोई ठहर पाता&lt;br /&gt;कितनी चिकनी यह सतह है&lt;br /&gt;नहीं जल&lt;br /&gt;अब जरा भिगो पाता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीतर रखा था वह &lt;br /&gt;स्निग्ध कोमल&lt;br /&gt;छंद तुम्हारा ही, तुमने जो पाया था&lt;br /&gt;अचानक शीत पाकर&lt;br /&gt;पछुआ हवा से&lt;br /&gt;बर्फ सा हो गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताप कहां&lt;br /&gt;कहां है तपन...&lt;br /&gt;चर्चा ही व्यर्थ है&lt;br /&gt;बाहर के देवता&lt;br /&gt;पाषाण बन पुजे जो...&lt;br /&gt;इतना आदर पा&lt;br /&gt;अब भीतर ही जमे हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीतर का छंद&lt;br /&gt;सजीला सुरभित, चुपचाप बाहर निकल&lt;br /&gt;मंदिर में कबसे पूजित हुआ है&lt;br /&gt;और हम,&lt;br /&gt;हत भागी!&lt;br /&gt;नहीं-नहीं प्रभु परसादी&lt;br /&gt;पत्थरों के टोल से फिकते-फिकवाते&lt;br /&gt;हाथ दूसरे के कबसे,&amp;nbsp; कसे से रखे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;21&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब ‘कवि’ नहीं आते&lt;br /&gt;उस जमाने की बात है, जब भाषा प्राध्यापक&lt;br /&gt;अध्यापक और छात्र कवि हुआ करते थे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बसंत पंचमी पर&lt;br /&gt;निराला और सरस्वती की जयंती मना करती थी&lt;br /&gt;पीली सरसों हरकक्षा में फूलती फबती थी&lt;br /&gt;कवि, क्षमा करें प्राध्यापक नहीं&lt;br /&gt;पजामा-कुरते में सजे-धजे’ कविता सुनाते थे&lt;br /&gt;खुद प्रशंसा करते थे, ... कर वाते थे...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर अब बरसों से&lt;br /&gt;न जाने क्या हुआ&lt;br /&gt;कवि वह उदास,&lt;br /&gt;&amp;nbsp;नहीं चहकता है&lt;br /&gt;बेचता प्लाॅट है, शेयर खरीदता है&lt;br /&gt;छात्र अब आता नहीं&lt;br /&gt;कम्प्यूटर या शोध ‘कट-पेस्ट’ हो गया है&lt;br /&gt;कविता से पूछा-&lt;br /&gt;उसका आजकल रक्तचाप निम्न रहता है&lt;br /&gt;क्रु( कवि, क्रांतिकवि&lt;br /&gt;शोर से उकताए कवि&lt;br /&gt;कारखाने धीरे-धीरे बंद क्या हुए&lt;br /&gt;कम्प्यूटर कक्ष के ए.सी. में खोए&lt;br /&gt;ठंडी जहां होती है&lt;br /&gt;वहां गरमाहट सोती है&lt;br /&gt;फिर तुम्हीं बताओ कविता गर्म कहां होती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दवा पूछी&lt;br /&gt;सड़क छाप वैध राज बोले&lt;br /&gt;कविता को अब &lt;br /&gt;नुक्कड़ पर आना है&lt;br /&gt;गली-गली जाना है&lt;br /&gt;भाषा जबसे गहनों से हटी है&lt;br /&gt;कम से कम वस्त्रों में&lt;br /&gt;फैशन परेड में ‘बंटी-बबली’ संग आई है&lt;br /&gt;गुलम्मा क्या उतरा है&lt;br /&gt;नए नए प्रयोगों से देहाती वह &lt;br /&gt;घबड़ा सी गई है&lt;br /&gt;पाठक तो दूर गए&lt;br /&gt;कवि भी अब उकता से गए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शब्द बासी है&lt;br /&gt;नए-नए गढ़ेंगे&lt;br /&gt;उपमान, बिम्ब, प्रतीक अब आयातित होने हैं&lt;br /&gt;तब वस्त्र लुभा पाएं&lt;br /&gt;आलोचक-व्यापारी&lt;br /&gt;सौदागर पूरे हैं&lt;br /&gt;हिज्जों में बांट-बांट&lt;br /&gt;मंत्र मुग्ध बैठे हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी पहचान हो&lt;br /&gt;नए-नए प्रतिमान फिर गढ़ने हैं&lt;br /&gt;एक भी कपड़ा&lt;br /&gt;सलीके से रहा नहीं&lt;br /&gt;पहना नहीं, फाड़कर तुरंत कंैची कुतरते हैं,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कवियों को आना है&lt;br /&gt;अपनी ही भाषा में&lt;br /&gt;अपनी ही भाषा को&lt;br /&gt;अपनी अंगीठी में, अपनी हवा से, सुर्ख&lt;br /&gt;और सुर्ख करना है&lt;br /&gt;शब्द तक पिघलें&lt;br /&gt;अर्थ को गहेंगे&lt;br /&gt;कविता तब गलियों की खबर ले&lt;br /&gt;सड़क के गड्डो में&lt;br /&gt;अर्धनग्न बच्चों की शाला से लौटते दौड़ती रेल में&lt;br /&gt;छूते, टकराते, यूंही निकलता है&lt;br /&gt;कविता का तब रक्तचाप बढ़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;22&lt;br /&gt;उनसे कह मत देना नींद क्या होती है&lt;br /&gt;जब से सोए हैं, जागे ही नहीं,&lt;br /&gt;जब से गए थे बिस्तर पर&lt;br /&gt;वहीं पर है,&lt;br /&gt;वे चलते हैं, आते हैं, घूमते हैं&lt;br /&gt;बात भी करते हैं&lt;br /&gt;अभी-अभी आए थे&lt;br /&gt;किताब नई लिखी, &lt;br /&gt;बहुत बड़े विद्वान की भूमिका छपी है&lt;br /&gt;हजार साल पुरानी पुड़िया में रखी भस्म&lt;br /&gt;को शहद से चटाने पर&lt;br /&gt;गौमूत्र के साथ लेने पर, युवावस्था बनी रहती है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोबर से यान उड़ता था&lt;br /&gt;चर्चा भारी थी,&lt;br /&gt;बार-बार कहते थे&lt;br /&gt;यह मुल्क सोता है&lt;br /&gt;सदियों से, नींद खुलती नहीं&lt;br /&gt;इन्हें जगना होगा&lt;br /&gt;क्या अमरीका ने ही की है अंतरिक्ष यात्रा&lt;br /&gt;हमारे यहां कितना लिखा&lt;br /&gt;पढ़ता कोई नहीं&lt;br /&gt;सौरमंडल की यात्रा चर्चा जगह-जगह लिखी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी नींद बहुत गहरी है&lt;br /&gt;टूट नहीं सकती&lt;br /&gt;न तोड़ना उसको&lt;br /&gt;कुंभकरण जब तक सोता है&lt;br /&gt;बेहतर है&lt;br /&gt;उठने पर लंका-कांड होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;23&lt;br /&gt;कविता का सच क्या है&lt;br /&gt;कल्पना के ताने-बाने&lt;br /&gt;चैकड़ी जो बनी है-&lt;br /&gt;इस करधे पर&lt;br /&gt;भूख, गरीबी से लड़ते कवि ने&lt;br /&gt;जो हर चाय की चुस्की पर&lt;br /&gt;नई दुनिया के नए सोच की तस्वीर बनाता है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गली में&lt;br /&gt;पेशाब की बदबू से बचते-निकलते&lt;br /&gt;ऊपर कहीं से भी&lt;br /&gt;गंदगी के ढेर का अचानक पुष्पवर्षा सा गिरना&lt;br /&gt;सूअर जो कहीं था आमंत्रित&lt;br /&gt;दौड़ता-भगता,&lt;br /&gt;टकराहट मिमियाते श्वान से&lt;br /&gt;पास की दुकान से गूंजता संगीत&lt;br /&gt;कविता का रस&lt;br /&gt;ढूँढ़ता कवि&lt;br /&gt;सोचता,&lt;br /&gt;यथार्थ जो मिला ‘मकबर’ेे की गली में&lt;br /&gt;महफिल में आ जाए&lt;br /&gt;साबुन के झाग से निकला, फिसलता&lt;br /&gt;हाथ में टिकली साबुन सा वक़्त&lt;br /&gt;मां की, बाप की, रिश्ते में सभी की&lt;br /&gt;ख्वाहिश पहचानता&lt;br /&gt;बिजली के तारों पर बैठी ‘काग शृंखला&lt;br /&gt;यहां, वहां आसपास&lt;br /&gt;कविता में तलाशता&lt;br /&gt;तमीज सीधे खड़े होने की&lt;br /&gt;न बिकने की व्यथा&lt;br /&gt;लिखा बहुत कुछ&lt;br /&gt;छपा कहीं नहीं&lt;br /&gt;सुनकर नहीं कोई&lt;br /&gt;शब्द भीतर खंजर सा चीरता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काँख में दबी&lt;br /&gt;आई पत्रिका झांकता&lt;br /&gt;टुकुर-टुकुर&lt;br /&gt;रेत उठाती, अर्धनग्न, आदिवासी कन्या की&lt;br /&gt;भूख, ... पेड़ की छाया भी रोती, चीखती&lt;br /&gt;भयातुर, ... आंख की कोर में अचानक कंकड़ सा गिरता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवित यथार्थ&lt;br /&gt;शब्द क्या बांध पाए&lt;br /&gt;सोचना भी पाप है&lt;br /&gt;माया है माया है&lt;br /&gt;‘गोपाली’ बाबू की कथा में नहीं है यह&lt;br /&gt;नहीं ‘कागा राम’ मटक-मटक गाता है&lt;br /&gt;काटता है भीतर से&lt;br /&gt;रिसता है दुख, ... रात को टपकते नल से बूंद-बंूद सा&lt;br /&gt;न करने का, बस&lt;br /&gt;अपनी ही आंख में रोज और नीचे&lt;br /&gt;और नीचे, उतरने का देता है दर्द,&lt;br /&gt;वह जब भी देख पाती है&lt;br /&gt;तेज, ... तपती रेत में&lt;br /&gt;अचानक खिड़की से&lt;br /&gt;रोते, झींकते, चिल्लाते, पगलाते&lt;br /&gt;छोटे-छोटे पाँवों&lt;br /&gt;से आता-ठहरता, जाता, ढूंढ़ता रहता कुछ&lt;br /&gt;कविता का यथार्थ,वह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;23&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिनका कोई घर नहीं होता&lt;br /&gt;बिस्तर जमीं&lt;br /&gt;आकाश ही लिहाफ होता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात अचानक तेज रोशनी में&lt;br /&gt;सड़क किनारे&lt;br /&gt;कहीं डामर के ढोल&lt;br /&gt;या लकड़ी के ढेर&lt;br /&gt;या खड़ी कोई पुरानी सी गाड़ी&lt;br /&gt;या ठेले या रिक्शा&lt;br /&gt;और पास सोते गहरी नींद लेते&lt;br /&gt;मनुज पुत्र&lt;br /&gt;पुत्रियां और नाती&lt;br /&gt;नवासे और और बहुत सब ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न देख पाती आंखों का सपना&lt;br /&gt;काश करम अपने ही हो जाएं&lt;br /&gt;अचानक फूट पड़े, ज्वालामुखी कहीं से&lt;br /&gt;भस्म हो शहर&lt;br /&gt;गांव, चैराहा&lt;br /&gt;ये सिपाही&lt;br /&gt;नियान- बत्तियां&lt;br /&gt;नकली फूलों से लदे रंग-बिरंगे पेड़&lt;br /&gt;शाला पाठशाला&lt;br /&gt;और कदम ले जाएं&lt;br /&gt;सड़क से दूर अंधेरी लकीर से बिछी&lt;br /&gt;चींटी की कतार&lt;br /&gt;एक नहीं, दो नहीं&lt;br /&gt;गिनती भी कहां रही&lt;br /&gt;और पास में कोई पूछे&lt;br /&gt;यह नया कौन आया है&lt;br /&gt;तब अचानक परिचय&lt;br /&gt;अपना न दे पाए&lt;br /&gt;कोई जो जाकर, वहां चुपचाप लेटा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करम यह किसका है&lt;br /&gt;उसका यह मेरा&lt;br /&gt;अशिक्षा, अज्ञान का&lt;br /&gt;लाचारी बेबसी का&lt;br /&gt;वह ईंटें उठाता, बजरी उठाता, दीवारें चिनता&lt;br /&gt;न सिर छिपाने को छप्पर&lt;br /&gt;न बतियाने की ‘थान’&lt;br /&gt;धरती पर खुद&lt;br /&gt;डामर बन, डामर सा बिछता&lt;br /&gt;रात को अचानक&lt;br /&gt;कभी कोई कार आकर कुचल जाए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिपाही यही कहता&lt;br /&gt;गलती उसी की जो सड़क पर सोया है&lt;br /&gt;सड़क उसी की&lt;br /&gt;कार जिसकी है&lt;br /&gt;बड़ी कार का होना&lt;br /&gt;तरक्की है देश की&lt;br /&gt;सड़क पर सोना&lt;br /&gt;पशुओं की बेइज्जती&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह जगह ही उनकी है,&lt;br /&gt;इन्सान को चाहिए उनसे भी कुछ सीखे&lt;br /&gt;किसी ‘हीरो’ की कार के नीचे आकर&lt;br /&gt;चुपचाप मरना सीखे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; 24 जूता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जूता हाथ में लेकर, वह आता है&lt;br /&gt;वह खुद जो जूता है&lt;br /&gt;‘सोहना’ में उसका घर जलता है।&lt;br /&gt;वह जूता होकर&lt;br /&gt;जुतियाता है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी कीमत कुछ हजार रुपये&lt;br /&gt;जो नुकसान हुआ है,&lt;br /&gt;तिल-तिल मरती आत्मा की कीमत, जो जल नहीं सकती,&lt;br /&gt;मर नहीं सकती,&lt;br /&gt;न हवा सुखा सकती है&lt;br /&gt;न जल भिगो सकता&lt;br /&gt;बस वह नासूर सी&lt;br /&gt;काले-कुत्ते की चमड़ी से सजी&lt;br /&gt;धुॅंवे सी बस सुलगती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीड़ समझाती है&lt;br /&gt;भीड़ बुलवाती है&lt;br /&gt;जो ताकतवर है&lt;br /&gt;उसका पांव कितना बड़ा होता है&lt;br /&gt;पंजे का नाखून खंजर सा&lt;br /&gt;उसका बूट&lt;br /&gt;हिन्दूस्तान रोंदता&lt;br /&gt;वह ‘साहब’ का बूट&lt;br /&gt;बूट-जूते, चप्पल को पीछे छोड़ता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पैर, ... और जूता, चप्पल और बूट&lt;br /&gt;फीते वाला&lt;br /&gt;नीचे कील हो, ठुकी हुयी&lt;br /&gt;कंपनी के साहब का जूता&lt;br /&gt;चमकता है, रोटी पर रखी चिकनाई सा&lt;br /&gt;बात दूसरी है&lt;br /&gt;साहब को चिकनाई मना है&lt;br /&gt;दिल की धमनी का इलाज जो होना है..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहब दिल की बीमारी से मरता है&lt;br /&gt;वहाँ पत्थर जमा है&lt;br /&gt;जो जूता है&lt;br /&gt;वह बस फटता है&lt;br /&gt;जबसे आया, नायलोन, फाइबर, और प्लास्टिक&lt;br /&gt;जूता बस बदल जाताहै&lt;br /&gt;हर चुनाव के बाद&lt;br /&gt;नया होकर चमकता है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गलियां किससे अब क्या कहें&lt;br /&gt;हर नाली भरी पड़ी है, प्लास्टिक चप्पल से&lt;br /&gt;कसूर हरी घास का&lt;br /&gt;बिना बूट रह नहीं पाती&lt;br /&gt;उसकी किस्मत में पंडित ने कहा है&lt;br /&gt;जितना दबती है&lt;br /&gt;नुचती है&lt;br /&gt;उतनी मुलायम कही जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;25&lt;br /&gt;पुराने हंसिए, हथोड़े से न तो फसल कट पाती है&lt;br /&gt;न कील ठुक पाती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूरज को तो उगना है, कब!&lt;br /&gt;समय जो पंचांग में कहा है&lt;br /&gt;क्या कभी गलत हुआ है&lt;br /&gt;पर रात का अंधेरा भयावह कितना है&lt;br /&gt;वे दोनों पास-पास बैठे&lt;br /&gt;एक दूसरे की गर्दन चापने का खंजर चुपचाप घिसते रहे&lt;br /&gt;अंधेरे को भय था&lt;br /&gt;न दिखाई कुछ पड़ता था&lt;br /&gt;खुद का गला नहीं घिस पाए, खुद के ही खंजर से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह की प्रतीक्षा थी&lt;br /&gt;तभी धर्म दिखाई पड़ता है&lt;br /&gt;... नहीं तो वह भी, ... सती चबूतरे सोता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिपाही, ऊंघता, बड़बड़ाता&lt;br /&gt;दुकान का खर्च, साहब की चैथ, खर्चा बड़बड़ाता&lt;br /&gt;अंधेरे में लिखा जाना संभव नहीं था&lt;br /&gt;वह दोनों की जेब&lt;br /&gt;बार-बार तलाश चुका था&lt;br /&gt;मुल्क अंधेरे में फसरा&lt;br /&gt;स्वयं से बतियाता&lt;br /&gt;कभी गोधरा, कभी अयोध्या&lt;br /&gt;स्वर्ण मंदिर, अक्षर धाम&lt;br /&gt;नहीं-नहीं, संसद&lt;br /&gt;होठों पर गिरती लार&lt;br /&gt;दांतों से भींच-भींच&lt;br /&gt;जीभ के हवाले रख&lt;br /&gt;बीच-बीच सो जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होना है सुबह को&lt;br /&gt;सबको पता है&lt;br /&gt;बस इसी प्रतीक्षा में&lt;br /&gt;काली रात को&lt;br /&gt;और बड़ी और बड़ी&lt;br /&gt;गहराता अंधेरा&lt;br /&gt;पश्चिम से उगेगा वह&lt;br /&gt;सोच-सोच आल्हादित,&lt;br /&gt;पर सोच कहां पाता यह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धार जो लगनी है&lt;br /&gt;महंगा नहीं है यह&lt;br /&gt;बस, एक बार जाना, गली पर सड़क पर&lt;br /&gt;दूर चोंधियाते घर पर&lt;br /&gt;नहीं जो आसकता, नहीं जो कह पाता&lt;br /&gt;उसकी आवाज सुन &lt;br /&gt;कुछ तो कर सकता ,&lt;br /&gt;सच तो यही है&lt;br /&gt;कितना भी पुराना जंग खाया औजार हो।&lt;br /&gt;धार लगते ही, स्वभाव लौट आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;26&lt;br /&gt;‘रेखा सी सरल जिन्दगी&lt;br /&gt;नहीं चाहता अब कोई ‘भुवन’ ... न स्वयं कवि लेखक भी&lt;br /&gt;जब इधर सड़कों पर लहू बहता था&lt;br /&gt;न जाने किसका, उसका तो नहीं जो बस&lt;br /&gt;स्त्री देह में ढूंढता था&lt;br /&gt;सुख व सत्य जीवन का..&lt;br /&gt;क्या सचमुच ‘बु(’ तुम्हारी करुणा का उद्रेग इतना ही था&lt;br /&gt;तुम्हारी शरण में ही था सब कुछ&lt;br /&gt;न करने, न कर पाने की व्यथा का हर हल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो कुछ करने को तत्पर है&lt;br /&gt;दिन-रात का भेद छोड़कर जाती है नए रास्तों पर पहली बार&lt;br /&gt;उनींदी आंख में देखते सपनों के बीच मां-बाप को&lt;br /&gt;बेरोजगार भाई को&lt;br /&gt;या कम कमाऊ पंति की आंख में जागे सुविधा स्पर्श को&lt;br /&gt;जाती है वह,&lt;br /&gt;सौंपती है सपने&lt;br /&gt;इस तरह के सौदे,... कामकाजी बातें&lt;br /&gt;रहना है ... उसे&lt;br /&gt;मिश्री सी चाशनी सी जीभ पर लिपटे शब्दों की जमाबंदियां&lt;br /&gt;रोज-रोज&lt;br /&gt;बनती-बिगड़ती, खसरों की टीप&lt;br /&gt;न कर पाती, ... जो&lt;br /&gt;फैशन में व्यस्त, ... या कहीं कुछ और...&lt;br /&gt;उसकी चर्चा में, व्यस्त सब अराजक, आज,&lt;br /&gt;‘उसे’, रात भर जगना है&lt;br /&gt;जगते-जगते बस काम करते&lt;br /&gt;‘‘राजा राममोहन राय’’ की दुनिया को बहुत पीछे करते&lt;br /&gt;अपने पांवों से देश दुनिया नापती&lt;br /&gt;सचमुच ‘बड़ी’ है वह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोज-रोज दुख से भगते&lt;br /&gt;जंगल में, घर में, फंदे की तलाश में&lt;br /&gt;ढूंढ़ते, युवक-युवती, ... घर के कर्जे से डूबे पुरुष&lt;br /&gt;अचानक क्या हुआ&lt;br /&gt;दुख का सरोवर&lt;br /&gt;सुनामी लहर पा&lt;br /&gt;तट से अंडमान, ‘निकोबार’ भिगो गया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लहरें ही लहरें&lt;br /&gt;सुख की तलाश में, पंडित भरमाया&lt;br /&gt;जन्मपत्री, शुक्र, शनी&lt;br /&gt;सबको बुलवाया&lt;br /&gt;झोला जो&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-3630645993492979188?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/3630645993492979188/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=3630645993492979188&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/3630645993492979188'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/3630645993492979188'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/12/1.html' title=''/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-4550445723313912451</id><published>2009-11-23T19:04:00.000+05:30</published><updated>2009-11-23T19:04:43.883+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>कविता,</title><content type='html'>घर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रस्ते अलग अलग हैं&lt;br /&gt;जाना तो एक घर है&lt;br /&gt;हम रहते दादाबाड़ी&lt;br /&gt;तुम बरकत नगर निवासी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सड़क के इधर हम हैं &lt;br /&gt;तुम उधर रहते,&lt;br /&gt;कैसी हुई मजबूरी&lt;br /&gt;हाथ भी कहाँ&amp;nbsp; हैं हिलते?