आज की क िवता
शनिवार, 19 नवंबर 2011
रात भर हवा चलती रही
िसरहाने बैठी चांदनी दुपटटा संभालती रही
सपनो में
अटका मन
गली'गली भटका
हवा ने कहा
तेरे दुख और उसके सुख की िवध नहीं िमलती है
मुहब्बत का िलफााफा
बैरंग िभजवाया हैं
रात भर हवा चलती रही
िसरहाने बैठी चांदनी दुपटटा संभालती रही
सपनो में
अटका मन
गली'गली भटका
हवा ने कहा
तेरे दुख और उसके सुख की िवध नहीं िमलती है
मुहब्बत का िलफााफा
बैरंग िभजवाया हैं
घर
रस्ते अलग अलग हैं
जाना तो एक घर है
हम रहते दादाबाड़ी
तुम बरकत नगर निवासी
सड़क के इधर हम हैं
तुम उधर रहते,
कैसी हुई मजबूरी
हाथ भी कहाँ हैं हिलते?
उपर की मंजिल हम हैं
नीचे की मंजिल तुम हो
मोबाइल यही है कहता
नेटवर्क नहीं है मिलता
तुम हमसे कहाँ बड़े हो
हम भी क्या तुम से कम हैं
इस दुनिया में सब बड़े हैं
सचमुच दही बड़े हैं
बाहर से जो भी आया
दौना लिए ही आया
सदियों से यही हुआ है
हरी घास हम बने हैं
जिल्लत से यहाॅं पर रहना
मालिक ने कब कहा है,
तोड़नी है तुमको बेड़ी
सबसे बड़ी दुआ है।
सपने
वह बचपन में सपने देखता है,
सपने उसका
बचपन चुरा लेते हैं,
खबर न उसे है
न मां-बाप को होती है
वे सपनों को छीनकर बस्ता थमा देते हैं।
वाह!
वर्दी जो बचपन में चढ़ती है जिस्म पर
उतरती तभी है
जब चील काली पास आ,
उस पर झपटती है,
वह पूछता है, जगह-जगह
इन सपनों का क्या अर्थ, जो रात को ही नहीं,
दिन में तंग करते हैं
न घर पर आराम है
न दफ्तर में,
बाहर बैठा बाबा कहता है
जिन्दगी एक सपना है
रात का छोटा और दिन का जरा बड़ा होता है।
पर उसका ही सपना
इतना बुरा क्यों है
बाबा तो दस आसन सिखा
हवाई जहाज में उड़ता है।
अखबार जब भी पढ़ता है
कल से आज गरीब होता है
गरीबी की रेखा, कहां से कहां तक
भूख का रोटी से, रोटी का कैलोरी से जो
रिश्ता बना है
वही भूखे पेट का हिसाब भी रखता है
बस का भाड़ा
स्कूल की फीस
अनाज, सब्जी, दूध
दवा की दुकान
सितारों की तरह पास आकर
जीभ दिखा देते हैं।
क्या पेट का भूख से
भूख का सपनो से रिश्ता कभी सम्भव है
सचमुच ही नहीं
सपने में ही सही मशाल कोई जल जाए
करदे वह राख
लोकतंत्री चादर जमा जो कचरा है।
अब रोक नहीं पाते है,
काम कर -काम कर
हर कोई कहता हैं
मुट्ठी में रखा कागज
कुछ भी नहीं देता है
सरकार कितनी रहमदिल
कहीं भी, कभी-भी
दारू की दुकान रोज नई खुल जाती है
बढ़ते हैं ग्राहक...
हाकिम की चाँदी और चमक जाती है।
बाहर पोस्टर में
लड़की साइकिल चलाती है
स्कूल भी जाती है
पर भीतर चुपचुप
सपने भी अब नहीं देख पाती है।
गाँव- गाँव नन्दीग्राम
पुलसिया कहता है
कुछ भी करलो ,यहाँ
रुपया आकाश से टपकता है।
”कोड़ा“ कोई एक नहीं
गाँव गाँव कोड़ा है
काडे़ा क ेही गिरवी रखा
हँसिया और हथोड़ा है।
घन नही उठता अब
दोनो हाथ,राम-राम
संसद में परसादी
चहुं ओर काँव-काँव।
मत देख सपने अब
नींद तोड़ ,आँख खोल
तू ही मंत्र
तू ही तंत्र
थोड़ी सी वरजिश कर
झुके अब कहीं नहीं
नाजिम की कुर्सी
उठा फेंक कंधे से
अपनी ही जमीन यह, अपना ही आकाश है
स्वप्न छोड़, आँख खोल।
हम
अचानक ही वह पत्थर पेड़ पर आ गिरा था
ठहरे हुए पक्षी
जगे, फड़फड़ाए, उठे, उड़े....उड़ गए,
कहांँ, ... यह पता किसको था!
