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आज की क ि‍वता

शनिवार, 19 नवंबर 2011

रात भर हवा चलती रही
ि‍सरहाने बैठी चांदनी दुपटटा संभालती रही
सपनो में
अटका मन
गली'गली भटका
हवा ने कहा
तेरे दुख और उसके सुख की ि‍वध नहीं ि‍मलती है
मुहब्‍बत का ि‍लफााफा
बैरंग ि‍भजवाया हैं

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कविता,

सोमवार, 23 नवंबर 2009

घर

रस्ते अलग अलग हैं
जाना तो एक घर है
हम रहते दादाबाड़ी
तुम बरकत नगर निवासी

सड़क के इधर हम हैं
तुम उधर रहते,
कैसी हुई मजबूरी
हाथ भी कहाँ  हैं हिलते?

उपर की  मंजिल हम हैं
नीचे की मंजिल तुम हो
मोबाइल यही है कहता
नेटवर्क नहीं है मिलता

तुम हमसे कहाँ बड़े हो
हम भी क्या तुम से कम हैं
इस दुनिया में सब बड़े हैं
सचमुच दही बड़े हैं

बाहर से जो भी आया
दौना लिए ही आया
सदियों से यही हुआ है
हरी घास  हम बने हैं

जिल्लत से यहाॅं पर रहना
मालिक ने कब कहा है,
तोड़नी है तुमको बेड़ी
सबसे बड़ी दुआ है।

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कविता

बुधवार, 18 नवंबर 2009


                          सपने
वह बचपन में सपने देखता है,
सपने उसका
बचपन चुरा लेते हैं,
खबर न उसे है
न मां-बाप को होती है
वे सपनों को छीनकर बस्ता थमा देते हैं।
वाह!
वर्दी जो बचपन में चढ़ती है जिस्म पर
उतरती तभी है
जब चील काली पास आ,
उस पर झपटती है,
वह पूछता है, जगह-जगह
इन सपनों का क्या अर्थ, जो रात को ही नहीं,
दिन में तंग करते हैं
न घर पर आराम है
न दफ्तर में,

बाहर बैठा बाबा कहता है
जिन्दगी एक सपना है
रात का छोटा और दिन का जरा बड़ा होता है।
पर उसका ही सपना
इतना बुरा क्यों है
बाबा तो दस आसन सिखा
हवाई जहाज में उड़ता  है।

अखबार जब भी पढ़ता है
कल से आज गरीब होता है
गरीबी की रेखा, कहां से कहां तक
भूख का रोटी से, रोटी का कैलोरी से जो
रिश्ता बना है
वही भूखे पेट का हिसाब भी रखता है

बस का भाड़ा
स्कूल की फीस
अनाज, सब्जी, दूध
दवा की दुकान
सितारों की तरह पास आकर
जीभ दिखा देते हैं।

क्या पेट का भूख से
भूख का सपनो से रिश्ता कभी सम्भव है
सचमुच ही नहीं
सपने में ही सही मशाल कोई जल जाए
करदे वह राख
लोकतंत्री चादर जमा जो कचरा है।
अब रोक नहीं पाते है,

काम कर -काम कर
हर कोई कहता हैं
मुट्ठी में रखा कागज
कुछ भी नहीं देता है

सरकार कितनी रहमदिल
कहीं भी, कभी-भी
दारू की दुकान रोज नई खुल जाती है
बढ़ते हैं ग्राहक...
हाकिम की चाँदी और चमक जाती है।

बाहर पोस्टर में
लड़की साइकिल चलाती है
स्कूल भी जाती है
पर भीतर चुपचुप
सपने भी अब नहीं देख पाती है।

गाँव- गाँव नन्दीग्राम
पुलसिया कहता है
कुछ भी करलो ,यहाँ
रुपया आकाश से टपकता है।

”कोड़ा“ कोई एक नहीं
गाँव गाँव कोड़ा है
काडे़ा क ेही गिरवी रखा
हँसिया और हथोड़ा है।

घन नही उठता अब
दोनो हाथ,राम-राम
संसद में परसादी
चहुं ओर काँव-काँव।

मत देख सपने अब
नींद तोड़ ,आँख खोल
तू ही मंत्र
तू ही तंत्र
थोड़ी सी वरजिश कर
झुके अब कहीं नहीं
नाजिम की कुर्सी
उठा फेंक कंधे से
अपनी ही जमीन यह, अपना ही आकाश है
स्वप्न छोड़, आँख खोल।