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपर की&amp;nbsp; मंजिल हम हैं&lt;br /&gt;नीचे की मंजिल तुम हो&lt;br /&gt;मोबाइल यही है कहता&lt;br /&gt;नेटवर्क नहीं है मिलता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम हमसे कहाँ बड़े हो&lt;br /&gt;हम भी क्या तुम से कम हैं&lt;br /&gt;इस दुनिया में सब बड़े हैं&lt;br /&gt;सचमुच दही बड़े हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर से जो भी आया&lt;br /&gt;दौना लिए ही आया&lt;br /&gt;सदियों से यही हुआ है&lt;br /&gt;हरी घास&amp;nbsp; हम बने हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिल्लत से यहाॅं पर रहना&lt;br /&gt;मालिक ने कब कहा है,&lt;br /&gt;तोड़नी है तुमको बेड़ी&lt;br /&gt;सबसे बड़ी दुआ है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-4550445723313912451?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/4550445723313912451/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=4550445723313912451&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/4550445723313912451'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/4550445723313912451'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/11/blog-post_23.html' title='कविता,'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-8981329910768058843</id><published>2009-11-18T19:29:00.000+05:30</published><updated>2009-11-18T19:29:44.405+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; सपने &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;वह बचपन में सपने देखता है, &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;सपने उसका&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;बचपन चुरा लेते हैं,&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;खबर न उसे है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;न मां-बाप को होती है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;वे सपनों को छीनकर बस्ता थमा देते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;वाह!&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;वर्दी जो बचपन में चढ़ती है जिस्म पर&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;उतरती तभी है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;जब चील काली पास आ,&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;उस पर झपटती है,&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;वह पूछता है, जगह-जगह&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;इन सपनों का क्या अर्थ, जो रात को ही नहीं,&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;दिन में तंग करते हैं&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;न घर पर आराम है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;न दफ्तर में,&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;बाहर बैठा बाबा कहता है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;जिन्दगी एक सपना है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;रात का छोटा और दिन का जरा बड़ा होता है।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;पर उसका ही सपना &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;इतना बुरा क्यों है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;बाबा तो दस आसन सिखा &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;हवाई जहाज में उड़ता&amp;nbsp; है।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;अखबार जब भी पढ़ता है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;कल से आज गरीब होता है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;गरीबी की रेखा, कहां से कहां तक &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;भूख का रोटी से, रोटी का कैलोरी से जो&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;रिश्ता बना है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;वही भूखे पेट का हिसाब भी रखता है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;बस का भाड़ा&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;स्कूल की फीस&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;अनाज, सब्जी, दूध&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;दवा की दुकान&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;सितारों की तरह पास आकर &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;जीभ दिखा देते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;क्या पेट का भूख से &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;भूख का सपनो से रिश्ता कभी सम्भव है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;सचमुच ही नहीं &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;सपने में ही सही मशाल कोई जल जाए&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;करदे वह राख &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;लोकतंत्री चादर जमा जो कचरा है।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;अब रोक नहीं पाते है,&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;काम कर -काम कर &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;हर कोई कहता हैं&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;मुट्ठी में रखा कागज &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;कुछ भी नहीं देता है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;सरकार कितनी रहमदिल&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;कहीं भी, कभी-भी&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;दारू की दुकान रोज नई खुल जाती है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;बढ़ते हैं ग्राहक...&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;हाकिम की चाँदी और चमक जाती है।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;बाहर पोस्टर में &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;लड़की साइकिल चलाती है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;स्कूल भी जाती है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;पर भीतर चुपचुप &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;सपने भी अब नहीं देख पाती है।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;गाँव- गाँव नन्दीग्राम&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;पुलसिया कहता है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;कुछ भी करलो ,यहाँ&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;रुपया आकाश से टपकता है।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;”कोड़ा“ कोई एक नहीं &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;गाँव गाँव कोड़ा है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;काडे़ा क ेही गिरवी रखा &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;हँसिया और हथोड़ा है।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;घन नही उठता अब&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;दोनो हाथ,राम-राम&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;संसद में परसादी&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;चहुं ओर काँव-काँव।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;मत देख सपने अब&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;नींद तोड़ ,आँख खोल&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;तू ही मंत्र&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;तू ही तंत्र&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;थोड़ी सी वरजिश कर &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;झुके अब कहीं नहीं &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;नाजिम की कुर्सी &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;उठा फेंक कंधे से &lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;अपनी ही जमीन यह, अपना ही आकाश है&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;स्वप्न छोड़, आँख खोल।&lt;/span&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;br style="font-family: Verdana,sans-serif;" /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-8981329910768058843?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/8981329910768058843/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=8981329910768058843&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/8981329910768058843'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/8981329910768058843'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='कविता'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-1366145378694827717</id><published>2009-09-30T17:03:00.000+05:30</published><updated>2009-09-30T17:03:10.684+05:30</updated><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;हत्था&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; नहीं थी एक भी चिड़िया&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; वहां पर,&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; पेड़ जो अब हट गया था&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; चहकना, किसका, चहके कब कहांँ पर&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; अनुत्तरित सब&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; था नुकीला लोह उसके पास&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; पर हत्ता नहीं था&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; वह चढ़ा &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; डाल को हाथों से गिरा&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; पत्ते हटा&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; डाल का हत्ता बनाकर&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; पेड़ को ही काट डाला ।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; चिंतक, विचारक&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; बैठा पेड़ के नीचे&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; बुद्ध सा सम बन गया था।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; क्यों पेड़ ने खुद &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; दिया हत्ता बन,&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; सौंपा उसी़ को&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जिसने काटकर उसको&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; साफ़ जंगल कर डाला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; चहकती चिड़िया.... बस चुप&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; झाड़ियों की उड़तीफुनगियों पर &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; झाड़ियां ही पेड़ अब हांेगी&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; कहता फिर रहा था&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; फरमान ले हाथ में, दूत&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जंगलात हाकिम का।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt; हम&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अचानक ही वह पत्थर पेड़ पर आ गिरा था&lt;br /&gt;ठहरे हुए पक्षी&lt;br /&gt;जगे, फड़फड़ाए, उठे, उड़े....उड़ गए,&lt;br /&gt;कहांँ, ... यह पता किसको था!&lt;br /&gt;याद रहा इतना&lt;br /&gt;आकाश है, जगह देगा, लौटकर फिर&lt;br /&gt;इसी पेड़ पर आना है&lt;br /&gt;पर न जाने क्यों&lt;br /&gt;कितने पत्थर रोज आ गिरते हैं।&lt;br /&gt;सड़क पर फटेहाल लड़की को, न जाने कितने गिद्ध&lt;br /&gt;आंखों&amp;nbsp; पर उठाए&lt;br /&gt;रोज तीर से मिलते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल तक भूख की &lt;br /&gt;तेरी मेरी उसकी&lt;br /&gt;बात वह करता था&lt;br /&gt;नुक्कड नाटक में शहीद बन बिखरता था&lt;br /&gt;कुरते और पजामे का रख नहीं पाता हिसाब था&lt;br /&gt;अचानक कल मिला,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करोड़ों की बातें लिए&lt;br /&gt;हंँसता मुस्कराया&lt;br /&gt;देश, धरती, जन अचानक सैकड़ों शब्द लिए&lt;br /&gt;भारी से भारी&lt;br /&gt;शब्द शोर में बदल&lt;br /&gt;शोर, नोट में बदल&lt;br /&gt;वह जेब भरता,&lt;br /&gt;यही कहता फिरता था &lt;br /&gt;लोकतंत्र का सच &lt;br /&gt;राम का नाम है,&lt;br /&gt;नाम की लूट है,लूट ही सच है,&lt;br /&gt;जितने भी जाना है,उसे ही सुख पाना है।&lt;br /&gt;हर कोई दूसरा&lt;br /&gt;हाथ में पत्थरलिए&lt;br /&gt;सोचता सुबह शाम वह क्यों न कर पाया सह सब&lt;br /&gt;उसका भी कुरता उतना ही मैला और था काला...।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहता शनीचर&lt;br /&gt;राहू-केतू साथ तेरे अब कहां है&lt;br /&gt;यह धरती&lt;br /&gt;लुटने को बनी है&lt;br /&gt;&amp;nbsp;जो भी यहां आया, लूट ही तो गया है,&lt;br /&gt;लुट जाने का भय&lt;br /&gt;सब छोड़ ले लंगोटी&lt;br /&gt;तभी हिमालय पर गया है&lt;br /&gt;कहता रहा वह&lt;br /&gt;है नहीं अब पास कुछ &lt;br /&gt;क्या कोई लेगा&lt;br /&gt;पर लंगोटी में भी कोई आकर&lt;br /&gt;यहाँं&amp;nbsp; भी लूट सकता&lt;br /&gt;यह छिपा सच यहाँं सबसे बड़ा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गिरते हैं पत्थर अब &lt;br /&gt;और धूमकेतु उल्का भी&lt;br /&gt;उनसे भी तेज, और तेज&lt;br /&gt;टी.वी. के चैनल&lt;br /&gt;नहीं कोई ठहर पाता&lt;br /&gt;कितनी चिकनी यह सतह है&lt;br /&gt;नहीं जल&lt;br /&gt;अब जरा भिगो पाता&lt;br /&gt;भीतर रखा था वह &lt;br /&gt;स्निग्ध कोमल&lt;br /&gt;छंद तुम्हारा ही, तुमने जो पाया था&lt;br /&gt;अचानक शीत पाकर&lt;br /&gt;पछुआ हवा से&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; बर्फ सा हो गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताप कहांँ&lt;br /&gt;कहां है तपन...&lt;br /&gt;चर्चा ही व्यर्थ है&lt;br /&gt;बाहर के देवता&lt;br /&gt;पाषाण बन पुजे जो...&lt;br /&gt;इतना आदर पा&lt;br /&gt;अब भीतर ही जमे हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीतर का छंद&lt;br /&gt;सजीला सुरभित, चुपचाप बाहर निकल&lt;br /&gt;मंदिर में कबसे पूजित हुआ है&lt;br /&gt;और हम,&lt;br /&gt;हत भागी!&lt;br /&gt;नहीं-नहीं प्रभु परसादी&lt;br /&gt;पत्थरों के टोल से फिकते-फिकवाते&lt;br /&gt;हाथ दूसरे के कबसे,&amp;nbsp; कसे से रखे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-1366145378694827717?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/1366145378694827717/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=1366145378694827717&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/1366145378694827717'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/1366145378694827717'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/09/blog-post_30.html' title='कविता'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-3423184361625148247</id><published>2009-09-19T19:43:00.000+05:30</published><updated>2009-09-19T19:43:07.689+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>‘स्वयंसिद्धा’ भविष्य में झांकता वर्तमान&lt;br /&gt;डाॅ. क्षमा चतुर्वेदी की कहानियों से गुजरना अपने समकालीन समाज की यात्रा का पक्षधर बनना है। उनकी कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपने आसपास के परिवेश को और आते-जाते पात्रों की गहमागहमी को वे बीच से अपने कथा सूत्र का चयन करती हैं। वे कहानी के प्रचलित मुहावरे से जो समय विशेष में एक रूढ़ि बन जाता है उससे अपने आपको अलग रखते हुए कहानी की परंपरा को अपने जीवनानुभव की तपिश से विकसित करती हैं। उनकी हर रचना अपने आपमें दूसरी रचना से पृथकता रखते हुए विशिष्ट भी है, जिस प्रकार एक छोटे किंडरगार्डन स्कूल में जाते हुए बच्चों की जहां बच्चों की जहां वेशभूषा तो एक जैसी होती है, परन्तु उनका मुस्कराता हुआ चेहरा और आंखों की चमक एक अलग ही पहचान बता देती है, उनकी कहानियों में यही सरसता निश्छल स्वभाव की अभिव्यक्ति दिखाई पड़ती है। वे पाठक के साथ अपनी कथा के प्रारंभ से ही वह आत्मीय सम्बन्ध जोड़ लेती है कि पाठक उनके साथ जुड़कर, कहानी के पात्रों में अपनी आवाजाही प्रारंभ कर देता है। यही कारण है कि उनकी कहानियां एक लंबी समयावधि में लगभग तीस वर्षों से निरंतर प्रकाशित हो रही हैं और वे अपने पाठकों के बीच में अपनी उपस्थिति को उसी प्रकार जीवंत बनाए रखे हैं। मुख्य कारण यही है कि वे पाठक को अपनी कहानियों के माध्यम से एक सही नजरिया, सही दृष्टिकोण अपनाने के लिए बड़ी शालीनता के साथ प्रस्तुत करती है।&lt;br /&gt;यह प्रस्तुति कलात्मक है, यहां अभिव्यक्त दृष्टि आधुनिक कहानी के संदर्भ में विचारों का गद्यांश में टुकड़ा नहीं बनती परन्तु संवेदना सक्षम व्यंजनापूर्ण पाठ की भांति पाठक के बीच में अपनी आत्मीयतापूर्ण उपस्थिति दर्ज करा देती है।