आज की क ि‍वता

शनिवार, 19 नवंबर 2011

रात भर हवा चलती रही
ि‍सरहाने बैठी चांदनी दुपटटा संभालती रही
सपनो में
अटका मन
गली'गली भटका
हवा ने कहा
तेरे दुख और उसके सुख की ि‍वध नहीं ि‍मलती है
मुहब्‍बत का ि‍लफााफा
बैरंग ि‍भजवाया हैं

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