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कविता

शनिवार, 29 अगस्त 2009

 हम
अचानक ही वह पत्थर पेड़ पर आ गिरा था
ठहरे हुए पक्षी
जगे, फड़फड़ाए, उठे, उड़े....उड़ गए,
कहांँ, ... यह पता किसको था!
याद रहा इतना
आकाश है, जगह देगा, लौटकर फिर
इसी पेड़ पर आना है
पर न जाने क्यों
कितने पत्थर रोज आ गिरते हैं।
सड़क पर फटेहाल लड़की को, न जाने कितने गि(
आंखों  पर उठाए
रोज तीर से मिलते हैं।

कल तक भूख की
तेरी मेरी उसकी
बात वह करता था
नुक्कड नाटक में शहीद बन बिखरता था
कुरते और पजामे का रख नहीं पाता हिसाब था
अचानक कल मिला,

करोड़ों की बातें लिए
हंँसता मुस्कराया
देश, धरती, जन अचानक सैकड़ों शब्द लिए
भारी से भारी
शब्द शोर में बदल
शोर, नोट में बदल
वह जेब भरता,
यही कहता फिरता था
लोकतंत्र का सच
राम का नाम है,
नाम की लूट है,लूट ही सच है,
जितने भी जाना है,उसे ही सुख पाना है।
हर कोई दूसरा
हाथ में पत्थरलिए
सोचता सुबह शाम वह क्यों न कर पाया सह सब
उसका भी कुरता उतना ही मैला और था काला...।

कहता शनीचर
राहू-केतू साथ तेरे अब कहां है
यह धरती
लुटने को बनी है
 जो भी यहां आया, लूट ही तो गया है,
लुट जाने का भय
सब छोड़ ले लंगोटी
तभी हिमालय पर गया है
कहता रहा वह
है नहीं अब पास कुछ
क्या कोई लेगा
पर लंगोटी में भी कोई आकर
यहाँं  भी लूट सकता
यह छिपा सच यहाँं सबसे बड़ा है।

गिरते हैं पत्थर अब
और धूमकेतु उल्का भी
उनसे भी तेज, और तेज
टी.वी. के चैनल
नहीं कोई ठहर पाता
कितनी चिकनी यह सतह है
नहीं जल
अब जरा भिगो पाता
भीतर रखा था वह
स्निग्ध कोमल
छंद तुम्हारा ही, तुमने जो पाया था
अचानक शीत पाकर
पछुआ हवा सेबर्फ सा हो गया है।

ताप कहांँ
कहां है तपन...
चर्चा ही व्यर्थ है
बाहर के देवता
पाषाण बन पुजे जो...
इतना आदर पा
अब भीतर ही जमे हैं...
भीतर का छंद
सजीला सुरभित, चुपचाप बाहर निकल
मंदिर में कबसे पूजित हुआ है
और हम,
हत भागी!
नहीं-नहीं प्रभु परसादी
पत्थरों के टोल से फिकते-फिकवाते
हाथ दूसरे के कबसे,  कसे से रखे हैं।

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कविता

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

इतिहास के मध्य से
देह को तोड़कर गुज़रती जा रही हैं
बर्फीली हवाएँ
कहाँ तक रुकें अब और
अब तो खड़ा भी नहीं हुआ जाता है
न जाने उनने कब
देह में रोपे थे बीज
कि आग बुझती चली गयीं
मट्ठियाँ ऐसी तनी
खुली नहीं
बस जड़ रह गयीं
वाह रे
कैसा उड़ा गुलाल
बदलाव लाने की जगह
पालागन हो गया
ओ रे मन
कब आया था वसन्त तुम में
कुछ याद है
कब तुमने मिटने मिटाने की कसम खाई थी
कितने अच्छे थे वे दिन
अब तो सपने भी नहीं आते हैं
कि हमने कभी ऐसे सपने भी देखे थे।

देह राग
इस बीहड़ वन में कहीं तुमने
पलाश जलता देखा है
जब कि लोग कहते हैं
जंगल  कटने का वक्त आया है
अब इस मौसम में
चुप रहने की आदत हो गई है
कैक्टस गुलाब लगता है
निज मन पराए रूमाल में लिपटा
प्राणायाम कर रहा है।
क्या तुम पर भी
ऐसा हादसा कभी गुज़रा है
तुम्हारे जिस्म में पलाश वन
अचानक उग आया है
और जल रहा है
तब तुम्हारे पास से शायद
पतझड़ गुजरा होगा अचानक
पालकी में बैठकर
हंसता हुआ
कह गया होगा
देखो इस बीहड़ वन में भी पलाश जल रहा है