&lt;br /&gt;क्षमा जी की कहानियों से गुजरते हुए सहज ही निष्कर्ष लिया जा सकता है कि वे यथार्थ और कल्पना का जहां समन्वय उपस्थित करती है, वहां वह सामाजिक यथार्थ को सकारात्मक कल्पना के धागों से बुनते हुए भविष्य का आकलन जो एक आदर्श में नहीं है परन्तु वस्तुगत विवेचन से एक संभावना हो सकती है, उसे कलात्मक ढंग से लाने का प्रयास करती है।&lt;br /&gt;उनकी कहानियों में जो रोमांस का पुट है वह ह्रासोन्मुख नहीं है, वे प्रगतिशील, कर्मठ अपने अस्तित्व की खोज में संलग्न नारी को चित्रित करने की आकांक्षा में अपनी क्षमता का सदुपयोग करती है, यही कारण है कि उनकी कहानियां प्रचलित मुहावरे में स्त्री की यौनिकता को लेकर जो नारी विमर्श किया जा रहा है और जो महिला कथाकार चर्चित हो जाती है, उनसे अलग अपनी एक पहचान बनाने में समर्थ हैं।&lt;br /&gt;क्षमाजी मानती हैं कि वर्तमान जीवन यथार्थ बहुत जटिल है और जिस रूप में नारी को आप मीडिया के द्वारा रचनाकर्मियों के द्वारा, फिल्मों के द्वारा प्रस्तुत किया जा रहा है, वह नारी एक निष्क्रिय पतनशील रोमांसवाद की देन है, यहां कल्पना के द्वारा नारी को जितना अनावृत करते हुए उसे मात्र एक बाजार की वस्तु बना दिया जाय, जो आज का प्रचलित मुहावरा है, उसे वे महत्वपूर्ण नहीं मानती है, वे इस जटिल जीवन यथार्थ में अपनी कहानी के माध्यम से नारी के जीवन यथार्थ को उसके जीवंत परिप्रेक्ष्य में अपनी संवेदना से उकेरने का प्रयास करती हैं और उससे प्रतिशील रोमांसवाद जहां कल्पना एक बेहतर दुनियां का सपना देखती है, चाहे स्त्री कामकाजी महिला हो। उनका कथा संसार, आज के सामाजिक यथार्थ की उपज है। वे पाठक से अतिरिक्त कोई मांग नहीं रखती है, उनका पाठक उनकी कहानी के आंतरिक सौंदर्य से सहज ही जुड़ जाता है, वे कहानी के मर्म को अपने पाठक तक पहुंचाने े लिए जिस संवेदना की आवश्यकता होती है, वह उनकी पूँजी है। अपनी कहानी यात्रा के प्रारंभ से ही वे हिन्दी साहित्य की लगभग सभी पत्रिकाओं से तथा भारत की सभी&amp;nbsp; व्यवसायिक पत्रिकाओं में एक साथ प्रकाशित होती रही है।&lt;br /&gt;गत तीस वर्षों से इतने बड़े परिप्रेक्ष्य में किसी रचनाक्रम को रचना धर्मिता प्राप्त होना विरल है। हिन्दी आलोचना का यह एक गौण पक्ष बन गयाहै कि जो साहित्य पाठकों से दूर हो चला है, उसकी आलोचना अधिक मुखर है। जिस प्रकार से समाज में सांप्रदायिकता कुविचार&amp;nbsp; फैलाती है, उसी प्रकार आलोचना भी एक विशेष आग्रह में अपने ही&amp;nbsp;&amp;nbsp; वर्ण, अपने ही समुदाय, अपने ही वर्ग में प्रेषित होती देखी गई है।&lt;br /&gt;उनकी ‘स्वयंसिद्धा’ कहानी मध्यवर्ग की नायिका की कहानी है जो अपने पाँव पर खड़ी है,। शिक्षा ने उसे एक आधार दिया है। प्रेम विवाह के बाद पति के गलत आचरण पर वह कुछ दिनों के लिए अपनी मां के पास आती है और वह वहां यह पाती है कि जीवन एक खेल है और उसकी भूमिका एक खिलाड़ी की है और उसे इस विषम परिस्थिति में स्वयं ही निर्णय लेना है और माता-पिता के पास जहां वह एक रास्ता तलाशने आई थी, वहां से वापिस अपने घर लौट जाती है। वह यह निष्कर्ष अपने पाठकों को सौंपती है कि स्वयं के सुख-दुःख स्वयं के ही हैं और ”नीत्शे“ की अमरवाणी की दूसरा नर्क है इस सोच को अपने अपने पाठकों तक पहुंचाती है।&lt;br /&gt;यहां स्त्री अपने पूर्ण उत्तरदायित्व के साथ खड़ी दिखाई देती &lt;br /&gt;गृहिणी हांे ,निरक्षर खेतिहर मजदूर हो, विभिन्न आर्थिक, सामाजिक दबावों से पीड़ित जूझती संघर्षशील महिला हो, वे उसकी इस उद्यम जीजिविषा को रेखांकित करने का प्रयास करती है।&lt;br /&gt;इसीलिए उनकी कहानियों में व्यक्तिगत या सामाजिक जीवन में एक बेहतर जीवन की संभावना निहित रहती है।&lt;br /&gt;वे अपनी कहानियों के माध्यम से आज के इस प्रचलित मुहावरे को जहां एक पतनशील रोमांस के जरिए स्त्री को उसके स्वाभिमान, गरिमा और समाज एवं परिवार में स्थान पाने की उसकी जो ललक है, उसे रोकते हुए स्त्री के संघर्ष को मात्र यौन स्वतंत्रता में परिवर्तित करने की जो बाजारवादी परंपरा है उसका विरोध है।&lt;br /&gt;उनका सामाजिक जीवन दर्शन, भारतीय आध्यात्म के इस दुनियादी सूत्र को साथ लेकर चलता है कि यथार्थ वाद व्यक्ति के विकास में बाधक नहीं है, उनके उपन्यास, अपराजिता की नायिका का व्यक्तित्व विकास जिस रूप में चित्रित हुआ है, वहां एक नारी संघर्षशील, श्रमशील महिला को चित्रित करती है।&lt;br /&gt;उनके कथा साहित्य का मूल स्वर यही है कि वे मानकर चलती हैं कि व्यक्ति से उसका व्यक्तित्व और उसकी सामाजिक उपादेयता अविच्छिन्न है। एक बेहतर समाज तभी बन सकता है कि जब बेहतर इन्सान हो। यही कारण है कि उनके पात्र जीवन जगत के उस रूप को ग्रहण करते हैं जहां संघर्ष हैं, गरिमामय प्राणवान सामयिक दायको समर्पित जीवन है, पलायन नहीं है। सामर्थ का दुरूपयोग नहीं है। पात्र जीवन संघर्षों में कभी&amp;nbsp; हारते हैं, कभी जीतते हैं, परन्तु विवेक का अनादर नहीं करते। इसीलिए उनका कथा-साहित्य प्रचलित मुहावरे में भी&amp;nbsp; आज के इस आधुनिक कहानी के दौर में भी अपने उपस्थित रखता है।&lt;br /&gt;क्षमा जी की कहानियां समय की गतिशीलता से उपजी कहानियां&amp;nbsp; हैं।इनमें समाज की गतिशीलता, परिवर्तन का आकलन किया जा सकता है। वे अपनी कहानियों में आज के समय को जहां अपनी संवेदना के आधार पर चित्रित करने का प्रयास करती है, वहीं वे भविष्य के आकलन की ओर भी दृष्टि रखती हैं।&lt;br /&gt;इस ‘एहसास’ कहानी में बिखरते परिवार को विवेक के आधार पर जीवन-जगत् में जीने के रास्ते की दृष्टि की खोज कहा जा सकता है। यहां वर्तमान तो है पर वह किस भविष्य की ओर ले जा रहा है, वह महत्वपूर्ण है।&lt;br /&gt;भविष्य की निर्मिति विवेकदृष्टि करती है।&lt;br /&gt;इन कहानियों में जिस भविष्य का सपना है वह निश्चिेष्ट रोमांसवाद नहीं है, यहां नकारात्म्कता नहीं है, यहां मनुष्यता का सही चेहरा तलाशने का प्रयास है। बाजारवाद और भूमंडली राग के इस दौर में स्त्री के स्वयं के वरण और उत्तरदायित्व की खोज उनकी कहानियों का आधार है।&lt;br /&gt;‘उपहार’ कहानी मंे एक प्रौढ़ महिला की परिस्थिति के दबाव में विदेश में रहते हुए अपनी और अपने परिवार की सम्मानजनक स्थिति बनाए रखने का प्रयास है, किस प्रकार श्रमशील महिला अपने पािश्रम से , परिवार को सम्मानजनक स्थान दिलाती है उसकी यह कहानी आधार भूमि है।&lt;br /&gt;जिस आयु में महिलाएं संस्थागत धर्म के दायरे में आकर परलोक सुधारने के लिए श्रम की अवहेलना कर देती है वहां श्रम और संघर्ष हर महिला को हर आयु में सम्मान दिला सकता है वह यहां विवेच्य है।&lt;br /&gt;क्षमाजी की कहानियों की रचना प्रक्रिया की यह एक अलग विशेषता है कि वह केन्द्र में नारीमन पर पड़ने वाले सूक्ष्मतम मनोजगत के दायरों ं को, जहाँ प्रस्तुत करती है, वहीं वे मूल कथा सूत्र के साथ उन अवांतर प्रश्नों को भी जो मुख्य कथा को महत्वपूर्ण बनाते हैं, उठाती रहती हैं। उनके कथा शिल्प की यह मुख्य विशेषता है कि वे अपने कथा सूत्र का एक केन्द्र बिन्दु बनाकर एक वृत्त बना लेती है जिसका कि रेडियस उनके पास है और उस वृत्त में वे मुख्य प्रश्न से जुड़े अवांतर प्रश्नों को भी ले आती है।&lt;br /&gt;‘मुखौटा’ कहानी में जहाँ कहानी के पात्र निम्न वर्ग और उच्च वर्ग में आवाजाही करते हैं, वहाँ उच्च वर्ग की महिलाओं में जो कृत्रिम जीवन मीडिया प्रबंधन से सामजिक श्रेष्ठता बना लेता है, उसे रेशे रेशे का खोलते जाने का यथार्थ चित्रण है। किस प्रकार ईमानदारी कलंकित होती है और बेईमानी पुरस्कृत होती है, इस प्रश्न को अवांतर प्रश्नों के साथ यहाँ नियोजित किया गया है।&lt;br /&gt;उनकी कहानियों का शिल्प उस रंगीन बुनी हुई चादर की भांति है जिसे आप ताने-बाने के साथ अलग-अलग करते हुए विवेचित नहीं कर सकते। चादर की सुंदरता उस ताने-बाने की बुनाई के शिल्प से दिखाई पड़ती है जो अपने आपको दूसरी चादर से अलग कर लेती है।&lt;br /&gt;सामजिक सौद्देश्यता क्षमाजी की कहानियों की पँूजी है, वे एक ही तरह से जीवन और जगत को देखे जाने वाली विचार प्रक्रिया को अस्वीकार करती हैं। वे मानकर चलती हैं कि समाज निरंतर परिवर्तनशील है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परंपरागत, सामाजिक रूढ़ियों से यहाँ मुक्ति है और यही वास्तविक स्वतंत्रता है, निर्णय की स्वतंत्रता ही वास्तविक स्वतंत्रता है।&lt;br /&gt;‘अजनबी’ कहानी एक कामकाजी महिला की कहानी है, जहां पर रिश्ते आर्थिक आधार प्राप्त होने के बाद भी नीरस होने लगते हैं। बाजारवाद ने किस प्रकार चुपचाप आकर पारिवारिक रिश्तों में यह दरार डाल दी है कि पति पत्नी दोनों अपना आर्थिक आधार मजबूत होते हुए भी अपने ही परिवार में दूरियां बनाने लग जाते हैं।&lt;br /&gt;क्षमाजी की कहानियाँ प्रचलित मुहावरे में न तो स्त्रीवादी कहानियाँ है ना स्त्री विमर्श की, ये आज के समाज में जो परिवार में ग्रंथियाँ बन रहीं है, बच्चों के मन में भी अपनी कामकाजी माँ के प्रति जो आत्मीयता का स्वर सूखता जा रहा है उन सभी संदर्भों को एक जीवंत परिवेश में&amp;nbsp; उनकी कहानियों मेंदर्शाया गया है।&lt;br /&gt;दूर से दिखाई पड़ता है कि परिवार सुखी सम्पन्न है, दूर से एक ऐसा संसार दिखाई पड़ता है जहां लगाव है, परन्तु कहानी की यात्रा उस जगह खींचकर ले जाती है, जहाँ मध्यवर्गीय पारिवारिक जीवन खोखला दिखाई देने लगता है। यहाँ आने पर जिस शिक्षा को स्त्री की अस्मिता के लिए क्षमा जी ने अपनी कहानियों में एक आवश्यक मूल्य बताया था। रोजगार को एक संबल बताया था। इस कहानी में आकर स्त्री मन और स्त्री पीड़ा की एक नई व्याख्या मिलती है। जहां शिक्षित और आर्थिक संपन्न नारी भी अपने ही परिवार में अजनबी की भांति रह जाती है, आखिर क्यों? धीरे धीरे&amp;nbsp; इस उपभोक्तावाद ने मनुष्य को एक चेतना सम्पन्न व्यक्ति से एक वस्तु में बदल दिया हैं? यह कहानी एक कामकाजी महिला की परिवार में बिखरती हुई पीड़ा की कहानी है।&lt;br /&gt;‘समानांतर’ कहानी का परिप्रेक्ष निम्न वर्ग की दुनियां है जहाँ अजनबीं कहानी में उच्च मध्यवर्ग पर बढ़ता बाजारवाद रिश्तों को बिखराव की सीमा तक ले आता है, वहीं निम्न वर्ग में बाजारवाद किस प्रकार से उनकी पारिवारिक दुनियां को तोड़ने का प्रयास करता है।&lt;br /&gt;निम्न वर्ग की पहचान है कि वहाँ स्त्री अपने श्रम की बदौलत अपना परिवार चलाती है, निम्न वर्ग में यह विरोधाभास है कि स्त्री भले ही शरीर से दुर्बल हो परन्तु उसकी क्षमता और असंभव परिस्थिति में भी जूंझने की ताकत उसमें अधिक है, इस यथार्थ को संवेदित करती .हुई कहनी . किश्तों में लाये टी.वी. के विवाद को लेकर जन्मती है और पति के भीतर इस अंतद्र्वन्द के साथ वह अब इस प्रकार के अनावश्यक कुचक्र में नहीं फंसेगा पुनः एक सहयात्री रूप में अपने आपको पाता है।&lt;br /&gt;‘एहसास’ कहानी का ताना-बाना उस मध्यवर्ग की नारी की कथा है, यहां भू-मंडलीकरण का जो दबाव है वह अदृश्य में पात्रों के मानसिक जगत में झांकता है। उच्च पदों पर कार्यरत स्त्री-पुरुष के बीच में आकर्षण व यौन-नैतिकता के प्रश्न को इस कहानी में उठाया गया है। दोनों पति पत्नी उच्च पदस्थ हैं, पति के भीतर अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति में पर स्त्री के आकर्षण से व्यथित पत्नी जब विदेश यात्रा में अपने आपको भी उसी मानसिकता में पाती है तब उसे अहसास होता है कि मानवीय दुर्बलता के क्षण आकस्मिक रूप से कभी भी घट सकते हैं, उस अंधकार को काटने की जो क्षमता है वह हर व्यक्ति के पास है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्षमाजी&amp;nbsp; परंपरा के दायरे को स्वीकार करते हुए मनुष्यता को अपनी कहानियों की बड़ी पूँजी मानती हैं।&lt;br /&gt;वे नए की खोज में कल्पना से, फंेटेसी से नए सामाजिक घटना वितान को पैदा नहीं करतीं। जहाँ कहानी में&amp;nbsp; अचानक थोपा हुआ वस्तुजगत कल्पना के साथ आभासीय यथार्थवाद को पैदा करता है, वहीं क्षमा जी के कथा संसार में&amp;nbsp; उनका समाज&amp;nbsp; ही उनका परिप्रेक्ष्य है, उनके पात्र उनकी कहानियों में आवाजाही करते हैं। वे अपने पात्रों के जरिए उस कहानी के रचना संसार को प्रतिबिंबित करती है जो अपना ही समाज है,जो उच्चतर मनुष्यता की लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-3423184361625148247?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/3423184361625148247/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=3423184361625148247&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/3423184361625148247'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/3423184361625148247'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title=''/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-2552156675093189755</id><published>2009-08-29T21:39:00.000+05:30</published><updated>2009-08-29T21:39:42.381+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;b&gt;&amp;nbsp;हम&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;अचानक ही वह पत्थर पेड़ पर आ गिरा था&lt;br /&gt;ठहरे हुए पक्षी&lt;br /&gt;जगे, फड़फड़ाए, उठे, उड़े....उड़ गए,&lt;br /&gt;कहांँ, ... यह पता किसको था!&lt;br /&gt;याद रहा इतना&lt;br /&gt;आकाश है, जगह देगा, लौटकर फिर&lt;br /&gt;इसी पेड़ पर आना है&lt;br /&gt;पर न जाने क्यों&lt;br /&gt;कितने पत्थर रोज आ गिरते हैं।&lt;br /&gt;सड़क पर फटेहाल लड़की को, न जाने कितने गि(&lt;br /&gt;आंखों&amp;nbsp; पर उठाए&lt;br /&gt;रोज तीर से मिलते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल तक भूख की &lt;br /&gt;तेरी मेरी उसकी&lt;br /&gt;बात वह करता था&lt;br /&gt;नुक्कड नाटक में शहीद बन बिखरता था&lt;br /&gt;कुरते और पजामे का रख नहीं पाता हिसाब था&lt;br /&gt;अचानक कल मिला,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करोड़ों की बातें लिए&lt;br /&gt;हंँसता मुस्कराया&lt;br /&gt;देश, धरती, जन अचानक सैकड़ों शब्द लिए&lt;br /&gt;भारी से भारी&lt;br /&gt;शब्द शोर में बदल&lt;br /&gt;शोर, नोट में बदल&lt;br /&gt;वह जेब भरता,&lt;br /&gt;यही कहता फिरता था &lt;br /&gt;लोकतंत्र का सच &lt;br /&gt;राम का नाम है,&lt;br /&gt;नाम की लूट है,लूट ही सच है,&lt;br /&gt;जितने भी जाना है,उसे ही सुख पाना है।&lt;br /&gt;हर कोई दूसरा&lt;br /&gt;हाथ में पत्थरलिए&lt;br /&gt;सोचता सुबह शाम वह क्यों न कर पाया सह सब&lt;br /&gt;उसका भी कुरता उतना ही मैला और था काला...।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहता शनीचर&lt;br /&gt;राहू-केतू साथ तेरे अब कहां है&lt;br /&gt;यह धरती&lt;br /&gt;लुटने को बनी है&lt;br /&gt;&amp;nbsp;जो भी यहां आया, लूट ही तो गया है,&lt;br /&gt;लुट जाने का भय&lt;br /&gt;सब छोड़ ले लंगोटी&lt;br /&gt;तभी हिमालय पर गया है&lt;br /&gt;कहता रहा वह&lt;br /&gt;है नहीं अब पास कुछ &lt;br /&gt;क्या कोई लेगा&lt;br /&gt;पर लंगोटी में भी कोई आकर&lt;br /&gt;यहाँं&amp;nbsp; भी लूट सकता&lt;br /&gt;यह छिपा सच यहाँं सबसे बड़ा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गिरते हैं पत्थर अब &lt;br /&gt;और धूमकेतु उल्का भी&lt;br /&gt;उनसे भी तेज, और तेज&lt;br /&gt;टी.वी. के चैनल&lt;br /&gt;नहीं कोई ठहर पाता&lt;br /&gt;कितनी चिकनी यह सतह है&lt;br /&gt;नहीं जल&lt;br /&gt;अब जरा भिगो पाता&lt;br /&gt;भीतर रखा था वह &lt;br /&gt;स्निग्ध कोमल&lt;br /&gt;छंद तुम्हारा ही, तुमने जो पाया था&lt;br /&gt;अचानक शीत पाकर&lt;br /&gt;पछुआ हवा सेबर्फ सा हो गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताप कहांँ&lt;br /&gt;कहां है तपन...&lt;br /&gt;चर्चा ही व्यर्थ है&lt;br /&gt;बाहर के देवता&lt;br /&gt;पाषाण बन पुजे जो...&lt;br /&gt;इतना आदर पा&lt;br /&gt;अब भीतर ही जमे हैं...&lt;br /&gt;भीतर का छंद&lt;br /&gt;सजीला सुरभित, चुपचाप बाहर निकल&lt;br /&gt;मंदिर में कबसे पूजित हुआ है&lt;br /&gt;और हम,&lt;br /&gt;हत भागी!&lt;br /&gt;नहीं-नहीं प्रभु परसादी&lt;br /&gt;पत्थरों के टोल से फिकते-फिकवाते&lt;br /&gt;हाथ दूसरे के कबसे,&amp;nbsp; कसे से रखे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-2552156675093189755?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/2552156675093189755/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=2552156675093189755&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/2552156675093189755'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/2552156675093189755'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='कविता'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-7233152434141257549</id><published>2009-07-28T16:41:00.000+05:30</published><updated>2009-07-28T16:41:52.405+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;इतिहास के मध्य से&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;देह को तोड़कर गुज़रती जा रही हैं&lt;br /&gt;बर्फीली हवाएँ&lt;br /&gt;कहाँ तक रुकें अब और&lt;br /&gt;अब तो खड़ा भी नहीं हुआ जाता है&lt;br /&gt;न जाने उनने कब&lt;br /&gt;देह में रोपे थे बीज&lt;br /&gt;कि आग बुझती चली गयीं&lt;br /&gt;मट्ठियाँ ऐसी तनी&lt;br /&gt;खुली नहीं&lt;br /&gt;बस जड़ रह गयीं&lt;br /&gt;वाह रे&lt;br /&gt;कैसा उड़ा गुलाल&lt;br /&gt;बदलाव लाने की जगह&lt;br /&gt;पालागन हो गया&lt;br /&gt;ओ रे मन&lt;br /&gt;कब आया था वसन्त तुम में&lt;br /&gt;कुछ याद है&lt;br /&gt;कब तुमने मिटने मिटाने की कसम खाई थी&lt;br /&gt;कितने अच्छे थे वे दिन&lt;br /&gt;अब तो सपने भी नहीं आते हैं&lt;br /&gt;कि हमने कभी ऐसे सपने भी देखे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;देह राग&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इस बीहड़ वन में कहीं तुमने &lt;br /&gt;पलाश जलता देखा है&lt;br /&gt;जब कि लोग कहते हैं&lt;br /&gt;जंगल&amp;nbsp; कटने का वक्त आया है&lt;br /&gt;अब इस मौसम में&lt;br /&gt;चुप रहने की आदत हो गई है&lt;br /&gt;कैक्टस गुलाब लगता है&lt;br /&gt;निज मन पराए रूमाल में लिपटा&lt;br /&gt;प्राणायाम कर रहा है।