याद रहा इतना
आकाश है, जगह देगा, लौटकर फिर
इसी पेड़ पर आना है
पर न जाने क्यों
कितने पत्थर रोज आ गिरते हैं।
सड़क पर फटेहाल लड़की को, न जाने कितने गि(
आंखों पर उठाए
रोज तीर से मिलते हैं।
कल तक भूख की
तेरी मेरी उसकी
बात वह करता था
नुक्कड नाटक में शहीद बन बिखरता था
कुरते और पजामे का रख नहीं पाता हिसाब था
अचानक कल मिला,
करोड़ों की बातें लिए
हंँसता मुस्कराया
देश, धरती, जन अचानक सैकड़ों शब्द लिए
भारी से भारी
शब्द शोर में बदल
शोर, नोट में बदल
वह जेब भरता,
यही कहता फिरता था
लोकतंत्र का सच
राम का नाम है,
नाम की लूट है,लूट ही सच है,
जितने भी जाना है,उसे ही सुख पाना है।
हर कोई दूसरा
हाथ में पत्थरलिए
सोचता सुबह शाम वह क्यों न कर पाया सह सब
उसका भी कुरता उतना ही मैला और था काला...।
कहता शनीचर
राहू-केतू साथ तेरे अब कहां है
यह धरती
लुटने को बनी है
जो भी यहां आया, लूट ही तो गया है,
लुट जाने का भय
सब छोड़ ले लंगोटी
तभी हिमालय पर गया है
कहता रहा वह
है नहीं अब पास कुछ
क्या कोई लेगा
पर लंगोटी में भी कोई आकर
यहाँं भी लूट सकता
यह छिपा सच यहाँं सबसे बड़ा है।
गिरते हैं पत्थर अब
और धूमकेतु उल्का भी
उनसे भी तेज, और तेज
टी.वी. के चैनल
नहीं कोई ठहर पाता
कितनी चिकनी यह सतह है
नहीं जल
अब जरा भिगो पाता
भीतर रखा था वह
स्निग्ध कोमल
छंद तुम्हारा ही, तुमने जो पाया था
अचानक शीत पाकर
पछुआ हवा सेबर्फ सा हो गया है।
ताप कहांँ
कहां है तपन...
चर्चा ही व्यर्थ है
बाहर के देवता
पाषाण बन पुजे जो...
इतना आदर पा
अब भीतर ही जमे हैं...
भीतर का छंद
सजीला सुरभित, चुपचाप बाहर निकल
मंदिर में कबसे पूजित हुआ है
और हम,
हत भागी!