तब झाड़ियाँ
तालियाँ बजाकर हँस रही हांेगी।

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कविता

गुरुवार, 16 जुलाई 2009

जंगल का दर्द
न दल, न दलदल, बस एक दरख़्त
बैठे हैं जिसके नीचे
लड़ते झगड़ते, लार टपकाते, अंतहीन रेवड़
प्रतीक्षा हैं सबको
कि दरख़्त गिर जाए
इतिहास कहता है दरख़्त जब गिरता है
तभी कुछ होता है।
दरख़्त अब होते ही नहीं
जंगलात का हाकिम कहता है
नहीं है शेष एक पेड़ यहाँ से वहाँ तक
जो, जा सके आरा मशीन तक।
निपट खाली मैदान
जंगल अब रहता ही नही है
चलो रोप आएँ हम एक पेड़
कल तुमने ही कहा था,
मौसम भी अब मज़ाक करता है
तभी कह रहा था
वक़्त को अब हरी दूब की जरूरत है
न शाख होगी, न कटेगी
दूब का क्या,
जब कुचलती है
तभी हरी होती है
और हरा होना
इस मौसम में युग गांधारी की होनी जरूरत है।

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कविता

मंगलवार, 2 जून 2009




घर

रस्ते अलग अलग हैं
जाना तो एक घर है
हम रहते दादाबाड़ी
तुम बरकत नगर निवासी

सड़क के इधर हम हैं
तुम उधर रहते,
कैसी हुई मजबूरी
सड़क पार नहीं होती

उपर की  मंजिल हम हैं
नीचे की मंजिल तुम हो
जीने की क्या विवशता
कदम झेल नहीं सकता

तुम हमसे क्या बड़े हो
हम तुम से क्या कम हैं
सब बड़े ही बड़े हैं
सचमुच दही बड़े हैं

पडौसी ही चट कर सकता
दौना लिए वह आता
सदियों से यही हुआ है
हरी घास  हम बने हैं

जिल्लत से यहाॅं पर रहना
मालिक ने कब कहा है,
रस्ते अलग अलग हैं
रहना तो एक घर है।

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कविता,

रविवार, 24 मई 2009

डाॅ. नरेन्द्र चतुर्वेदी कविता ”सच “यहाँ दी जारही है,आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत रहेगा।

सच

कविता का सच क्या है
कल्पना के ताने-बाने
चैकड़ी जो बनी है-
इस करघे पर
भूख, गरीबी से लड़ते कवि ने
जो चुललू भर चाय की  चुस्की पर
नई दुनिया के नए सोच की तस्वीर बनाता है,

गली में
पेशाब की बदबू से बचते-निकलते
ऊपर कहीं से भी
गंदगी के ढेर का अचानक पुष्पवर्षा सा गिरना
सूअर जो कहीं था आमंत्रित
दौड़ता-भगता,
टकराहट मिमियाते श्वान से
पास की दुकान से गूंजता संगीत,
यही दुनिया का खुला हुआ तिलस्म है।

कविता का रस
ढूँढ़ता कवि
सोचता,
यथार्थ जो मिला ‘मकबरेे की गंदी  गली में
महफिल में आ जाए,
साबुन के झाग से निकला, फिसलता
हाथ में टिकली साबुन सा वक़्त
मां की, बाप की, रिश्ते में सभी की
ख्वाहिश पहचानता
बिजली के तारों पर बैठी ‘काग शृंखला
यहाँं, वहाँं आसपास
कविता में तलाशतातमीज सीधे खड़े होने की
न बिकने की व्यथा
लिखा बहुत कुछ
छपा कहीं नहीं
सुनकर नहीं कोई
शब्द, भीतर खंजर सा चीरता।

काँख में दबी
आई पत्रिका झांकता
टुकुर-टुकुर
रेत उठाती, अर्धनग्न, आदिवासी कन्या की
भूख, ... पेड़ की छाया भी रोती, चीखती
भयातुर, ... आंख की कोर में अचानक कंकड़ सा गिरता

जीवित यथार्थ
शब्द क्या बांध पाए
सोचना भी पाप है
माया है माया है
‘गोपाली’ बाबू की कथा में नहीं है यह
नहीं ‘कागा राम’ मटक-मटक गाता है,
वह कभी- कभी
काटता है भीतर से
रिसता है दुख, ... रात को टपकते नल से बूंद-बंूद सा
न करने का, बस
अपनी ही आंख में रोज और नीचे
और नीचे, उतरने का देता है दर्द,
वह जब भी देख पाती है
तेज, ... तपती रेत में
अचानक खिड़की से
रोते, झींकते, चिल्लाते, पगलाते
छोटे-छोटे पाँवों
से आता-ठहरता, जाता, ढूंढ़ता रहता कुछ
कविता का यथार्थ,वह।