&lt;br /&gt;क्या तुम पर भी&lt;br /&gt;ऐसा हादसा कभी गुज़रा है&lt;br /&gt;तुम्हारे जिस्म में पलाश वन&lt;br /&gt;अचानक उग आया है&lt;br /&gt;और जल रहा है &lt;br /&gt;तब तुम्हारे पास से शायद &lt;br /&gt;पतझड़ गुजरा होगा अचानक&lt;br /&gt;पालकी में बैठकर&lt;br /&gt;हंसता हुआ &lt;br /&gt;कह गया होगा&lt;br /&gt;देखो इस बीहड़ वन में भी पलाश जल रहा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब झाड़ियाँ&lt;br /&gt;तालियाँ बजाकर हँस रही हांेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-7233152434141257549?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/7233152434141257549/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=7233152434141257549&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/7233152434141257549'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/7233152434141257549'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/07/blog-post_28.html' title='कविता'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-1530174404130775111</id><published>2009-07-21T21:45:00.000+05:30</published><updated>2009-07-21T21:45:00.731+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आग       नाटक'/><title type='text'>आग       नाटक</title><content type='html'>&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif; font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;आग&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आग का क्या&lt;br /&gt;न उसकी कोई जाति होती है........ न मत।&lt;br /&gt;उसका काम बस जलाना है &lt;br /&gt;और हल्की हवा का सहारा पाते ही&lt;br /&gt;भभक जाना है&lt;br /&gt;क्या सचमुच तुम्हें आग की तलाश है&lt;br /&gt;तभी तो मुर्दाघर में&lt;br /&gt;दबे पाँव घूम रहे हो&lt;br /&gt;हाँ यह सच है&lt;br /&gt;यहाँ लोग भी रहते हैं&lt;br /&gt;जो हंसते हैत्र् गाते हंै लड़ते हंै झगड़ते हैं&lt;br /&gt;और कभी कभी प्यार भी करतें हैं &lt;br /&gt;इन खिलौनों के लिए&lt;br /&gt;आग, पानी, हवा, और बर्फ&lt;br /&gt;कहीं कोई भेद नहीं है&lt;br /&gt;तभी तो&lt;br /&gt;कई शताब्दियों से&lt;br /&gt;अतीत या़त्रा के सुनहरे संवाद दोहरा रहे हैं&lt;br /&gt;क्या अभी भी&lt;br /&gt;तुम्हें आग की जरूरत है&lt;br /&gt;जब कि वह लाइटर में रखी हुयी&lt;br /&gt;खुले बाजार मिल रही है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;नाटक&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;क्या अभी भी तुम्हें&lt;br /&gt;फिर नए नाटक की तलाश है&lt;br /&gt;तुम्हारा यह पुता हुआ चेहरा&lt;br /&gt;हाय&lt;br /&gt;हमारी ही चुराई सेलखड़ी से सजा हुआ&lt;br /&gt;पहचान लिया गया है&lt;br /&gt;अंधों की भीड में,&lt;br /&gt;हाँ, तुम्ही तो थे&lt;br /&gt;ले गए थे चुराकर&lt;br /&gt;उनकी अबोध आखें&lt;br /&gt;नाटक के पहले ही दौर में&lt;br /&gt;कितना सुखद है नाटक&lt;br /&gt;नायक खलनायक&lt;br /&gt;तुम्हारे ही चेहरे की अलग अलग भूमिकाएँ&lt;br /&gt;और हम अकेले&lt;br /&gt;हर बार &lt;br /&gt;तटस्थ मूक दर्शक&lt;br /&gt;और इस नाटक का&lt;br /&gt;अंतिम दृश्य&lt;br /&gt;क्या होगा, कब होगा&lt;br /&gt;सबको है तलाश &lt;br /&gt;और तुम सचमुच&lt;br /&gt;कितने हो होशियार&lt;br /&gt;पहला ही दृश्य&lt;br /&gt;हर बार दोहरा रहे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-1530174404130775111?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/1530174404130775111/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=1530174404130775111&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/1530174404130775111'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/1530174404130775111'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/07/blog-post_9621.html' title='आग       नाटक'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-41411778155564131</id><published>2009-07-21T21:41:00.002+05:30</published><updated>2009-07-21T21:41:52.698+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वर्षा'/><title type='text'>वर्षा</title><content type='html'>&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif; font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;वर्षा&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;क्या नहीं होता वहां&lt;br /&gt;वर्षान्त कीचड़ और कमल&lt;br /&gt;लगते हैं एक ही,&lt;br /&gt;हवाएँ जो कभी होती हैं मुखर&lt;br /&gt;या तो मुंह फुलाए&lt;br /&gt;जाती हैं दुबक किसी कोने में जाकर या&lt;br /&gt;बाल बिखराए कलह कर देती हंै।&lt;br /&gt;कभी कभी&lt;br /&gt;चाहती महकना सुगंध सी&lt;br /&gt;आरती में रहकर।&lt;br /&gt;पुजारी और जुआरी&lt;br /&gt;एक ही हुजूम में&lt;br /&gt;प्रभु दरवाजे रहते सिमटना,&lt;br /&gt;पर पट रहे बंद&lt;br /&gt;लड़ते पुजारी और उसके वंशज&lt;br /&gt;दर्शक तिरस्कृत से&lt;br /&gt;धक्के खाते, धकियाते&lt;br /&gt;सुना यही जाता है&lt;br /&gt;इस मौसम में छाता सचमुच जरूरी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-41411778155564131?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/41411778155564131/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=41411778155564131&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/41411778155564131'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/41411778155564131'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/07/blog-post_21.html' title='वर्षा'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-7527703953727693373</id><published>2009-07-16T22:02:00.000+05:30</published><updated>2009-07-16T22:02:50.754+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आत्मसम्मान कैसे बढा़एॅ'/><title type='text'>आत्मसम्मान कैसे बढा़एॅ</title><content type='html'>&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif; font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;आत्मसम्मान कैसे बढा़एॅं&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;शब्द आत्मसम्मान... आत्म गौरव, अस्मिता महत्व पूर्ण शब्द हैं।यह ‘आत्म’ है क्या? जिसको लेकर हम चिंतित हो जाते हैं।&lt;br /&gt;सामान्य जन के सामने, राज्य का सामान्य सा कर्मचारी जिस प्रकार दंभ व अंहकार से गरजता है, और वह ‘जन’ अपने कार्य के प्रति जिस प्रकार गिड़गिड़ाता है, वह दृश्य भीतर तक झकझोर&amp;nbsp; जाता है।हमारा आत्म क्या है?यह सवाल हमेशा अधूरा ही रह जाता हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वही कर्मचारी जब अपने उच्चाधिकारी या राजनेता के सामने खड़ा होता हैै तो सीधा ही खड़ा नहीं हो पाता है।उसका रिरियाता चेहरा तथा अदने से राजनेता के&amp;nbsp; सामने जी हुजूरी करता हुआ वही कर्मचारी हास्यास्पद बन जाजा है। हम अपनी भाषा, अपनी गरिमा अपना स्वत्व सब खो बैठे हैं। न चेहरे पर अपनी प्रतिष्ठा का भाव है, न गरिमा है, आखिर हम हैं क्या? साधारण सी प्रतिकूलता के प्रभाव को हम बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। हल्के से ताप से, मौम के पुतले की तरह पिघल जाते हैं।&amp;nbsp; हमारी फिल्मों के नायक,या तो परिस्थितियों के सामने भय से भागते रहते हैं,या तुरंत किसी मन्दिर,दरगाह,या चर्च में चले जाते हैं, या हिंसा का अतिरंजित सहारा लेंते हैं।क्या वे हमारे सही स्वरूप को चित्रित नहीं कर रहे हैं?क्या हम वास्तव में उनसे अलग हैं?यह विचारणीय प्रश्न है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर हम हैं क्या?हमारा आत्म क्या है?यह सवाल हमेशा ही पूछा जाता रहा&amp;nbsp; है।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;विदेशी राजनीतिज्ञ जब हमारे यहां आते हैं,... तब उनके सम्मान में हम जिस तरह कालीन की तरह बिछ जाते हैं,...‘‘ हम कहते हैं पधारो म्हारे देश’... पर जब हम विदेशजाते हैं, हम कहीं भी .इस जी हुजूरी की आॅंख अपने प्रति नहीं पाते हैं... मानवीय&amp;nbsp; गरिमा का भाव अवश्य दिखाई पड़ता है।&lt;br /&gt;क्यों?&amp;nbsp; हम अपने को ही कभी सम्मान से नहीं देखते। जब हम अपने प्रति ही सम्मान नहीं रखते हैं, तब कौन हमारे प्रति सम्मान रखेगा।&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;हमारे संत महात्मा एक ही बात कहते हैं ‘ मो सौ कौन कुटिल खल कामी।’’हम स्वयं न तो कभी अपना सम्मान कर पाते हैं,न हीं इसी कारण अपनी योग्यता को प्रदर्शित कर पाते हैं।आजकल हर साक्षात्कार में पहला सवाल यही पूछा जाता है, आप में ऐसी कौन सी योग्यता है जो आपका इस पद के लिए चयन किया जाए? हम यहाॅं इस सवाल का ही उत्तर तलाश करने का प्रयास करेंगे।&lt;br /&gt;अपनी पहचान स्थापित करें&lt;br /&gt;आत्म सम्मान की पहली स्थिति होती है, आप अपनी पहचान स्थापित करें, तथा फिर उसे एक मूल्य भी दें। आप क्या हैं? क्या चीज हैं, क्या आपका स्वरूप है, क्या आपकी पहचान है, और उसे आप किस प्रकार दूसरों को बता सकते हैं।जिस व्यक्ति का, जिस समाज का, जिस देश का स्वाभिमान खो जाता है, वह कभी विकास के पथ पर आगे बढ़ नहीं सकता, वह कभी उत्कर्ष को पा नहीं सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;‘स्वाभिमान... यह व्यक्ति की समाज की अन्तर्निहित शक्ति है जोे कुछ मूल्यों के साथ जुड़ जाती है। महाराणा प्रताप और जयपुर नरेश मानसिंह के बीच यही दूरी हे। आत्म विश्वास दोनों के पास है, पर घास की रोटी खाने वाला प्रताप सामान्य जन का आराध्यदेव बन गया। वह ‘स्वाभिमान’का मानवीकरण है। भारत के राष्ट्रपति अब्दुल कलाम में जो चारित्रिक गुण सहज सबका ध्यान आकर्षितकरता है, वह उनका स्वाभिमान है,उनका आत्म विश्वास हैै।, कठोर परिश्रम के साथ ,आधुनिक तकनीक और प्रबन्धन के मूल्यों को लेकर... भारत को शक्ति संपन्न बनाने की उनकी परिकल्पना आधुनिक भारतीय का सपना हैै। आज भारत में ‘विज्ञान शिक्षा’ का प्रचार व प्रसार उनका लक्ष्य है, वे निरंतर विद्यार्थी जगत से जुड़े हुए हैं।आत्म सम्मान, वह शक्ति है, जहां ‘आत्म’ विस्मृति के गहरे&amp;nbsp; अंधकार से बाहर आकर, कुछ मूल्यों को अंगीकृत करना है। वे मूल्य उसके, आचरण की सुगंध बन जाते हैं। अपनी योग्यता का सही आकलन होता रहना चाहिए,हर काम हम नहीं कर सकते,हर विषय का हमें ज्ञान नहीं हो सकता,पर जो हमें आता है, जिसमें हमारी रुचि है,उसका हमारा ज्ञान निरंतर बढ़ता रहे ,यह प्रयास होना चाहिए।उससे जो गुण पैदा होंगे वे आपकी पहचान बनाएंगे।वे आपको आदर दिलाएंगे। वही आपका जिसे ‘आत्म ’कहा जाता है,उसे बनाएंगे।यह जो हमारा ‘आत्म है निरंतर बदलता रहता है,और हम इसके लिए जिम्मेदार भ्ी हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह अहंकार नहीं है&lt;br /&gt;उस दिन मैंने सुना, कहा जा रहा था, ‘इंसान संसार को जीत सकता है, पर अपने आपको नहीं...’ यह .आपा बहुत ही खतरनाक है।हम यहाॅं किसी प्रकार की लड़ाई की बात नहीं कर रह हैंे।,हम अपने आपको निरंतर अच्छा बना सकते हैं,यह एक सत्य है।&lt;br /&gt;एक पुरानी घटना है--मैं तब सरकारी कार्य से राजधानी गया हुआ था।&lt;br /&gt;क्षेत्र के मंत्री जी से अच्छे सम्पर्क थे। वे बोले,‘सुबह आपको मुख्यमंत्री जी के यहां ले चलेंगे,... तैयार रहना, पांच बजे वे पूजा से उठ जाते हैं,... उनका अशीर्वाद लेना है।’&lt;br /&gt;मैंने कहा, मैं चल नहीं पाऊंगा, आप हो आएं।&lt;br /&gt;वे नहीं माने, बहुत प्रेम करते थे, सुबह तैयार होकर जाना पड़ा।वहां पहुंचे तो पाया, एक कार पहले से खड़ी है।&lt;br /&gt;वे तेजी से अंदर चले, मैंने भी अपने कदम बढ़ाए..&lt;br /&gt;पर...वहां देखकर चैंक गया...&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री जी अपने पूजा घर से बाहर निकले ही थे कि&amp;nbsp; एक तत्कालीन&amp;nbsp; जिला कलैक्टर वहां .साष्टांग दंडवत किए पड़े थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे लिए यह दृश्य विस्मय कारक था। ‘क्या हम अपने पिता के प्रति भी इतना आदररखते हैं’?&lt;br /&gt;शायद नहीं, कहा जाता है काम पड़े तो गधे को भी बाप बना लेना चाहिए। संभवतः यही प्रथा... हमें हमेशा अपने ‘गाॅड फादर’ को तलाश करने को बाध्य करती है। हम अपना ‘स्वत्व’ खोते चले जा रहे हैं।&lt;br /&gt;यह बात दूसरी है कि हमने पाया ही कब था?&lt;br /&gt;स्वतंत्रता की प्राप्ति, तथा स्वाभिमान की प्राप्ति दो अलग-अलग उपलब्धियां हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पुनः हम ‘लोकतंत्र’ को ‘जंगली राज’ में बदलते हुए भीड़तंत्रको अपनाते चले जा रहे हैे।किसी भी सामाजिक कार्यक्रम में आप चले जा.एं,. बूढ़े कार्यकर्ता भी युवा नेता के चरण स्पर्श करते देखे जा सकते हैं। क्या यह चरण पूजा जो टैलीविजन पर हर राजनैतिक कार्यक्रम के कवरेज में सहज ही दिखाई पड़ जाती है ,क्या यह हमारी पहचान नहीं बन गई हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या खोया क्या पाया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्यों? क्या खो गया है... जो मिल जाएगा?&lt;br /&gt;ब्रिटिश राज में जो खोया था... वह अभी तक हम नहीं जान पाए। मुगल काल में स्वाभिमान नहीं खोया था... कारण था,... उस काल में आर्थिक, सामाजिक व्यवस्था में भारी भेद नहीं था। राजा और बादशाह का सामाजिक स्तर व सुविधाएं बराबर की थीें। मनसबदारों में भेद, घोड़े व सेना रखने का था.. जिससे बादशाह के यहां बैठने का स्थान निर्धारित होता था। परन्तु ब्रितानी शासन में , जहां भाषा-भेद बढ़ा, ब्रिटिश राज की नौकरी तथा दयापात्र होने से सुविधाएं बढ़ीं, ... लघु उद्योगों का सर्वनाश होने पर, सामान्य जन की हीनता बढ़ी। वह याचक बनने को मजबूर हो गया। पंडित सुंदरलाल ने ‘भारत में अंग्रेजी राज’, में इस पददलित होती सामाजिक व्यवस्था का यर्थाथ चित्रण किया है। ब्रितानी शासन व सामंती शासन ने मिलकर जो सबसे बड़ा .अहित किया, वह यही कि हमारा स्वाभिमान हमसे छीन लिया।&amp;nbsp; &lt;br /&gt;इसीलिए अगर आप ‘भारतीय सामान्य जन, तथा .योरोपीय. अमरीकी सामान्य जन की तुलना करना चाहें तो यह भेद सहज ही दिखाई पड़ जाता है। भारतीय युवक-युवतियां, आज पश्चिम की ओर जिस तेजी से निष्क्रमणकर रहे हैं, उसके पीछे वहां प्राप्त सुविधाएं ही नहीं हैं, बहाॅं उनके स्वाभिमान की सुरक्षा भी है।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;वे निरंतरव्यवस्थाओं की निर्ममता के दासत्व को अंगीकार किए बिना ही वहां शांति से परिश्रम कर सकते हैं, यह एक कटु सत्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आत्म सम्मान कैसे बढ़ाएॅं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं उस दिन नजदीक के नगर में गया हुआ था, जाना पहले भी हुआ था। शर्मा जी के परिवार में उनका छोटा लड़का दसवीं कक्षा में सामान्य योग्यता के साथ उत्तीर्ण हुआ था। दोनों ही पति-पत्नी चिंतित थे। शहर के सबसे अच्छे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ रहे थे।... बालक बुद्धिमान था... उसके लिए कोचिंग की भी व्यवस्था थी, पर उन्हें सफलता नहीं मिल रही थी। वे निरंतर उसे आगे पढ़ने को प्रोत्साहित कर रहे थे। उनके मोहल्ले के बच्चे आई.आइ्र्र.टी. में आ गए थे.. उनकी भी इच्छा यही थी। पर वे निराश हो चुके थे।वह बालक सबसे कटा हुआ अपने आप में ही खोया रहता था। &lt;br /&gt;&amp;nbsp;मैंने पाया, यह समस्या उनके बच्चे की नहीं थी,.. उनकी अधिक थी। वे अपना कत्र्तव्य कर्म यही मानकर चल रहे थे। मैं, बच्चे से मिला,... वह सुंदर था, मेधावी था... पर उसकी स्कूल में रूचि नहीं थी.. वहां वह निरंतर दबाब में था,.. जो छात्र उससे ज्ञानात्मक उपलब्धियों में आगे थे, ...शिक्षक भी उनकी ओर ही उत्सुक रहते थे। वे योग्यता के चरम शिखर पर थे। परिणामतः इस बालक में जहां आत्म विश्वास की कमी आ गई थी... वहीं इसका स्वाभिमान भी खोने लगा था। वह सामने आने से कतराने लगा था। ... हमेशा सपनों में खोया हुआ,.. अंग्रेजी की कहानियां, उपन्यास पढ़ा करता था। मैं उससे मिला, उसके साथ रहा... उसके सपनों को जगाया... जो सपने देेखते हैं, उनके ही पूरे होते हैं..’ उसकी योग्यता को परखा उसे समझाया। वह स्कूल की व्यवस्था ,वहां के वातावरण सेे स्वयं को काटकर ,एकांत जीवी होकर अपने आप में खोगया़ गया था। मैंने उसे समझाया,‘‘ तुम योग्य हो ,सपने देखते हो ,सपने देखना बुरी बात नहीं है,,जो सपने देखते हैं ,वे ही उन्हें पूरा कर पाते हेैं।’’&lt;br /&gt;उसका भाषा पर अधिकार था,पर गणित में रुचि कम थी।&lt;br /&gt;‘मैंने उससे कहा जो आगे हैं ,वे कई सालों से कोचिंग ले रहे हैं,तुम ने तो खुद मेहनत की है,यह तुम्हारी योग्यता है,तुम अच्छे लेखक बन सकते हो,अपनी भाषा की योग्यता पर गर्व रखो, जो कमी है उसे पूरा करने का प्रयास करो।पता करो तुम्हारी कमियों को तुम कैसे दूर कर सकते हो?ईमानदारी खुद के प्रति रखो,जहाॅं कमी रह गई है शुरुआत वहीं से करो।अपने आप से प्यार करना सीखो,जो अच्छाइयां हैं वे हमारी हैं हमने मेहनत से उन्हें पाया है ।जो कमियां हैं,वे हमारी हैं हमने पूरा प्रयास नहीं किया ।दूसरा कोई जिम्मेदार नहीं है।हम जहां पर हैं ,वहीं से शुरूआत कर सकते हैं।