नहीं-नहीं प्रभु परसादी
पत्थरों के टोल से फिकते-फिकवाते
हाथ दूसरे के कबसे, कसे से रखे हैं।
इतिहास के मध्य से
देह को तोड़कर गुज़रती जा रही हैं
बर्फीली हवाएँ
कहाँ तक रुकें अब और
अब तो खड़ा भी नहीं हुआ जाता है
न जाने उनने कब
देह में रोपे थे बीज
कि आग बुझती चली गयीं
मट्ठियाँ ऐसी तनी
खुली नहीं
बस जड़ रह गयीं
वाह रे
कैसा उड़ा गुलाल
बदलाव लाने की जगह
पालागन हो गया
ओ रे मन
कब आया था वसन्त तुम में
कुछ याद है
कब तुमने मिटने मिटाने की कसम खाई थी
कितने अच्छे थे वे दिन
अब तो सपने भी नहीं आते हैं
कि हमने कभी ऐसे सपने भी देखे थे।
देह राग
इस बीहड़ वन में कहीं तुमने
पलाश जलता देखा है
जब कि लोग कहते हैं
जंगल कटने का वक्त आया है
अब इस मौसम में
चुप रहने की आदत हो गई है
कैक्टस गुलाब लगता है
निज मन पराए रूमाल में लिपटा
प्राणायाम कर रहा है।
क्या तुम पर भी
ऐसा हादसा कभी गुज़रा है
तुम्हारे जिस्म में पलाश वन
अचानक उग आया है
और जल रहा है
तब तुम्हारे पास से शायद
पतझड़ गुजरा होगा अचानक
पालकी में बैठकर
हंसता हुआ
कह गया होगा
देखो इस बीहड़ वन में भी पलाश जल रहा है
तब झाड़ियाँ
तालियाँ बजाकर हँस रही हांेगी।
जंगल का दर्द
न दल, न दलदल, बस एक दरख़्त
बैठे हैं जिसके नीचे
लड़ते झगड़ते, लार टपकाते, अंतहीन रेवड़
प्रतीक्षा हैं सबको
कि दरख़्त गिर जाए
इतिहास कहता है दरख़्त जब गिरता है
तभी कुछ होता है।
दरख़्त अब होते ही नहीं
जंगलात का हाकिम कहता है
नहीं है शेष एक पेड़ यहाँ से वहाँ तक
जो, जा सके आरा मशीन तक।
निपट खाली मैदान
जंगल अब रहता ही नही है
चलो रोप आएँ हम एक पेड़
कल तुमने ही कहा था,
मौसम भी अब मज़ाक करता है
तभी कह रहा था
वक़्त को अब हरी दूब की जरूरत है
न शाख होगी, न कटेगी
दूब का क्या,
जब कुचलती है
तभी हरी होती है
और हरा होना
इस मौसम में युग गांधारी की होनी जरूरत है।
डाॅ. नरेन्द्र चतुर्वेदी कविता ”सच “यहाँ दी जारही है,आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत रहेगा।
सच
कविता का सच क्या है
कल्पना के ताने-बाने
चैकड़ी जो बनी है-
इस करघे पर
भूख, गरीबी से लड़ते कवि ने
जो चुललू भर चाय की चुस्की पर
नई दुनिया के नए सोच की तस्वीर बनाता है,
गली में
पेशाब की बदबू से बचते-निकलते
ऊपर कहीं से भी
गंदगी के ढेर का अचानक पुष्पवर्षा सा गिरना
सूअर जो कहीं था आमंत्रित
दौड़ता-भगता,
टकराहट मिमियाते श्वान से
पास की दुकान से गूंजता संगीत,
यही दुनिया का खुला हुआ तिलस्म है।
कविता का रस
ढूँढ़ता कवि
सोचता,
यथार्थ जो मिला ‘मकबरेे की गंदी गली में
महफिल में आ जाए,
साबुन के झाग से निकला, फिसलता
हाथ में टिकली साबुन सा वक़्त
मां की, बाप की, रिश्ते में सभी की
ख्वाहिश पहचानता
बिजली के तारों पर बैठी ‘काग शृंखला
यहाँं, वहाँं आसपास
कविता में तलाशतातमीज सीधे खड़े होने की
न बिकने की व्यथा
लिखा बहुत कुछ
छपा कहीं नहीं
सुनकर नहीं कोई
शब्द, भीतर खंजर सा चीरता।
काँख में दबी
आई पत्रिका झांकता
टुकुर-टुकुर
रेत उठाती, अर्धनग्न, आदिवासी कन्या की
भूख, ... पेड़ की छाया भी रोती, चीखती
भयातुर, ... आंख की कोर में अचानक कंकड़ सा गिरता
जीवित यथार्थ
शब्द क्या बांध पाए
सोचना भी पाप है
माया है माया है
‘गोपाली’ बाबू की कथा में नहीं है यह
नहीं ‘कागा राम’ मटक-मटक गाता है,
वह कभी- कभी
काटता है भीतर से
रिसता है दुख, ... रात को टपकते नल से बूंद-बंूद सा
न करने का, बस
अपनी ही आंख में रोज और नीचे
और नीचे, उतरने का देता है दर्द,
वह जब भी देख पाती है
तेज, ... तपती रेत में
अचानक खिड़की से
रोते, झींकते, चिल्लाते, पगलाते
छोटे-छोटे पाँवों
से आता-ठहरता, जाता, ढूंढ़ता रहता कुछ
कविता का यथार्थ,वह।
© Blogger templates Newspaper by Ourblogtemplates.com 2008
Back to TOP