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दोपहर

गुरुवार, 21 मई 2009

'कविता'
दोपहर
डॉ. नरेन्द्रनाथ चतुर्वेदी

उन दिनो गर्मियों की दोपहर में
कल्लू के घर की तिमंजली छत पर बने 
उस टीन के कमरे में

जहाँ बाहर कबूतर का पिंजरा था
थे उसके बाबा, जो छत पर आकर कबूतर उड़ाते थे
उसकी बकरी जीने पर होती हुई चीखती चिल्लाती
छत पर आ जाती,
चौकड़ी या छकड़ी, ताश के रंगीन पत्ते
रंगीन सपनों से महकते।


कुछ देर बाद उसकी माँ
नासपीटे को बीमार होना है
और तुम सबको भी
रेवड़ियों की तरह कभी गुड़ की कभी चीनी की
बरसती गालियां.... हवा को सुना जाती,

उसके बाद उसकी बहन का चाय के प्याले लेकर आना
बाबा की तेज आवाज
खेलने के दिन है, इम्तहान अभी निबटे हैं
शाम को कबूतर उड़ाना सिखाना या पतंगबाजी
या पुराने किस्सों का अधखुला खजाना ।
   


बरसों बाद मिला कल्लू
फुटपाथ के पास गुमटी पर, हवा, टायर में भरता हुआ
पास में खड़ी साईकिल
टायर पकाता उसके पास था खड़ा उसका पुराना बचपन
देखकर पहचाना, पहचानकर अनजाना
था मैं अवाक
अपने बेटे की अंगुलियां पकड़े जो बस्ते का बोझ लिए
गर्व में झूमता हंसता... बतियाता
नई मोपेड के चर्चे सुनाता....., 
था साथ चलता


कल्लू के बाबा कहा करते थें
खेलने के दिन है
काश यह रात कभी जल्दी कट सके तो.........

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कविता

बुधवार, 20 मई 2009


हस्तरेखा

कीचड़ में सने हाथ की रेखाएं
पढ़ नहीं पाता पंडित
नहर में पानी मुद्दत बाद जो आया है

दूर खड़ा अभियंता
हथेली खोले हुए बार-बार देखता
खुजलाहट हथेली की सुबह से
इस बार का बजट अब पूरा भी होना है

बादल महीने भर से गायब हैं
शुक्र है समय अच्छा है
गुरुजी ने कहा था-
शनी उतर गया है
दूर खेतों में, फटे हाल किसानों पर
चढ़ा ही नहीं
चिपक भी गया है

महाजन भी खुश
कल ही सुबह-सुबह पहली बार गया था
तृष्णा की रेत पर...
भारतमाता को याद कर
कदमताल कर आया था
उधारी बढ़ेगी
ब्याज सवा से दो पाई सैकड़ा बढ़ेगा
गिरवी जमीन, बर्तन-भांडे भी होंगे
तब वसूली तब होगी...
तब, भविष्य वह में सुरक्षित रह सकेगा

संस्कृति का गवाक्ष खालीनहीं कोई आता इधर
रानी, परनानी, दादी अब वहां कहां
कभी बैठा था ललमुंहा बंदर वहां
उठकर जबसे गया है
नचता ‘वराह’ का वंशज
महाजनी मंत्र पर
चढ़ता-उतरता
महिमा मंडित
समाचार पत्रों में छपा है विज्ञापन
भागवत कथा का वही है आयोजक।

चीलंे व्यस्त है
गि(ों को जाकर नौत आयी है तेरहवीं का भोज है
कागा उड़ते ही नहीं
बैठे हैं मुंडेरों पर कल से जमा
बहस ही बहस
राशि अकाल पर,
या बाढ़ पर खर्च हो होनी है
दिनभर में, ... कितनी कहांँ
लार रुकती नहीं
मरण पर्व आयोजित जो होना है।
उनकी हथेली पर
रेखाएं मिटसी गई है
कीचड़ में सनी, धूल में बंधी
सूरज की रोशनी में
किरण सी चमकती है

उसकी रेखाएं
पंडित हंँस-हंँसकर बांँचता
ग्रह अब उतरने को है
खुजली रुकती नहीं
जिस्म खुलाने चली है