&lt;br /&gt;उसकी सफलता की यात्रा बहुत लंबी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं फिर उसके आग्रह पर उसके नगर में गया था। जब वह ‘अमेरिका अपनी स्नातकोत्तर शिक्षा पूरी करने जा रहा था। &lt;br /&gt;प्रश्न वापिस वहीं आकर खड़ा हो जाता है। हमने क्या खोया है, क्या पाया है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वाभिमान के साथ सबसे सबसे बड़ी समस्या . उसके अहंकार में ढल जाने की है। &lt;br /&gt;अहंकार तभी होता है, जब हम जो नहीं हैं, वह बताते हैं, उस रूप में काल्पनिक. हो जाते हैं। इससे हीनभावना पैदा हो जाती है। मध्यकाल में यही हुआ,... दुश्मन का सामना नहीं कर पाए, पराजित हो गए,. हम कायर थे,अहंकारी थे, इसीलिए गरीब जनता पर वर्ण व्यवस्था के नाम पर अत्याचार करते रहे।. सामंत लोग,&amp;nbsp; पशु-पक्षियों का शिकार कर कहर ढाते रहे। मुगलकालीन-चित्रकला सामंतों की ‘शिकार गाथा का उदाहरण है। इसलिए अहंकार जहां स्वरूप में नकारात्मक है, वहीं स्वाभिमान सकारात्मक है। यह व्यक्तित्व को बडा़ बनाता है।हम अपनी कमजारियों को जानते हैं,छुपाते नहीं हैं,कठोर मेहनत करते हैं,सफलता नहीं भी मिले पर पश्रिम करना नहीं छोड़ते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सही सोचें&lt;br /&gt;विचारणा की प्रक्रिया पर यह होनी चाहिए कि जो सोचा जाए वह हमेशा समग्रता में हो।हमने जो निर्णय लिया है,हम उसका पालन स्वयं करें।&amp;nbsp; एक ही बात को बार-बार नहीं सोचना चाहिए। जब हम जानते हैं जो हम सोच रहे हैं ,यह फालतू की बाते हैं जिनका हमसे कोई सम्बन्ध नहीं हैं।वहां स्वयं पहल कर अपने मन को निर्देश देकर वहां से हटाने का प्रयास करना चाहिए।संक्षेप में यह विचारणा एक सतत निरंतर बनी रहने वाली मन की अवस्था है। हम जहां भी जाते हैं, जो भी क्रिया घटती है, हम बात सुनतेहैं, हमारी इंन्द्रियां जो भी सूचना हमारी ज्ञानेन्द्रियो कों सौंपती हैं हम तत्काल&amp;nbsp; उसकी प्रतिक्रिया करते हैं। और उसे एक पहचान दे देते हैं। फिर बार-बार घंटों उस पर चर्चा करते रहते हैं।इससे हमारा मन अनियंत्रित हो जाता है।उचित यही है,हम अपना निर्णय बनाएं,तत्काल प्रतिक्रिया नहीं दें। कुछ दिन प्रतीक्षा करें,जो निर्णय बाहर से आया है, अगर वह वही है जो हमने सोचा था तो हम अपने भीतर आत्मविश्वास की झलक पाएंगे।हमारी भाषा सही और निश्चयात्मक होने लग जावेगी। इसीलिए सही सोचना ,आत्मविश्वास के मार्ग की पहली सीढ़ी है।. &lt;br /&gt;बच्चों के विकास के साथ, उनके इस ‘आत्म’ की खोज अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। हम जो कुछ उसके परिवेश, समाज, शिक्षा, पारिवारिक पृष्ठभूमि में उसे सौंपेंगे, वह उनके‘आत्म’ का हिस्सा बनता चला जाएगा।&lt;br /&gt;आप पाएंेगे, जो बच्चे... अच्छे समृद्ध शिक्षित परिवार से आते हैं, अच्छे स्कूलों में शिक्षापाते हैं,जहां माता-पिता उन्हें अच्छा वातावरण देते हैं वहां उनका आत्म सम्मान बढ़ा हुआ मिलता है वहीं उनमें स्वाभिमान भी होता है।हमें चाहिए बच्चों को अच्छी शिक्षा दें,वैज्ञानिक सोच दें।बचपन में&amp;nbsp; उन्हें जितना सांप्रदायिक विचारधारा से बचाया जाए उतना ही अच्छा है।जिन सवालों का उत्तर हम नहीं दे पाते हैं,उन्हे ईश्वर पर छोड़कर,बच्चों की जिज्ञासा पर ताला लगाना उचित नहीं हैं। स्वयं अंधविश्वास रखना, भाग्य भरोसे रहना तथा अनावश्यक कर्मकांड बच्चों को सौंपना,जन्मपत्री लिए-लिए फिरना,बच्चों का भविष्य वूछते फिरना&amp;nbsp; सबसे बड़ा अपराध है।हम जानबूझकर बच्चों से उनका आत्मविश्वास ही नहीं उनका आत्म विश्वास भी छीन लेते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपना सम्मान स्वयं करें &lt;br /&gt;आत्मविश्वास जहां उन्हें सफलता सौंपता है, वहां स्वाभिमान उन्हें उत्कृष्टता सौंपता है। व्यक्तित्व सौंपता है। जब हम अपना सम्मान करते हैं, अपने आपको दीन हीन याचक नहीं पाते हैं ,तब हमारी रीढ़ की हड्डी सीधी खड़ी होती है। हम खम्मा अन्नदाता,, हुजुर मुजरा ‘.यस सर. शब्दों से परे चले जाते हैं। हम&amp;nbsp; अपने विकास का पथ जहां स्वयं निर्धारित कर&amp;nbsp; लेते हैं, वही हम उसके योग्य भी हो जाते है। भाषा के स्तर पर अनावश्याक चापलूसी से बचें।हम सही बात को विनम्रता से भी कह सकते हैं।&amp;nbsp; &lt;br /&gt;यह सच है जहां परिस्थितियां मनुष्य के स्वाभिमान को प्रभावित करती हे, वहीं मनुष्य भी परिस्थितियों को प्रभावित कर सकता है। रानी लक्ष्मीबाई, विवेकानंद, महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, भगतसिंह, मुंशी प्रेम चन्द्र, ध्यानचंद, और नाम हैं, जिन्होंने अपने स्वाभिमान से,... समकालीन समाज के रूपांतरण में योगदान दिया।भय और प्रलोभन से मुक्त जीवन ही आत्मसम्मान सोंपता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर व्यक्ति, बदले स्वरूप में, समाज में, स्वाभिमान को पा लेता है तो उसकी व समाज की परिस्थितियां भी बदल सकती हैं। आज भारत को स्वाधीनता मिल गई है, पर स्वाभिमान नहीं मिला है’... उसकी प्राप्ति ही मौलिक परिवर्तन में सहायक होगी।&amp;nbsp; हम हमेशा दूसरों के बारे में ही सोचते रहते हैं,... दूसरों में ही परिवर्तन चाहते हैं,.. अपने आप में नहीं,।दूसरों का भी&amp;nbsp; बुरा अधिक सोचते हैं। पुरुषार्थ की अवहेलना ही हमारी गुलामी,हमारे पतन का कारण रहा है।हम हर तरह से चाहे सही हो ,गलत हो अपना काम निकालना ही सफलता मान बैठे हैं।जो समाज जितनागलत कार्य करता है वह उतना ही धर्म भीरू होता है।फिर हम चाहते हैं हमारे बच्चे भी हमारा अनुकरण करें, क्या यह उचित है?हम स्वयं अपने आप को सम्मान नहीं दे पाते हैं,अपनी अच्दाइयों को भगवान को या किसी गुरू को सोंपकर दीन हीन बना रहना चाहते हैं,और चाहते हैं उनकी कृपा से,हमारी कमियां अपने आप दूर होजाएंगी,तथाकथित गुरू भी हमें आश्वस्त करते रहते हैं।परिणाम यही है ,हम मात्र भीड़ की एक भेड़ ही रह जाते हैं।&lt;br /&gt;आप साधु महत्माओं के चक्कर लगाने लग जाते हैं।अपने आपको हीन मान लेते हैं। ज्योतिषियों का बाजार इसीलिए पनप रहा है।बेपढ़ेलिखे लोग तंत्र के नाम पर लूटमार करते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने आपको प्यार करो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसीलिए कहा जाता है, अपने आपको प्यार करो.।अपनी अच्छाइयों के प्रशंसक बनो,अपनी कमियों को स्वीकारो,स्वीकारी गई भूल फिर दुबारा नहीं होती है। इससे मन शक्तिशाली बनता है।अपना आकलन खुद करें,तब हम अपनी क्षमता को सही-सही जान सकते हैं।. अपने आप से लड़ो मत, संघर्ष करोगे टूट जाओगे... उससे प्रेम करो..।. उसे समझो.,कमी दिखती है,तनाव में जाने की जरूरत नहीं है।अपने आपकोे प्यार से समझाओ।हम ही अपने मित्रहैं ,हम ही अपने दुश्मन हैं&amp;nbsp; ,यही सार तत्व है।. तो प्यार और बढ़ेगा फिर परिस्थितियां भी बदलने लग जाएंगी। कल तक दासता भले ही रही हो.. आज स्वाभिमान की सुगंध तो प्राप्त हो सकेगी। हमारा आत्म कोई पत्थर नहीं है,यह हमारे ही विचारों से बना है। हम इसे बदल सकते है।वह शक्ति हमारा ज्ञान है,हमारा पुरुषार्थ है,हमारा विवेक है, हम उसका आदर करें,उसके बताए मार्ग पर चलें,हमें सफलता अवश्य मिलेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-7527703953727693373?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/7527703953727693373/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=7527703953727693373&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/7527703953727693373'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/7527703953727693373'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/07/blog-post_2611.html' title='आत्मसम्मान कैसे बढा़एॅ'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-641499582703863078</id><published>2009-07-16T21:57:00.000+05:30</published><updated>2009-07-16T21:57:15.778+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif; font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;जंगल का दर्द&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;न दल, न दलदल, बस एक दरख़्त&lt;br /&gt;बैठे हैं जिसके नीचे&lt;br /&gt;लड़ते झगड़ते, लार टपकाते, अंतहीन रेवड़&lt;br /&gt;प्रतीक्षा हैं सबको&lt;br /&gt;कि दरख़्त गिर जाए&lt;br /&gt;इतिहास कहता है दरख़्त जब गिरता है&lt;br /&gt;तभी कुछ होता है।&lt;br /&gt;दरख़्त अब होते ही नहीं&lt;br /&gt;जंगलात का हाकिम कहता है&lt;br /&gt;नहीं है शेष एक पेड़ यहाँ से वहाँ तक&lt;br /&gt;जो, जा सके आरा मशीन तक।&lt;br /&gt;निपट खाली मैदान&lt;br /&gt;जंगल अब रहता ही नही है&lt;br /&gt;चलो रोप आएँ हम एक पेड़&lt;br /&gt;कल तुमने ही कहा था,&lt;br /&gt;मौसम भी अब मज़ाक करता है&lt;br /&gt;तभी कह रहा था&lt;br /&gt;वक़्त को अब हरी दूब की जरूरत है&lt;br /&gt;न शाख होगी, न कटेगी&lt;br /&gt;दूब का क्या,&lt;br /&gt;जब कुचलती है&lt;br /&gt;तभी हरी होती है&lt;br /&gt;और हरा होना&lt;br /&gt;इस मौसम में युग गांधारी की होनी जरूरत है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-641499582703863078?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/641499582703863078/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=641499582703863078&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/641499582703863078'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/641499582703863078'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/07/blog-post_16.html' title='कविता'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-7301556424183810206</id><published>2009-07-13T22:08:00.000+05:30</published><updated>2009-07-13T22:08:28.356+05:30</updated><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;जंगल जलते हुए&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;नहीं, नहीं, नहीं&lt;br /&gt;यह तुमसे किसने कहा&lt;br /&gt;ज़मीन उसकी होती है जो हल चलाता है&lt;br /&gt;भूख की शिद्दत में&lt;br /&gt;ज़मीन कलेजे से चिपकाए हुए&lt;br /&gt;आषाढ़ी बादल निहारता है।&lt;br /&gt;ज़मीन साहब की है &lt;br /&gt;बी.डी.ओ. जिनके यार हैं&lt;br /&gt;तहसीलदार ख़ास हैं,&lt;br /&gt;पटवारी फसल का हिसाब लिखा करता है&lt;br /&gt;तालुका अधिकारी की जहाँ मौज मनती है&lt;br /&gt;ज़मीन उन साहब की है,&lt;br /&gt;तेरी भी, मेरी भी, और उन सबकी भी&lt;br /&gt;जिनके हाथ पतले हैं&lt;br /&gt;थके थके जिस्म कुम्हलाए हैं&lt;br /&gt;सब उनकी हो चुकी है।&lt;br /&gt;ज़मीन अब &lt;br /&gt;माँ नहीं, बहन नहीं, धर्म नहीं, प्यार नहीं&lt;br /&gt;औरत है&lt;br /&gt;नहीं उससे भी गई गुज़री बाज़ारू तवायफ है&lt;br /&gt;जिसके पेट में दौलत की खाद जब गिरती है&lt;br /&gt;सोना उगलती है &lt;br /&gt;साहबों के लिए वह&lt;br /&gt;वह साल में दो बार दौलत जनती है।&lt;br /&gt;तेरी भूख का जमीन से वास्ता नहीं है&lt;br /&gt;तेरे पास जो इतिहास है&lt;br /&gt;वह तेरा है,&lt;br /&gt;तेरे पिता,&lt;br /&gt;तेरे बाबा,&lt;br /&gt;तू इतिहास आंखों में रखता है&lt;br /&gt;तेरे घर में कुम्हलाए फूल&lt;br /&gt;साहबों के गले में माला बन सिसकते हैं।&lt;br /&gt;ये कागज..... ये किताबें&lt;br /&gt;वकील और ये अफ़सर&lt;br /&gt;पोषाहार केन्द्र की तरह चलते हैं&lt;br /&gt;तेरी आग को पलाश वन में मैने देखा है&lt;br /&gt;जंगल जब जल रहा था&lt;br /&gt;यह आग कब हड्डियाँ जलाएगी&lt;br /&gt;यह आग&lt;br /&gt;तेरी आंखों में क्या महाभारत उठाएगी&lt;br /&gt;वामन.........&lt;br /&gt;तेरे तीन डग कब पदचिन्ह बनाएंगे&lt;br /&gt;प्रतीक्षा है&lt;br /&gt;ज़मीन और औरत के बीच की तमीज़&lt;br /&gt;कब अंगार बन दहकेगी।&lt;br /&gt;ज़मीन उसकी नहीं जो कागज़ में नाम रखता है&lt;br /&gt;ज़मीन उस हाथ की&lt;br /&gt;ज़मीन उस फौलाद की &lt;br /&gt;जो ज़मीन काबू में रखता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-7301556424183810206?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/7301556424183810206/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=7301556424183810206&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/7301556424183810206'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/7301556424183810206'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='कविता'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-2757004645609200894</id><published>2009-06-26T21:05:00.000+05:30</published><updated>2009-06-26T21:05:08.746+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;उदासी&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;तुम उदास हो&lt;br /&gt;कप्तान नहीं रहे&lt;br /&gt;हम उदास नहीं&lt;br /&gt;खिलाड़ी ही कब रहे,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह होना ही &lt;br /&gt;होने की संभावना में&lt;br /&gt;मात्र बस खोना है;&lt;br /&gt;सुबह से शाम&lt;br /&gt;शाम से सुबह तक&lt;br /&gt;चक्की के पाटों में पिसा ही रहना है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हवा बहती है&lt;br /&gt;क्या अहसान करती है,&lt;br /&gt;धूप&lt;br /&gt;सबके आंगन में बराबर ही बरसती है&lt;br /&gt;वर्षा सी नहीं&lt;br /&gt;आधे ही खेत को खाली भी रखती है&lt;br /&gt;दृष्य ही है सार&lt;br /&gt;सच भी यही है&lt;br /&gt;पर दर्शक नहीं हो तुम &lt;br /&gt;दृष्टा, समय के संग&lt;br /&gt;भुजाएं तनी रखना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोने की धड़ी यह नहीं&lt;br /&gt;ढपली अपनी ही यह बजनी है&lt;br /&gt;जो जागा है&lt;br /&gt;जगा है&lt;br /&gt;जगने को सजग है&lt;br /&gt;वही बार-बार गिरकर&lt;br /&gt;जिन्दगी को जीकर रहा हे&lt;br /&gt;भले ही काला, बदसूरत&lt;br /&gt;घिनोना चींटा रहा हो वह।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-2757004645609200894?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/2757004645609200894/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=2757004645609200894&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/2757004645609200894'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/2757004645609200894'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/06/blog-post_26.html' title=''/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-1771506112040542026</id><published>2009-06-06T21:54:00.000+05:30</published><updated>2009-06-06T21:54:07.694+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; सपने &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वह बचपन में सपने देखता है, &lt;br /&gt;सपने उसका&lt;br /&gt;बचपन चुरा लेते हैं,&lt;br /&gt;खबर न उसे है&lt;br /&gt;न मां-बाप को होती है&lt;br /&gt;वे सपनों को छीनकर बस्ता थमा देते हैं।&lt;br /&gt;वाह!&lt;br /&gt;वर्दी जो बचपन में चढ़ती है जिस्म पर&lt;br /&gt;उतरती तभी है&lt;br /&gt;जब चील काली पास आ,&lt;br /&gt;उस पर झपटती है,&lt;br /&gt;वह पूछता है, जगह-जगह&lt;br /&gt;इन सपनों का क्या अर्थ, जो रात को ही नहीं,&lt;br /&gt;दिन में तंग करते हैं&lt;br /&gt;न घर पर आराम है&lt;br /&gt;न दफ्तर में,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अखबार जब भी पढ़ता है&lt;br /&gt;कल से आज गरीब होता है&lt;br /&gt;गरीबी की रेखा, कहां से कहां तक &lt;br /&gt;भूख का रोटी से, रोटी का कैलोरी से जो&lt;br /&gt;रिश्ता बना है&lt;br /&gt;वही भूखे पेट का हिसाब भी रखता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस का भाड़ा&lt;br /&gt;स्कूल की फीस&lt;br /&gt;अनाज, सब्जी, दूध&lt;br /&gt;दवा की दुकान&lt;br /&gt;अब रोक नहीं पाते है,&lt;br /&gt;वह कितनी रहमदिल&lt;br /&gt;कहीं भी, कभी-भी&lt;br /&gt;दारू की दुकान रोज नई खुल जाती है&lt;br /&gt;बढ़ते हैं ग्राहक...,&lt;br /&gt;मरती है लड़की&lt;br /&gt;बिकती सुबह-शाम&lt;br /&gt;पुलसिया कहता है&lt;br /&gt;रुपया आकाश से टपकता है।&lt;br /&gt;जो अब तक बना चुका दस मकान&lt;br /&gt;आकांक्षी मंजिल की छत से उतरकर,&lt;br /&gt;वही एक दिन वोट मांगने आता है,&lt;br /&gt;वोट का टोनिक पी &lt;br /&gt;फिर अजगर सा &lt;br /&gt;निकलता है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरजू कहता घरवाली से&lt;br /&gt;पास वाली इमारत&lt;br /&gt;पिछले साल हमने&amp;nbsp; बनाई थी&lt;br /&gt;साल पूरा निकल गया, ... मैदान में पड़े हुए&lt;br /&gt;शांत, उदास, ... मरने से पहले की खुली आंख लिए,&lt;br /&gt;यही ईश्वर ने चाहा है&lt;br /&gt;यह भी क्या कम है सांस पर हमारा ही हक है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लीला&lt;br /&gt;लीला देख पाती है&lt;br /&gt;हाथ, वही, जिस्म वही&lt;br /&gt;कितने मकान बने&lt;br /&gt;पर उसकी झौंपड़ी&lt;br /&gt;बारिश से पहले हटकर कहीं जाना है&lt;br /&gt;बार-बार कानों में गूंजती थरथराहट&lt;br /&gt;बारिश का अभाव है&lt;br /&gt;सूखती फसल&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-1771506112040542026?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/1771506112040542026/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=1771506112040542026&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/1771506112040542026'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/1771506112040542026'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/06/blog-post_06.html' title=''/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-5661759699743176535</id><published>2009-06-02T14:14:00.000+05:30</published><updated>2009-06-02T14:14:38.705+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;div style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;घर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रस्ते अलग अलग हैं&lt;br /&gt;जाना तो एक घर है&lt;br /&gt;हम रहते दादाबाड़ी&lt;br /&gt;तुम बरकत नगर निवासी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सड़क के इधर हम हैं &lt;br /&gt;तुम उधर रहते,&lt;br /&gt;कैसी हुई मजबूरी&lt;br /&gt;सड़क पार नहीं होती&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपर की&amp;nbsp; मंजिल हम हैं&lt;br /&gt;नीचे की मंजिल तुम हो&lt;br /&gt;जीने की क्या विवशता&lt;br /&gt;कदम झेल नहीं सकता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम हमसे क्या बड़े हो&lt;br /&gt;हम तुम से क्या कम हैं&lt;br /&gt;सब बड़े ही बड़े हैं&lt;br /&gt;सचमुच दही बड़े हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पडौसी ही चट कर सकता&lt;br /&gt;दौना लिए वह आता&lt;br /&gt;सदियों से यही हुआ है&lt;br /&gt;हरी घास&amp;nbsp; हम बने हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिल्लत से यहाॅं पर रहना&lt;br /&gt;मालिक ने कब कहा है,&lt;br /&gt;रस्ते अलग अलग हैं&lt;br /&gt;रहना तो एक घर है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-5661759699743176535?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/5661759699743176535/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=5661759699743176535&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/5661759699743176535'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/5661759699743176535'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='कविता'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-7615147396265693919</id><published>2009-05-26T22:27:00.000+05:30</published><updated>2009-05-26T22:27:33.730+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&amp;nbsp;औरत&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;व्रत तुम्हारा, निर्जल है अन्न नहीं, जल नहीं&lt;br /&gt;यह क्या चाहत है&lt;br /&gt;क्या है जरूरी प्रेम है, ... पर देह को उसका&lt;br /&gt;दाय न सौंप भूखा, निराहार रह&lt;br /&gt;‘चाँद’ की प्रतीक्षा में&lt;br /&gt;दिन... सौंप जाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पति से प्रेम का छोटा सा टुकड़ा&lt;br /&gt;इस मौसम में जब वर्षा है रूठ गई&lt;br /&gt;बादल का टुकड़ा, दिखता नहीं दूर तक&lt;br /&gt;गर्मी में झुलसती&lt;br /&gt;देह, पनीली, लथपथ पसीने से&lt;br /&gt;बादल का आना,&lt;br /&gt;वर्षा की बूंदों से बंधना&lt;br /&gt;क्या सचमुच जरूरी है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंँखों से बरसती मेघ की घटाएं&lt;br /&gt;कभी-कभी एक मिल, चेहरों पर, चमकती कड़कती&lt;br /&gt;विद्युत प्रभा,&lt;br /&gt;और जब बिखराकर, केशों का उलटना&lt;br /&gt;कभी-कभी&lt;br /&gt;होठों का दांतों से दबकर, कह पाना&lt;br /&gt;बहुत कुछ कहना, पर न कह पाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुनना अचानक&lt;br /&gt;धूल भरी आँधी का कर्कश अट्टाहास&lt;br /&gt;पास और पास&lt;br /&gt;उखड़ता जाना, नन्हें पौधों का&lt;br /&gt;अचानक धूल के बवंडर में&lt;br /&gt;रोपा था जिनको&lt;br /&gt;वर्षा के स्वागत में।&lt;br /&gt;सहसा बहुत कुछ &lt;br /&gt;धरती तपती है&lt;br /&gt;वर्षा की बूंदे&lt;br /&gt;नव-रस, आल्हादित&lt;br /&gt;तन-मन आपूरित&lt;br /&gt;गंधित मलय&lt;br /&gt;रोम-रोम स्पंदित&lt;br /&gt;स्नेह सिक्त बाती, सी वह चमकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्रत उसका मजबूरी नहीं, चाहत नहीं&lt;br /&gt;नहीं कहीं कामना&lt;br /&gt;अदृश्य बंधन की&lt;br /&gt;छोटा सा ‘बिरवा’ हरा रहे, ... खिला रहे&lt;br /&gt;सुगंध, आपूरित&lt;br /&gt;मन के कौने में, नित-नूतन, बस रहे बसा रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-7615147396265693919?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/7615147396265693919/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=7615147396265693919&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/7615147396265693919'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/7615147396265693919'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/05/blog-post_26.html' title=''/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-11794728836154555</id><published>2009-05-24T21:20:00.000+05:30</published><updated>2009-05-24T21:20:59.381+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>कविता,</title><content type='html'>डाॅ. नरेन्द्र चतुर्वेदी कविता ”सच “यहाँ दी जारही है,आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;सच&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता का सच क्या है&lt;br /&gt;कल्पना के ताने-बाने&lt;br /&gt;चैकड़ी जो बनी है-&lt;br /&gt;इस करघे पर&lt;br /&gt;भूख, गरीबी से लड़ते कवि ने&lt;br /&gt;जो चुललू भर चाय की&amp;nbsp; चुस्की पर&lt;br /&gt;नई दुनिया के नए सोच की तस्वीर बनाता है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गली में&lt;br /&gt;पेशाब की बदबू से बचते-निकलते&lt;br /&gt;ऊपर कहीं से भी&lt;br /&gt;गंदगी के ढेर का अचानक पुष्पवर्षा सा गिरना&lt;br /&gt;सूअर जो कहीं था आमंत्रित&lt;br /&gt;दौड़ता-भगता,&lt;br /&gt;टकराहट मिमियाते श्वान से&lt;br /&gt;पास की दुकान से गूंजता संगीत,&lt;br /&gt;यही दुनिया का खुला हुआ तिलस्म है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता का रस&lt;br /&gt;ढूँढ़ता कवि&lt;br /&gt;सोचता,&lt;br /&gt;यथार्थ जो मिला ‘मकबरेे की गंदी&amp;nbsp; गली में&lt;br /&gt;महफिल में आ जाए,&lt;br /&gt;साबुन के झाग से निकला, फिसलता&lt;br /&gt;हाथ में टिकली साबुन सा वक़्त&lt;br /&gt;मां की, बाप की, रिश्ते में सभी की&lt;br /&gt;ख्वाहिश पहचानता&lt;br /&gt;बिजली के तारों पर बैठी ‘काग शृंखला&lt;br /&gt;यहाँं, वहाँं आसपास&lt;br /&gt;कविता में तलाशतातमीज सीधे खड़े होने की&lt;br /&gt;न बिकने की व्यथा&lt;br /&gt;लिखा बहुत कुछ&lt;br /&gt;छपा कहीं नहीं&lt;br /&gt;सुनकर नहीं कोई&lt;br /&gt;शब्द, भीतर खंजर सा चीरता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काँख में दबी&lt;br /&gt;आई पत्रिका झांकता&lt;br /&gt;टुकुर-टुकुर&lt;br /&gt;रेत उठाती, अर्धनग्न, आदिवासी कन्या की&lt;br /&gt;भूख, ... पेड़ की छाया भी रोती, चीखती&lt;br /&gt;भयातुर, ... आंख की कोर में अचानक कंकड़ सा गिरता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवित यथार्थ&lt;br /&gt;शब्द क्या बांध पाए&lt;br /&gt;सोचना भी पाप है&lt;br /&gt;माया है माया है&lt;br /&gt;‘गोपाली’ बाबू की कथा में नहीं है यह&lt;br /&gt;नहीं ‘कागा राम’ मटक-मटक गाता है,&lt;br /&gt;वह कभी- कभी&lt;br /&gt;काटता है भीतर से&lt;br /&gt;रिसता है दुख, ... रात को टपकते नल से बूंद-बंूद सा&lt;br /&gt;न करने का, बस&lt;br /&gt;अपनी ही आंख में रोज और नीचे&lt;br /&gt;और नीचे, उतरने का देता है दर्द,&lt;br /&gt;वह जब भी देख पाती है&lt;br /&gt;तेज, ... तपती रेत में&lt;br /&gt;अचानक खिड़की से&lt;br /&gt;रोते, झींकते, चिल्लाते, पगलाते&lt;br /&gt;छोटे-छोटे पाँवों&lt;br /&gt;से आता-ठहरता, जाता, ढूंढ़ता रहता कुछ&lt;br /&gt;कविता का यथार्थ,वह।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-11794728836154555?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/11794728836154555/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=11794728836154555&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/11794728836154555'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/11794728836154555'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/05/blog-post_24.html' title='कविता,'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-7927603925112239538</id><published>2009-05-21T21:52:00.001+05:30</published><updated>2009-05-22T00:04:07.046+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डॉ. नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>दोपहर</title><content type='html'>&lt;div style="font-family: Verdana,sans-serif;"&gt;&lt;div style="background-color: #990000; color: white; text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;b&gt;'कविता'&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: #990000; color: white; text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;दोपहर&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="background-color: #990000; color: white; text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: #fff2cc; font-size: large;"&gt;डॉ. नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;उन दिनो गर्मियों की दोपहर में&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;कल्लू के घर की तिमंजली छत पर बने&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;उस टीन के कमरे में&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जहाँ बाहर कबूतर का पिंजरा था&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;थे उसके बाबा, जो छत पर आकर कबूतर उड़ाते थे&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;उसकी बकरी जीने पर होती हुई चीखती चिल्लाती&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;छत पर आ जाती,&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;चौकड़ी या छकड़ी, ताश के रंगीन पत्ते&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रंगीन सपनों से महकते।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;कुछ देर बाद उसकी माँ&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;नासपीटे को बीमार होना है&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;और तुम सबको भी&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रेवड़ियों की तरह कभी गुड़ की कभी चीनी की&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;बरसती गालियां.... हवा को सुना जाती,&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;उसके बाद उसकी बहन का चाय के प्याले लेकर आना&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;बाबा की तेज आवाज&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;खेलने के दिन है, इम्तहान अभी निबटे हैं&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;शाम को कबूतर उड़ाना सिखाना या पतंगबाजी&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;या पुराने किस्सों का अधखुला खजाना ।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;बरसों बाद मिला कल्लू&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;फुटपाथ के पास गुमटी पर, हवा, टायर में भरता हुआ&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पास में खड़ी साईकिल&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;टायर पकाता उसके पास था खड़ा उसका पुराना बचपन&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;देखकर पहचाना, पहचानकर अनजाना&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;था मैं अवाक&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अपने बेटे की अंगुलियां पकड़े जो बस्ते का बोझ लिए&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;गर्व में झूमता हंसता... बतियाता&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;नई मोपेड के चर्चे सुनाता.....,&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;था साथ चलता&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;कल्लू के बाबा कहा करते थें&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;खेलने के दिन है&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;काश यह रात कभी जल्दी कट सके तो.........&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;input id="jsProxy" onclick="jsCall();" type="hidden" /&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-7927603925112239538?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/7927603925112239538/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=7927603925112239538&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/7927603925112239538'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/7927603925112239538'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/05/blog-post_21.html' title='दोपहर'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-8524797923513145278</id><published>2009-05-20T22:12:00.000+05:30</published><updated>2009-05-20T22:12:50.194+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/ShQy9OXwvUI/AAAAAAAAAV8/EIsH2SB7wNM/s1600-h/astrologer-508629-tn%5B1%5D.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/ShQy9OXwvUI/AAAAAAAAAV8/EIsH2SB7wNM/s320/astrologer-508629-tn%5B1%5D.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="border-collapse: separate; color: black; font-family: -webkit-monospace; font-size: 13px; font-style: normal; font-variant: normal; font-weight: normal; letter-spacing: normal; line-height: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: pre-wrap; widows: 2; word-spacing: 0px;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;हस्तरेखा&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कीचड़ में सने हाथ की रेखाएं&lt;br /&gt;पढ़ नहीं पाता पंडित&lt;br /&gt;नहर में पानी मुद्दत बाद जो आया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूर खड़ा अभियंता&lt;br /&gt;हथेली खोले हुए बार-बार देखता&lt;br /&gt;खुजलाहट हथेली की सुबह से&lt;br /&gt;इस बार का बजट अब पूरा भी होना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बादल महीने भर से गायब हैं&lt;br /&gt;शुक्र है समय अच्छा है&lt;br /&gt;गुरुजी ने कहा था-&lt;br /&gt;शनी उतर गया है&lt;br /&gt;दूर खेतों में, फटे हाल किसानों पर&lt;br /&gt;चढ़ा ही नहीं&lt;br /&gt;चिपक भी गया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाजन भी खुश&lt;br /&gt;कल ही सुबह-सुबह पहली बार गया था&lt;br /&gt;तृष्णा की रेत पर...&lt;br /&gt;भारतमाता को याद कर &lt;br /&gt;कदमताल कर आया था&lt;br /&gt;उधारी बढ़ेगी&lt;br /&gt;ब्याज सवा से दो पाई सैकड़ा बढ़ेगा&lt;br /&gt;गिरवी जमीन, बर्तन-भांडे भी होंगे&lt;br /&gt;तब वसूली तब होगी...&lt;br /&gt;तब, भविष्य वह में सुरक्षित रह सकेगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्कृति का गवाक्ष खालीनहीं कोई आता इधर&lt;br /&gt;रानी, परनानी, दादी अब वहां कहां&lt;br /&gt;कभी बैठा था ललमुंहा बंदर वहां&lt;br /&gt;उठकर जबसे गया है&lt;br /&gt;नचता ‘वराह’ का वंशज&lt;br /&gt;महाजनी मंत्र पर&lt;br /&gt;चढ़ता-उतरता&lt;br /&gt;महिमा मंडित&lt;br /&gt;समाचार पत्रों में छपा है विज्ञापन&lt;br /&gt;भागवत कथा का वही है आयोजक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीलंे व्यस्त है&lt;br /&gt;गि(ों को जाकर नौत आयी है तेरहवीं का भोज है&lt;br /&gt;कागा उड़ते ही नहीं&lt;br /&gt;बैठे हैं मुंडेरों पर कल से जमा&lt;br /&gt;बहस ही बहस&lt;br /&gt;राशि अकाल पर,&lt;br /&gt;या बाढ़ पर खर्च हो होनी है&lt;br /&gt;दिनभर में, ... कितनी कहांँ&lt;br /&gt;लार रुकती नहीं&lt;br /&gt;मरण पर्व आयोजित जो होना है।&lt;br /&gt;उनकी हथेली पर&lt;br /&gt;रेखाएं मिटसी गई है&lt;br /&gt;कीचड़ में सनी, धूल में बंधी&lt;br /&gt;सूरज की रोशनी में&lt;br /&gt;किरण सी चमकती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी रेखाएं&lt;br /&gt;पंडित हंँस-हंँसकर बांँचता&lt;br /&gt;ग्रह अब उतरने को है&lt;br /&gt;खुजली रुकती नहीं&lt;br /&gt;जिस्म खुलाने चली है&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-8524797923513145278?