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कविता,

सोमवार, 11 मई 2009


नरेन्द्र चतुर्वेदी की कविता उनके काव्य संग्रह अभी वो जीवित हैं संग्रह से यहाँ दी जारही है।


 क्योंकि

अचानक रेल के डिब्बे में
भारी भीड़ में तुम्हारा पहचाना सा चेहरा
यह तुम,’तुम हो,.’.. यह वह,
स्मृतियों पर पड़ा पत्थर
हटाए नहीं हटता,

मांगीलाल हो या पन्ना, या भूरा या गोपी
चेहरे उनके जो साथ रहे
पहचान नहीं दे पाए
हंसते-गाते, बोलते-चलते,
कुछ मर गए
कुछ खप गए
रात-दिन की दौड़ में,
”सर!“ अनुगूंज में,

पहचान उठती है
पहचान गिरती है
जिसे पहचानता है, जो पहचानता है
उससे वह छोटा है
जिसे पहचाना, वही बड़ा होता है,
दुनिया का यही नियम दुनिया कहा जाता है।
पहचानकर, अजनबीपन
न जाना, न पहचाना, बुत को अपनाना
सचमुच सुखद होता है,
नहीं जो जिसको पहचाना वही तो बड़ा होता है।

जबकि बात उसकी है
उसके लिए आए हैं
सामने उसी का पोस्टर टंगा है
उसी की कोशिश में यह ‘रत जगा’ है
पर हमने पहचाना तवह सर चढ़ेगा
सर पर कदम रख, कदम ताल करेगा,
यह खतरा जिसने जाना है ,
वही आज की दुनिया का हरकारा हैं

चुप रहो,
चुप रहो,
उनको  ही पहचानने दो
दुनिया अजनबी है

हम इस पहचान के मात्र साक्षी हैं
साक्षी रहना,
वक्त की जरूरत है,
जो साक्षी है
वही सुरक्षित है,सुरक्षित रहना हमारी जरूरत है।

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जब से सोए हैं

रविवार, 12 अप्रैल 2009

















 जब से सोए हैं
  • नरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी

उनसे कह मत देना नींद क्या होती है
जब से सोए हैं, जागे ही नहीं,
जब से गए थे बिस्तर पर
वहीं पर है,
वे चलते हैं, आते हैं, घूमते हैं
बात भी करते हैं
अभी-अभी आए थे
किताब नई लिखी,
बहुत बड़े विद्वान की भूमिका छपी है
हजार साल पुरानी पुड़िया में रखी भस्म
को शहद से चटाने पर
गौमूत्र के साथ लेने पर, युवावस्था बनी रहती है...


गोबर से यान उड़ता था
चर्चा भारी थी,
बार-बार कहते थे
यह मुल्क सोता है
सदियों से, नींद खुलती नहीं
इन्हें जगना होगा

क्या अमरीका ने ही की है अंतरिक्ष यात्रा
हमारे यहां कितना लिखा
पढ़ता कोई नहीं
सौरमंडल की यात्रा चर्चा जगह-जगह लिखी है

उनकी नींद बहुत गहरी है
टूट नहीं सकती
न तोड़ना उसको
काम
   
बहुत कुछ करने को,..... रहता है काम
सुबह- सुबह, अखबार‘
या उसके बाद दफ्तर में जाकर, रगड़ना झगड़ना
हिसाब चुकता करना,..... धोबी, पंसारी, नहीं दूध वाले का
साथ जो बैठा है,
हंसता, बतियाता है
गलबाहि़यां डाले, मित्रा जो बरसों का,
   
ह़ा, हा, ही, ही, हू, हू
दस आठ शब्दों मे चाकरी चलना
चपड़ास रामद्वारे की
जब अयोध्या ही नहीं रही
‘खड़े बुद्व हिल गए
तोप मोर्टारों से
बाहुबल, भुजबल ,धनबल, त्रियाबल
राम राम सत्य कह
राम कहां साथ रहे,
सच यहां शासन, गांधारी, मंथरा महारानी का
चपड़ास गुरू शुकनी या मित्र अश्वथामा
पास बैठ, शंख फूँक
गुप्त महाभारत का,
करना है बहुत काम।

तक्षक कुलबुलाता
घूमती कुर्सी पर
घंटी पर घंटी दे
   
लाल लाल सुर्ख आँख
देह पर, कक्ष पर, और वाहन पर चढ़ा सुर्ख
सुर्ख मुर्ग कलंकी सुर्ख


                             
   

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