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/8524797923513145278/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=8524797923513145278&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/8524797923513145278'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/8524797923513145278'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/05/blog-post_20.html' title='कविता'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/ShQy9OXwvUI/AAAAAAAAAV8/EIsH2SB7wNM/s72-c/astrologer-508629-tn%5B1%5D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-7394622625143823397</id><published>2009-05-12T22:58:00.000+05:30</published><updated>2009-05-12T22:58:24.969+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif; font-size: small;"&gt;डाॅ. नरेन्द्र चतुर्वेदी&amp;nbsp; की कविता यहाँ दी जारही है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: Verdana,sans-serif; font-size: large;"&gt;़समिति के सभागार में&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभी चिंतित थे&lt;br /&gt;ज्ञानी, ध्यानी, चिंतक सुधी समीक्षक&lt;br /&gt;कुकुरमुत्ते की तनी छतरी पर&lt;br /&gt;जगत का बोझ थामे,&lt;br /&gt;अगर जरा भी हिले आकाश नीचे आ जाए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्कृति, अपसंस्कृति, बड़ी-बड़ी नौकाएं&lt;br /&gt;सूखती सरिता के सभी घाटों को तोड़ते&lt;br /&gt;वो चले आए&lt;br /&gt;दूर खड़े सौदागर&lt;br /&gt;तेज रोशनी में दमकता सुर्खानी चेहरा&lt;br /&gt;खुला वक्ष और ऊँची तिकोनी मंे कन्या,&lt;br /&gt;कहीं बाबा,कहीं बाला &lt;br /&gt;शनी,राहू का चढ़ता उतरता जाला,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेकारी भूख गरीबी, दूध-पानी, और सब&lt;br /&gt;नहीं मिला अब तक&lt;br /&gt;चाहत में जिसकी&lt;br /&gt;हजार साल से दम तोड़ता&lt;br /&gt;समिति दरवाजे पर, पगलाया ‘गोबर वह’&lt;br /&gt;वो फिर नाचेगा,&lt;br /&gt;खरीदेगी, वही कुछ जो उसे मिलता है&lt;br /&gt;धनिया को बस मुस्कराना है,&lt;br /&gt;होरी की&amp;nbsp; जरूरत नहीं &lt;br /&gt;उसकी मुस्कराहट पर, उसका ही माल&lt;br /&gt;गली कूचे बिकता है&lt;br /&gt;हवा, पानी, धूप और उजाला&lt;br /&gt;वह अपने पास रखता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी कभी का यूंही उतर गयाजो था नया&lt;br /&gt;‘पाउच’ में चला गया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिंतक उदास&lt;br /&gt;क्रीतदास&lt;br /&gt;दूसरों को जुलूस में देख आंँखे विस्फारित&lt;br /&gt;वाह! वाह!&lt;br /&gt;भीतर ही भीतर, सोच-सोच उदास&lt;br /&gt;हाय! हम न जा पाए&lt;br /&gt;वहाँं बटती भभूत थी&lt;br /&gt;यश की प्रेय की&lt;br /&gt;ले गया पड़ौसी जो कल तक यहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं-नहीं&lt;br /&gt;हमें लानी है क्रांति, आग यहांँ बुलानी है&lt;br /&gt;हो जाए भस्म सब&lt;br /&gt;जो भी कर्दम है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर चुप!&lt;br /&gt;मैं और मेरा तन भी तो यहीं है, ... उसे है बचाना&lt;br /&gt;चुप! चुप!&lt;br /&gt;फायर बिग्रेड को तुरंत यहांँ लाना है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ जले&lt;br /&gt;कुछ बुझे&lt;br /&gt;यहां बस ऐसा ही होना है&lt;br /&gt;हमको समिति के इसी हाल में&amp;nbsp; चिंतित हो,&lt;br /&gt;चर्चा में सक्रिय जो होना&amp;nbsp; है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-7394622625143823397?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/7394622625143823397/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=7394622625143823397&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/7394622625143823397'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/7394622625143823397'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/05/blog-post_12.html' title=''/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-8054063207192198170</id><published>2009-05-11T22:49:00.000+05:30</published><updated>2009-05-11T22:49:23.173+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>कविता,</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SgheCosiEiI/AAAAAAAAAVU/jkhpv_F9WC8/s1600-h/18.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SgheCosiEiI/AAAAAAAAAVU/jkhpv_F9WC8/s320/18.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;नरेन्द्र चतुर्वेदी की कविता उनके काव्य संग्रह अभी वो जीवित हैं संग्रह से यहाँ दी जारही है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&amp;nbsp;क्योंकि&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक रेल के डिब्बे में &lt;br /&gt;भारी भीड़ में तुम्हारा पहचाना सा चेहरा&lt;br /&gt;यह तुम,’तुम हो,.’.. यह वह,&lt;br /&gt;स्मृतियों पर पड़ा पत्थर&lt;br /&gt;हटाए नहीं हटता,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मांगीलाल हो या पन्ना, या भूरा या गोपी&lt;br /&gt;चेहरे उनके जो साथ रहे&lt;br /&gt;पहचान नहीं दे पाए&lt;br /&gt;हंसते-गाते, बोलते-चलते,&lt;br /&gt;कुछ मर गए&lt;br /&gt;कुछ खप गए&lt;br /&gt;रात-दिन की दौड़ में,&lt;br /&gt;”सर!“ अनुगूंज में,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहचान उठती है&lt;br /&gt;पहचान गिरती है&lt;br /&gt;जिसे पहचानता है, जो पहचानता है&lt;br /&gt;उससे वह छोटा है&lt;br /&gt;जिसे पहचाना, वही बड़ा होता है,&lt;br /&gt;दुनिया का यही नियम दुनिया कहा जाता है।&lt;br /&gt;पहचानकर, अजनबीपन&lt;br /&gt;न जाना, न पहचाना, बुत को अपनाना&lt;br /&gt;सचमुच सुखद होता है,&lt;br /&gt;नहीं जो जिसको पहचाना वही तो बड़ा होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जबकि बात उसकी है&lt;br /&gt;उसके लिए आए हैं&lt;br /&gt;सामने उसी का पोस्टर टंगा है&lt;br /&gt;उसी की कोशिश में यह ‘रत जगा’ है&lt;br /&gt;पर हमने पहचाना तवह सर चढ़ेगा&lt;br /&gt;सर पर कदम रख, कदम ताल करेगा,&lt;br /&gt;यह खतरा जिसने जाना है ,&lt;br /&gt;वही आज की दुनिया का हरकारा हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चुप रहो,&lt;br /&gt;चुप रहो,&lt;br /&gt;उनको&amp;nbsp; ही पहचानने दो&lt;br /&gt;दुनिया अजनबी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम इस पहचान के मात्र साक्षी हैं&lt;br /&gt;साक्षी रहना, &lt;br /&gt;वक्त की जरूरत है,&lt;br /&gt;जो साक्षी है&lt;br /&gt;वही सुरक्षित है,सुरक्षित रहना हमारी जरूरत है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-8054063207192198170?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/8054063207192198170/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=8054063207192198170&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/8054063207192198170'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/8054063207192198170'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/05/blog-post_11.html' title='कविता,'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SgheCosiEiI/AAAAAAAAAVU/jkhpv_F9WC8/s72-c/18.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-7747785414448973063</id><published>2009-05-02T22:28:00.000+05:30</published><updated>2009-05-02T22:28:42.048+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वार्ता'/><title type='text'>पूज्य स्वामीजी</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/Sfx7IEPBIVI/AAAAAAAAAUk/EA7VWTlfDGw/s1600-h/nn13.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/Sfx7IEPBIVI/AAAAAAAAAUk/EA7VWTlfDGw/s320/nn13.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/Sfx7Oq17CTI/AAAAAAAAAUs/X0xZpEVDf_k/s1600-h/nn16.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/Sfx7Oq17CTI/AAAAAAAAAUs/X0xZpEVDf_k/s320/nn16.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;पूज्य स्वामीजी की वा्र्ताओं के क्रम में यह लेखमाला की तीसरी कड़ी यहाँ दी जारही है।आप इस संदर्भ में अपनी प्रतिक्रिया अवश्य भेजें।यहाँ मनुष्य की उसके स्वयं से जुड़ने की तथा उसकी अन्तर्यात्रा की पहचान ही संकल्पित है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;साधन सन्दर्भ&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;स्वामीजी से प्रायः जिज्ञासु जब भी मिलते हैं, वे क्या करें ? यही पूछते रहते हैं। वे साधना की ओर किस तरह बढ़ें, यही जिज्ञासा रहती है।&lt;br /&gt;स्वामीजी कहा करते है-&lt;br /&gt;”साधक के लिए आत्मनिरीक्षण ही साधन है। साधक को चाहिए कि&amp;nbsp; वह अपनी आंतरिक्ता में विचरण करे। मनोजगत में पैठ करे। आप वहीं पहुंचेंगे, जहां से विचार चले आ रहे हैं। एक गहरी सतर्कता के साथ की गई आंतरिकता में निगरानी मन को क्रमशः निष्क्रियता प्रदान करती है। मन से, मन की&amp;nbsp; जब निगरानी की जाती है, तब वह जल्दी ही थक जाता है। और एक खालीपन निष्क्रियता प्राप्त होती है। परन्तु यहां पर किसी ओर अन्य प्रकार के परिवर्तन की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। हम गुण और दोष को ही जीवन मान बैठे हैं। जीवन जो है, जिस रूप में है। उसके मूल रूप को जान ही&amp;nbsp; नहीं पाते।”&lt;br /&gt;प्रायः आत्मनिरीक्षण के साथ ही परिवर्तन की ललक रहती है। अरे मुझमें यह दोष है...यह मुझे दूर करना है, तभी गुण का स्वरूप सामने आ जाता है, मुझे तो यह होना चाहिए, आखिर यह भी तो संकल्प यात्रा ही है। जब तक गुण शेष है, तभी तक दोष की सत्ता भी विद्यमान है। राग द्वेष की समाप्ति ही सही वैराग्य है। हमें और कुछ नया नहीं करना- बस, इसी&amp;nbsp; तकनीक को समझना है कि यहां कुछ होने के लिए आत्मनिरीक्षण नही करना है। बाहृा से लाकर कुछ आरोपित नहीं करना है, जो है उसका सतर्कतापूर्वक अवलोकन ही साधन है। यहां किसी प्रकार का कोई ंसंकल्प नही है, रूपान्तरण की चाहत भी नहीं है तभी तो ‘जो’ है वह उसी रूप में अभिव्यक्त हो सकता है। जब ध्यान में रुपान्तरण की क्रिया शुरू हो जाती है। तभी तनाव शुरू होता है। एक द्वन्द यह ध्यान नहीं है। इसीलिए आवश्यक है, आत्मनिरीक्षण की नौका पर मात्र लहरें ही देखना है, गिनना नही है। पानी के गंदलेपन को देखकर अस्वीकृति की भावना नही, जो है, उसे ही साक्षी भाव से देखना है, यह नाव चलती रहे, तभी यह अन्तर्यात्रा संभव है। यहां निसंकल्प अवलोकन ही सार्थक ध्यान है। आंतरिक विचारणा का अवलोकन ही यह हमें प्रदान करता है।&lt;br /&gt;इसलिए आवश्यक है कि काल के इस अमूल्य क्षण में मन अत्यधिक संवेदनशील हो, और यह तभी संभव है कि विचारणा ही नही रहे। जिस क्षण यह अनुभवन है, अनुभव और अनुभव-कर्ता की पृथकता समाप्त हो जाती है। पर होता क्या है, अनुभव क्षणिक रहता है। फिर आती है स्मृति जो सार्थक क्षण का विश्लेषण करती है। अनुभव और अनुभव कर्ता पृथक हो जाते हैं। इसलिए हम पाते है, हम अधिकांशतः अनुभव से बाहर ही रहते हैं। अनुभव के लिए आवश्यक है, इस क्षण विचारणा अनुपस्थित रहे, भूत और भविष्य में मन का संक्रमण न रहे, रहे मात्र वर्तमान और तभी प्राप्त होती है, निसंकल्पता, एक गहरा मौन, यही तो हमारा ध्येय है।&lt;br /&gt;ध्यान-योेग हर क्षण के अनुभव में रूपांतरित होने की वह कला है जिसके द्वारा जगत भागवत-भाव की प्राप्ति होती है, वहीं जीवन भागवत-कर्म से युक्त हो जाता है। ज्यों-ज्यों अनुभवन बढ़ता है, जीवन की सार्थकता उपलब्ध होती जाती है।&lt;br /&gt;यह स्थिति जीवन से पलायन नही है, निठल्लापन नही है, वहां है- सर्वाधिक गत्यात्मकता, खुला विक्षोभहीन जीवन क्या यही हम नहीं चाहते हैं?&lt;br /&gt;यह सच है, यहां तक साधारण साधक के लिए पहुंचना सरल नही है। अतः अभ्यास आवश्यक है। शास्त्रों ने इसीलिए भगवत इच्छा का आदर किया है। भगवत इच्छा ही प्राणी की भोगेच्छा को समाप्त कर देती है। और अन्त में जाकर यह भी परमात्मा में विलीन हो जाती&amp;nbsp; है। अतः प्रयत्न यहां निन्दनीय नहीं है। सच तो यह है कि प्रयत्न ही यही है।&lt;br /&gt;इसलिए साधक को अभ्यास का आदर करना चाहिए, उन विचारों को, जो किसी काम के नही है, उन्हें तो न आने दें। बिना काम के विचार वे ही हैं, जो कभी वर्तमान में नही रहने देते। हमेशा मन को भूत और भविष्य में ले जाते हैं। यही तो चिन्ता है जो कि चित्त भी है।&lt;br /&gt;इसीलिए आवश्यक है कि गहरी सतर्कता रहे। यह सतर्कता और कहीं नहीं, अन्तर्जगत में हमेशा रहे। याद रखिए मन गत्यात्मक है। उसकी गति असाधारण है, इसीलिए जहां आप चूके, मन एक क्षण में लाखों मील की दूरी लाँघ जाता है। और जहां सतर्कता पूर्वक अवलोकन हुआ, वह नियंत्रित होता चला जाता है। सतर्कता की इस अवधि को बढ़ाइये, जितनी यह अवधि बढ़ती चली जाएगी, उतनी ही गहरी शांति में आप अपने आपको पाते चले जाऐगे।&lt;br /&gt;सच तो यह है, यहां पानी पर उठने वाली लहर को ही एकाग्र करना लक्ष्य नही है, हम चाहते हैं- उसको बर्फ बनाना, जिससे कि फिर कभी कोई लहर ही नही बने। यह स्थिति मानसिक एकाग्रता ही नही है। एकाग्रता के लिए कम से कम एक संकल्प तो चाहिए ही, और नहीं अब तक अन्य स्थानों पर परिभाषित किया ध्यान ही है। यहां ध्यान योग हमे, कुविचार से हटाते हुए उस संकल्प-हीनता को सौंपता है, जहां मात्र आत्मानुभव है और भगवत्कर्म है, यही हमारा ध्येय है।&lt;br /&gt;साधक कहते हैं-&lt;br /&gt;दुख है जीवन में दुख ही दुख है। हम उससे अपने आपको हटाना भी चाहते हैं पर संभव नही है। वे दुख के प्रभाव को संसार की सहायता से दूर करना चाहते हैं। यह जानते हुए भी कि जब तक सुख की सत्ता है, तभी तक दुख है। पर जाने कैसा भटकाव है ? प्राणी दुख भोगता हुआ भी सुख की भूल- भुलैया में इतना उलझा रहता है कि वह छोड़ते हुए भी&amp;nbsp; छोड़ नहीं पाता है और अगर प्रयास भी करता है तो उसका यह प्रयास किन्हीं सिद्धियों की तलाश में, हठयोग में, या सुख की कामना में ही यह सोचते हुए कि उसके संकल्पों की पूर्ति किसी अन्य की कृपा से संभव है, गुरूडम के भटकाव में भटक जाता है।&lt;br /&gt;नहीं, हमें इसी जीवन में अभ्यास सत्संग द्वारा ध्येय पाना ही है। ध्यानयोग ही सहज और सुगम वह मार्ग है, जो सन्तों का साध्य पथ रहा है।&lt;br /&gt;इसीलिए आवश्यक है, अगर अपूर्णता है, और उसे पूर्ण करने की तीव्र इच्छा है, तो प्रयत्न आज से और अभी से किया जाए।&lt;br /&gt;पहला कदम&lt;br /&gt;जरूरी नहीं कि एक ही दिन में, एक ही क्षण में चमत्कार हो जाय। योग मार्ग पिपीलिका-मार्ग है। चींटी का मार्ग, जिस प्रकार मधु की तलाश में अनवरत लगी हुई वह दुर्गम से दुर्गम जगह पहुच जाती है, वही भाव साधक के मन मेें होना चाहिए कम से कम दिन में दो बार तो कुछ समय हमें अपने अभ्यास के लिए देना ही चाहिए सोते समय और सुबह नींद खुलते समय।&lt;br /&gt;बैठ नहीं सके तो लेटे ही रहें। देखे मन क्या कर रहा है ? सतर्कता से आंतरिक विचारणा का अवलोकन करें, न जाने कितने विचार आ रहे हैं, पर आप तो विश्राम में हैं और मन दोपहरी में गया, इस कल से उस कल में गया, समझाइए अभी तो विश्राम में हूं। मन को वर्तमान में लाइए। यही प्रयत्न है, शुरू-शुरू में मन नहीं मानेगा, फिर ज्यो-ज्यों अभ्यास बढ़ता जायेगा, वह नियंत्रित होता चला जायेगा। साधक कहेंगे, इससे तुरन्त नींद आ जाती है। नींद आती है तो आने दीजिए, यह बाधक नही है।&lt;br /&gt;सुबह उठते ही इस अभ्यास को दोहराइए। आंतरिक विचारणा का अवलोकन कीजिए। मन जो वा´छा कर रहा है उसे देखिए। बिना किसी पूर्वाग्रह के। और रूपांतर की कामना छोड़िए। जो है, उसी रूप में कुछ क्षण देखने का प्रयास कीजिए। मन ही, मन की निगरानी कर जब थक जाता है तो अशांति स्वतः कम होने लगती है। एक गहरी शांति का अनुभव ही सार्थक उपासना है।&lt;br /&gt;दूसरा कदम&lt;br /&gt;ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का गहरा संबंध है। मन इसी कारण से भोगों में लिप्त रहता है। ध्यान के लिए यही श्रेष्ठ है कि किसी बाहृा नाम, रूप पर मन को स्थिर करने के स्थान पर आंतरिक ब्रहृानाद पर ही मन को स्थिर किया जाय। मन जब ठहरता है, तब अन्तर्जगत से आती हुई ये ध्वनियां साधक को सुनाई देती हैं। संतो ने इनके कई रूप बतलाये हैं, ज्यो-ज्यों मन ठहरता जाता है यह नाद एक स्पष्ट अनवरत सायरन की आवाज सा शेष रह जाता है। साधक को चाहिए कि वह कहीं भी रहे, कुछ भी करता रहे, मन वहीं लगा रहना चाहिए। श्रवण और वाणी का गहरा संबंध है।&lt;br /&gt;इसीलिए साधन यात्रा में जिस कर्मेन्द्रिय पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए, वह वाणी ही है।&lt;br /&gt;तीसरा कदम:-&lt;br /&gt;साधन पथ पर सबसे अधिक फिसलने वाली चीज ”जीभ” है। स्वाद की परिधि में भी तथा वाचालता की परिधि में भी। सभी इन्द्रियों का दमन सरल है। पर इस रसना का नियंत्रण कठिन ही है। क्योंकि इसके दो कार्य है, जब वह बाहर आती है, तब शब्दों से खिलवाड़ करती है, दोष-दर्शन में लग जाती है या पर- निंदा या चाटुकारिता मे। साथ ही स्वाद के लिए मन को इधर उधर दौड़ाए रखती है। जब यह एक साथ दो काम करती है, तब उसका दुरूपयोग घातक ही है।&lt;br /&gt;नाद श्रवण पर मन की एकाग्रता से वाक संयम सरलता से बढ़ जाता है। क्योंकि श्रवण और वाक् का गहरा संबंध है। जो गूंगा होता है, वह बहरा भी होता है।&lt;br /&gt;फिर भी साधक को चाहिए, वह इसके नियन्त्रण पर ध्यान दे। गपशप अस्थिर मन की परिचायक है। जब हम अपने आपसे बचना चाहते हैं, तभी दूसरों को अपने सामने उपस्थित करते हैं। जब तक दोष दर्शन और पर-निंदा उवाच जारी है, हम अपने भीतर की सीढ़ियों पर उतर नहीं सकते। दूसरों के बारे में जानने की यह जिज्ञासा हमें आत्मानुसन्धान से रोक देती है। जितना हम बाहर भटकते हैं, उतनी ही हमारी आंतरिकता हमसे दूर होती चली जाती है। बाहर जो कुछ है, परिवर्तनशील है, उत्तेजनात्मक है और यह उत्तेजना मन को अस्थिरता ही प्रदान करती है। इसीलिए संयम अगर करना है तो वाक-संयम ही करना है।&lt;br /&gt;अन्त में&lt;br /&gt;स्मृतियों से असहयोग तथा जीवेषणा की पहचान ही साधक को सही समझ सौंपती है।&lt;br /&gt;अशुद्ध और अनचाहे संकल्पों के परित्याग से आवश्यक संकल्पों की पूर्ति अपने आप होने लगती है।&lt;br /&gt;यह वह स्थिति है, जब सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। साधक पाता है कि उसके भीतर असाधारण शक्ति आ गई है। वह जिस किसी भी कार्य को करना चाहता है, वह पूर्ण ही होता है। प्रमाद, जो कल तक संगी था- कहीं दूर चला गया है।&lt;br /&gt;साथ ही ”अशुद्ध संकल्प” जो पर-निन्दा तथा पर-अहित में थे, उनके जाते ही मनोनिग्रह हो जाता है।&lt;br /&gt;साधक निर्दोष होने के लिए प्रयत्नशील है। कत्र्तव्य- परायणता बढ़ती है। उसमें स्वतः ही उदारता, मुदिता, प्रेम प्रकट होता है।&lt;br /&gt;प्रेम आंतरिक है।&lt;br /&gt;साधक पाता है कि उसका ह्नदय अब तक जो अनावश्यक विचारों के बोझ से तनाव से भरा हुआ था, खाली हो गया है। वह गहरी शान्ति का अनुभव करता है। साथ ही जगत के प्रति जो संबंध थे, वे भी बदल रहे हैं। साधन यात्रा की पहली पहचान आचरण परिवर्तन है। आचरण में त्याग और सेवा की भावना बढ़ती है।&lt;br /&gt;वह कत्र्तव्य कर्म से जुड़ता है।&lt;br /&gt;कत्र्तव्य कर्म से जुड़ते ही अनावश्यक संकल्प जो भूत और भविष्य में घूमते रहते हैं स्वतः ही कम होने लगते हैं।&lt;br /&gt;व्यर्थ ही जो समय जा रहा था, कम होने लगता है वहीं पर साधक में परिवर्तन आता है। उसकी आंतरिकता घनी होते ही उसमें कलात्मकता आ जाती है।&lt;br /&gt;और भी आगे, अगर साधन-यात्रा निरन्तर गतिशील रहे तो साधक पाता है कि ज्यों-ज्यों संकल्पों की संख्या कम होती है, संकल्प निवृत्ति से प्राप्त शांति सघन होती जाती है।&lt;br /&gt;सधन प्रशांत मन वह पाता है। जो छूटना था, वह स्वतः छूटता चला जा रहा है। जो पाना था, वह स्वतः प्राप्त हो रहा है।&lt;br /&gt;साधन यात्रा में यह पड़ाव ही है।&lt;br /&gt;इसमें रहते हुए और आगे बढ़ना है।&lt;br /&gt;बिरले ही साधक होते हैं, जो यहां आकर रूकते नही हैं। अन्यथा यहां आकर प्राप्त शांति का उपभोग शुरू हो जाता है। पंथ बनने लगते हैं।&lt;br /&gt;सद्गुरू की कृपा, उनकी शरण, प्रभु प्राप्ति की अनन्त जिज्ञासा ही साधक को आगे ले जाती है।&lt;br /&gt;आगे, और आगे, जो साधन यात्रा का पड़ाव है।&lt;br /&gt;”जो” है स्वरूप की प्राप्ति उसकी अभिन्नता है। इस बारे में कुछ कहा नही जा सकता। यह अनुभव का जगत है। अनुभव जब विचारणा के क्षेत्र में आता है, तब भाषा भी उसे प्रकट करने में असमर्थता पाती है। जहां मात्र अनुभवन है, वहां फिर प्रकट करने की आकांक्षा ही नहीं है।&lt;br /&gt;यह हर साधक का अधिकार है। स्वतन्त्रता हर साधक का जन्म सिद्ध अधिकार है। वह यहां आकर स्वाधीनता प्राप्त करता है।&lt;br /&gt;साधन-यात्रा का प्रयोगात्मक है। एक गहरा प्रयोग। यहां प्रारम्भ तो दिखता है, पर अन्त नहीं। इसलिए अनन्त धैर्य और अगाध जिज्ञासा का होना ही साधक के लिए पहली आवश्यकता है।&lt;br /&gt;अ&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1246798442075881113-7747785414448973063?l=divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/feeds/7747785414448973063/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1246798442075881113&amp;postID=7747785414448973063&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/7747785414448973063'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1246798442075881113/posts/default/7747785414448973063'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://divyasahajjeevan-nchat.blogspot.com/2009/05/blog-post_02.html' title='पूज्य स्वामीजी'/><author><name>नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13525554507152291720</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/SeG_Ur7SxTI/AAAAAAAAAPI/FNEHwgFSZ1U/S220/mnc+blog.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_mp0467qfTBk/Sfx7IEPBIVI/AAAAAAAAAUk/EA7VWTlfDGw/s72-c/nn13.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1246798442075881113.post-8041209975632844731</id><published>2009-05-02T18:12:00.000+05:30</published><updated>2009-05-02T18:12:21.284+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पाठ 1'/><title type='text'>पूज्य स्वामीजी</title><content type='html'>ृृृृृृृ&lt;b&gt;अन्तर्यात्रा पूज्य स्वामीजी के सानिध्य में लिखा गया पहला ग्रन्थ है।यहाँ स्वामीजी के विचार तथा उनसे पूछे गए सवालों के उत्तर जो प्राप्त हुए थे वे दिए गए हैं।यह पहले ही बता चुके हैं कि स्वामीजी ने अपना कोई स्वतंत्र पंथ नहीं चलाया , वे एक अनन्य खोजी थे, निरन्तर मौन में रहे, आपने प्रश्न पूछा तो उत्तर दे दिया अन्यथा वे मौन ही रहते थे। उनकी कुटिया सभी के लिए हमेशा खुली रहती थी।वहाँ जाति, संप्रदाय , का कोई भेद नहीं था।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;साधना की ओर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यह प्रश्न और कहीं नहीं, हर साधक के सम्मुख ही सबसे पहले उपस्थित होता है कि साधना क्यों ? हम चाहते क्या हैं ? मनुष्य की मांग क्या है ? अगर वह अपनी वर्तमान स्थिति से सन्तुष्ट है तो फिर यह प्रश्न उपस्थित ही नहीं होता है। परन्तु अगर उत्तर नहीं से आए...तो यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; जिसका पेट खाली है उसके सामने भूख का सवाल सबसे बड़ा है। लगता है यही सबसे बड़ी जरूरत है। नौकरी, और नौकरी उससे बड़ी नौकरी या बड़ी दुकान खोलना, सब पेट भरने का ही तो साधन है। पर पेट कितना बड़ा है,जितना धन होता है, उतना ही खाली रहता है। किसी तरह जब पेट भरता है, तब शरीर की भूख जगती है। इसीलिए शरीर की भूख न जगे, हजारों साल से पेट की भूख पर नियंत्रण रखने की बात कही जा रही है। अनशन, उपवास सब उसी के रूप हैं। पेट की भूख और शरीर की भूख जैविक आवश्यकताएं हैं। इससे इतर मनुष्य की मानसिक और बौद्धिक आवश्यकताएं भी बढ़ती हैं। कला और संस्कृति, सभ्यता और विकास यात्रा, इन्हीं का विस्तार है। सभ्यता, मनुष्य की बहिर्मुखता का ही विस्तार है। मन चंचल है, गत्यात्मक है, इसीलिए सभ्यता निरन्तर गतिशील है। पर यह मन की स्वाभाविक अवस्था नही है। वह कितना भी गति में क्यों न हो, सदैव नहीं रह सकता। उसे प्रशांिन्त की स्थिति में आना ही होता है। हर श्रम का प्रारम्भ और अन्त प्रशान्ति में है। नींद से उठकर मनुष्य सब कुछ करता हुआ नींद में जाना चाहता है। यही उसके सम्पूर्ण जीवन की यात्रा है।&lt;br /&gt;विश्राम, मन की स्थिरता हैं, यही कला और संस्कृति आकार ग्रहण करती है। संस्कृति मन की अन्तर्मुखी यात्रा है।&lt;br /&gt;यह भी मनुष्य की मांग है। यहां सुख भी है, शान्ति भी है।&lt;br /&gt;पेट की भूख और शरीर की भूख के बाद विलासिता की भूख बढ़ती है। विलासिता का आधार आकांक्षा है, संसार इसी कामना का ही विस्तार है।&lt;br /&gt;मनुष्य सम्भावना की भूख में रहता है, निरन्तर कुछ न कुछ होने की सम्भावना। दैविक आवश्यकताओं के ऊपर मानसिक और बौद्धिक आवश्यकताएं है। यह जो भूख है, उसका आधार आकांक्षा है।&lt;br /&gt;और इन सब आवश्यकताओं का एक लम्बा सिलसिला है, जिसमें कि मनुष्य उलझता है।&lt;br /&gt;सवाल फिर खड़ा होता है।&lt;br /&gt;यह सब क्यों ? मैं इतना सब कुछ क्यों चाहता हूं ? मैं आखिर जीवित ही क्यो हूं ? मैं इस लंबी यात्रा पर निरन्तर चल ही नहीं रहा हूं, दौड़ रहा हूं, आखिर किसलिए ?&lt;br /&gt;पेट की भूख, समाप्त होते ही, तुष्टि देती है। शरीर अपनी कामक्षुधा की तृप्ति के बाद क्षणिक तुष्टि लेता है। सिलसिला रूकता नहीं है, चलता रहता है। पढ़ना रोज पढ़ना नौकरी तक। नौकरी से और दूसरी बड़ी नौकरी तक धन की ललक। आदिम पारस की ललक जो वस्तुएं देंगी। वस्तुएं जिनसे परितुष्टि प्राप्त होगी। शरीर क्षणिक है, जर्जर है, कब ढह जाए, इसीलिए अमृत की खोज हुई। शरीर ही नहीं रहा, तब तुष्टि किसे ?&lt;br /&gt;अकसर इन्हीं सबके लिए उमर बीत जाती है।&lt;br /&gt;मन्दिर, यज्ञ, तप, स्वाध्याय, गुरू भण्डारे इन सबके पीछे जो भीड़ है, वह क्या चाहती है ?&lt;br /&gt;तुष्टि का अगाध भण्डार ! उसकी तृप्ति में कभी कोई कमी न आए। यही सुखोपासना सभ्यता का केन्द्र है।&lt;br /&gt;संकल्प पूर्ति सुख देती है, और संकल्प पूर्ति का अभाव दुख देता है। यही सुख दुख की यात्रा है।&lt;br /&gt;मनुष्य सुख चाहता है, मात्र सुख !&lt;br /&gt;सुख अल्प है, दुःख अनन्त है।&lt;br /&gt;इसीलिए ईश्वर की खोज है। एक बड़े आधार की खोज, जो दुख दूर करेगा अनवरत सुख देगा।&lt;br /&gt;अनन्त सुख !&lt;br /&gt;और यही नही मिलता है।&lt;br /&gt;शेष रह जाता है विक्षोभ, व्यथा, दुख का प्रभाव यहीं से साधन यात्रा शुरू होती है।&lt;br /&gt;स्थायी सुख की खोज शान्ति की खोज !&lt;br /&gt;जहां अमृत है !&lt;br /&gt;कामना पूर्ति से प्राप्त तुष्टि का भाव ही सुख है। यह क्षणिक है। मन कामनाओं का सागर है।&lt;br /&gt;एक कामना की पूर्ति हो, इसके पूर्व ही हजारों कामनाएं पैदा हो जाती हैं। क्या वे सब पूरी हो पाती हैं ?&lt;br /&gt;वस्तुगत उपलब्धियों की खोज में व्यक्ति डूबा रहता है। वे ही जीवन का साध्य हो जाती हैं।&lt;br /&gt;और इधर जीवनी शक्ति निरन्तर क्षीण होती चली जा रही है। भारी छटपटाहट है।&lt;br /&gt;वस्तु में सुख तलाशा, प्रयास किया। पर जब तक वस्तु आई शरीर धोखा दे रहा है।&lt;br /&gt;लौटकर दुख ही शेष रहता है। विक्षोभ का धारावाही व्यूह मनुष्य को जकड़े रहता है।&lt;br /&gt;सामान्यतः यही मनुष्य की यात्रा है।&lt;br /&gt;मनुष्य यह मानकर चलता है कि यह जो दूसरा है, वह उसे सुख देगा। दूसरे की खोज ही संसार की यात्रा है। दूसरा पिता में, पत्नी में, पुत्र में समाज में, धन में मकान मेे, यश में हर जगह ढूंढा जाता है।&lt;br /&gt;सुख दूसरे से ही प्राप्त होगा, यह वह मानता है, और दुख ?&lt;br /&gt;इस सवाल पर वह सोचता ही नही है।&lt;br /&gt;यह जो दूसरा है। जो संसार है, क्या कभी उसकी आवश्यकता की पूर्ति कर पाता है ?&lt;br /&gt;और सच तो यह है कि यह जो दूसरा है। हमेशा कल में ही आता है। दूसरा, जो है, जीवेषणा में है। कामना में है।&lt;br /&gt;उसका आकर्षण यही है कि उसके आधार पर भविष्य की आशा शेष है।&lt;br /&gt;इसीलिए मनुष्य भगवान को अपने से अलग मानता है, उनसे कुछ मांगता है और इसी तरह वह इस आशा में जीवित रहता है कि वह जो दूसरा है, उसे आज नहीं तो कल सुख ही देगा।&lt;br /&gt;जहां मनुष्य अपने स्वरूप को छोड़कर, अपने स्वभाव से अनभिज्ञ रहकर दूसरे से जुड़ता है, वहीं वह दुख पाता है। यह जो दूसरा है, उसका कभी नहीं हुआ। क्योंकि वह उसका है ही नहीं। उसकी इससे नित्य दूरी है। इसलिए इस दूसरे के लिए, जो संसार है, शरीर है, धन है, परिवार है, सुख की लालसा बनी हुई है। वह कभी पूरी होगी कि नहीं ? मनुष्य उसे ही पा सकता है, जो कि उसका है। सदा से उसका&amp;nbsp; रहा है।हां, आज भले ही उसकी विस्मृति हो गई हो।&lt;br /&gt;लेकिन होता यह नहीं है, मनुष्य जो उसका है, जो वह है, उसे छोड़कर जो उसे कभी प्राप्त नहीं होने वाला है, निरन्तर परिवर्तनशील है, उसे चाहता है और जब वह उसे नहीं मिलता है, तब वह दुखी होता है। विक्षोभ जग जाता है। दुख का कारण है- अपने को छोड़कर, पराये सुख की खोज करना।&lt;br /&gt;जो स्वभाव है, उसे भूलकर जो नहीं है, उसमें डूबना।&lt;br /&gt;जब तक स्वयं की समझ नहीं होती। दुख के कारण ही तलाश नहीं होती। तब तक यह दूसरा ही महत्वपूर्ण रहता है।&lt;br /&gt;यही विडम्बना है।&lt;br /&gt;दुख दुखी के उद्धार के लिए आता है। उसकी समझ को जाग्रत करता है। पर वह लोलुपता के अधीन होकर सुख की तलाश में भटकता रहता है।&lt;br /&gt;इसीलिए दुख और उसका प्रभाव आदर के योग्य है। यही प्रभाव अपनी तीव्रता में ‘जो है’ उसके प्रति ध्यान दिलाता है। जब वह पाता है कि संसार उसकी आवश्यकता की पूर्ति में सहायक नही है तभी वह अन्वेषी बनता है। खोजी होता है।&lt;br /&gt;‘जो’ अब तक विस्मृति में था, उसकी स्मृति ही जिज्ञासा जगा देती है। जिज्ञासा जगते ही विवेक का आदर होता है। विवेक था, अभी भी जीवन में था, पर बुद्धि का आदर था। विवेक तिरस्कृत था। विवेक का आदर होते ही, अविवेक छूटता है। विवेक ‘जो’ है, उसके प्रति आदर भाव तथा जो नहीं है, उसके प्रति अनादर भाव का भाव जगाता है। आदर का भाव ज्यों-ज्यों दृढ़ होता जाता है, आचरण में स्वाभाविक परिवर्तन आता है। जिसे छूटना है, वह छूटना शुरू हो जाता है। अविवेक से ही बुरे भाव और बुरे कर्म होते हैं। विवेक के जाग्रत होते ही, जो कुछ श्रेष्ठ है,वह आचरण में आने लगता है। साधन प्रारम्भ हो जाता है। साधन कहीं बाहर नहीं अपने पास ही है।&lt;br /&gt;अपनी आवश्यकताओं को समझा जाए। मन का आगे पीछे का चिन्तन ही बाधक है, जो स्मृतियों तथा आकांक्षाओं में डूबा रहता है। यही अविवेक है। यही विक्षोभ का कारण है। इसीलिए आवश्यक है कि पहले निज के विक्षोभ को समझा जाए। जब तक विक्षोभ की समझ नही होगी, तब तक बाहर आने का सार्थक प्रयास भी नहीं हो सकता।&lt;br /&gt;वह सोचता है कि जो दुख दूर कर देगा। जीवन भर भौतिक वस्तुओं की अप्राप्ति ही दुख बन जाती है। वस्तुओं की दासता और उनकी अप्राप्ति दुख का बहुत बड़ा कारण हो जाती है। वह वस्तुओं से अपने आपको बाहर ला नहीं पाता। वह उनकी प्राप्ति के लिए छटपटाता रहता है। यह प्राप्ति ओस कणों से प्यास बुझाने की तरह है। उसकी सांसारिक भूख उसी तरह आजीवन कायम रहती है। कभी-कभी अवसर आता है, विवेक कौंध जाता है। उसे लगता है कि कामनाओं की पूर्ति से प्राप्त तुष्टि क्षणिक है। हर कामना पूरी भी नहीं होती। अतृप्त कामनाएं असंख्य रहती हैं। अपूर्ति से विक्षोभ दुख का अनवरत प्रवाह कायम रहता है।&lt;br /&gt;कभी कभी विवेक का आदर जब साधक करता है, तो व्याकुलता बढ़ती है। जिज्ञासा बढ़ती है। वह अविवेक को समझ जाता है, समझ बढ़ते ही वह साधन यात्रा पर बढ़ जाता है। अन्यथा वह पुनः विवेक का अनादर करते ही सांसारिक प्रवाह मे डूबता चला जाता है।&lt;br /&gt;कामना निवृत्ति ही शांति में प्रवेश कराती है।&lt;br /&gt;यहां सरोवर की लहरें शांत हैं। तली स्पष्ट दिखाई देने लगती है। चित्त दर्पण है। पक्षी उड़ा तो लगा, वह यह दिखा। जब तक वह उड़ता रहा, बिम्ब रहा। जाते ही जल, फिर वही दर्पण का दर्पण !&lt;br /&gt;यही तो प्रशांत मन है।&lt;br /&gt;जो है उसी पर ध्यान केन्द्रित रहे, यही साधन है। जो निरन्तर बदलता रहा है, वही गलत है। वह स्वरूप नहीं है। उससे छूटते ही स्वरूप उपलब्ध होता है। जो भी बदल रहा है, वह मैं नहीं हूं। यह शरीर जो मुझे मिला है, क्या मैं हूं ? यह संसार जो बदल रहा है, क्या मैं हूं ? शरीर मन और संसार सब बदल रहे हैं। संसार मन का ही तो विस्तार है। जगत और शरीर प्रतिरूप ही हैं। जो निरन्तर बदल रहा है, वह सत्य नहीं है। जो असत्य है उसी पर ही तो ध्यान है। उसी का ही चिन्तन है। उसी की ही खोज है। उससे ध्यान हटाना ही ध्यान है। वह तो है, उस पर जब ध्यान पहुंचता है, तभी स्वरूप उपलब्ध होता है। तभी स्थिरता प्राप्त होती है। &lt;br /&gt;इसीलिए ध्यान जो है उसके अवलोकन की कला है। यह शरीर जिस इन्द्रिय के द्वारा यह कार्य कर पाता है वह मन है। तभी तो सारा बह्माण्ड इसी से हलचल लेता हुआ दिखाई पड़ता है। मन की गति असाधारण है, कहा जाता है कि प्रकाश की गति भी उसके सामने कुछ नहीं है। इसीलिए ध्यान आन्तरिक अवलोकन ही कहा गया है। प्रायः ध्यान का अर्थ मानसिक एकाग्रता के लिए लिया जाता है। मन के द्वारा किसी यन्त्र रूप या नाम के प्रति सजगता पूर्वक रखी गई एकाग्रता ही आजकल ध्यान कही जाती है। यह याद रखिए ध्यान, एकाग्रता नहीं है। एकाग्रता मन की बहिर्मुख वृत्तियों को किसी नाम, रूप या मन्त्र पर केन्द्रित करने का अभ्यास ही है। परन्तु एकाग्रता को ही साधना-यात्रा स्वीकारने से साधक, साधन पथ को ही छोड़ बैठता है।&lt;br /&gt;हमारे संकल्प से निश्चित की गई, यह देव प्रतिमा, यह मन्त्र, यह नाम, फिर इतना शक्तिशाली हो जाता है कि मन उससे छूट नहीं पाता, और जो होना चाहिए था, वह नहीं हो पाता है। चित्त पुनःऔर अशांत हो जाता है। अप्रमाद के स्थान पर प्रमाद पुनः उपस्थित हो जाता है।&lt;br /&gt;”ध्यान” एकाग्रता नही है।&lt;br /&gt;ध्यान सतर्कता सहित आंतरिक विचारणा का अवलोकन है। हम जो भीतर हैं, वही वास्तव है। उस वास्तव की सही-सही विश्वसनीय पहचान ही ध्यान प्रक्रिया है। हम जो है, एक स्थिर इकाई नही हैं। हर क्षण हम बदल रहे हैं। जो चीज बदल रही है, वह हमारी आंतरिकता नहीं है।&lt;br /&gt;मन के संकल्प-विकल्प की अनवरत श्रंखला है। इसी श्रंखला, इसी विचारणा का सतर्कतापूर्वक किया गया अवलोकन ही ध्यान है।&lt;br /&gt;अवलोकन दूसरे शब्दों में मात्र देखना।&lt;br /&gt;बाहर नहीं भीतर देखना है। देखते समय ईमानदारी यही रखनी है कि किसी प्रकार का कोई पूर्वाग्रह नही ंरखना है। बनी बनायी पूर्व निर्धारित को क्या देखना। जो बात तय कर ली जाय, जैसे कोई नाम, कोई रूप, उसका अवलोकन ध्यान नहीं है। यहां जो लहरें उठ रही हैं, उन्हें बिना किसी तिरस्कार के, बिना किसी चश्में के देखना है, यहां पर सम्पूर्ण विचारणा को उसके वास्तविक रूप में देखने का प्रयास है।&lt;br /&gt;यह अवलोकन ही क्रमशः स्थिरता प्रदान करता है।र्&lt;br /&gt;िस्थरता ही साधना का लक्ष्य है।&lt;br /&gt;मन का आगे पीछे का चिन्तन ही बेहोशी है। यह वर्तमान से पलायन है। यह नींद है।&lt;br /&gt;सच है, हम जागते हुए भी सोए रहते हैं। कोई पूछे तो हमें लगता है, हम कहीं और थे। यही विवशता असाधन है। इसका त्याग होते ही साधन स्वयं प्राप्त हो जाता है। यह साधन अगर साधक में पर्याप्त धैर्य रहा तो अवश्य ही साध्य से मिलायेगा।&lt;br /&gt;मन की गति असाधारण है। क्षणभर मे ही न जाने कहां से कितनी बातें आ जाती हैं। चित्र ही चित्र ! न जाने कितने युगों से हम चित्र ही चित्र सहेजते आ रहे हैं। ये ही स्मृतियां हैं, जिन्हें हम मन मान बैठे हैं। मन जब इनके साथ सहयोग करता है, तो ये गाढ़ी हो जाती हैं। मूलधन ब्याज कमा लेता है।&lt;br /&gt;मन अगर स्मृतियों के साथ असहयोग करे तो मूलधन ही खर्च होना शुरू हो जाता है।&lt;br /&gt;यही हमें करना है।&lt;br /&gt;यहां न कुछ अच्छा है,न बुरा।&lt;br /&gt;अन्यथा हम सही रूप को जान ही नहीं पायेंगे। जो कुछ है, भीतर है। अंधेरी बावड़ी में रखा हुआ है। उसे बाहर तो आने दें। जहां अस्वीकार किया, वहीं ध्यान ध्यान नहीं रहा। प्रायः अपने भीतर के गंदलाए जल को देखकर हम चैंक जाते हैं। और अस्वीकार करने लग जाते हैं। या उससे बचकर ईश्वर के किसी रूप या नाम में डूबने लगते हैं। यह क्या है, यह तो पागलपन है। परमात्मा का मार्ग कायरता का मार्ग नहीं है। यह अज्ञान है। यहां हम
